
वॉशिंगटन। दुनिया के कई देश इस समय युद्ध की विभीषिका से जूझ रहे हैं। अमेरिका ने हाल ही में वेनेजुएला में एक ऐसा सैन्य ऑपरेशन चलाया, जो महज कुछ घंटे तक चला और वहां के राष्ट्रपति निकोलस को बंदी बनाकर अपने देश लेकर चला गया और अब इजराइल के साथ मिलकर ईरान में तबाही मचाये हुए हैं। इसी के साथ ही अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और भू-राजनीतिक बम फोड़ दिया है। ट्रंप ने अब अपना अगला निशाना अमेरिका के पड़ोसी देश क्यूबा को बनाया है।
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आर्थिक और ऊर्जा संकट से गुजर रहा क्यूबा
एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बात करते ही ट्रंप ने क्यूबा को एक नाकाम देश करार देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के बाद क्यूबा उनके रडार पर है। ट्रंप का ये बयान ऐसे समय में आया है जब क्यूबा अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक और ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि, ट्रंप प्रशासन इस द्वीप देश में शासन परिवर्तन या सैन्य हस्तक्षेप की जमीन तैयार कर रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि, वॉशिंगटन और हवाना के बीच पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि क्यूबा समझौता करने के लिए उत्सुक है क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं बचा है। ट्रंप ने साफ किया कि, या तो क्यूबा उनकी शर्तों पर समझौता करे, अन्यथा अमेरिका अन्य कदम उठाने के लिए मजबूर होगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि क्यूबा पर कोई भी बड़ा एक्शन लेने से पहले ईरान के साथ चल रहा सैन्य टकराव उनके प्रशासन की पहली प्राथमिकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि क्यूबा अब ट्रंप की हिट लिस्ट में ईरान के ठीक बगल में खड़ा है।
सड़कों पर उतर रही जनता
ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में आई है जब क्यूबा की स्थिति बेहद नाजुक है। दशकों से लगे अमेरिकी प्रतिबंधों ने क्यूबा की कमर पहले ही तोड़ दी थी, लेकिन 2025-26 के हालिया दौर में यह संकट और गहरा गया है। देश में ईंधन की भारी कमी है, जिसके कारण घंटों बिजली कटौती सामान्य बात हो गई है। भोजन की कमी और बढ़ती महंगाई ने आम जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।
क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कनेल ने स्वीकार किया है कि अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला है, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि क्यूबा अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। हालांकि, वॉशिंगटन का रुख कड़ा है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि क्यूबा अपनी कम्युनिस्ट विचारधारा को छोड़कर बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव करे, जिसे डियाज़-कनेल सरकार के लिए मानना अपनी सत्ता को खत्म करने जैसा होगा।
इलेक्ट्रॉनिक जासूसी केंद्रों के विस्तार कर आरोप
सवाल यह उठता है कि, अचानक क्यूबा, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इतना बड़ा खतरा क्यों बन गया? इसका उत्तर क्यूबा में चीन और रूस की बढ़ती सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी में छिपा है। अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स (2025-26) ने दावा किया है कि चीन ने क्यूबा में अपने इलेक्ट्रॉनिक जासूसी केंद्रों का विस्तार किया है। यहां से बीजिंग अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी सैन्य अड्डों की रेडियो फ्रीक्वेंसी और सैटेलाइट कम्युनिकेशंस को ट्रैक कर रहा है। यह सीधे तौर पर अमेरिका की जासूसी करने जैसा है।
इतना ही नहीं, चीन ने क्यूबा के मारिएल पोर्ट जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी पैठ बना ली है। क्यूबा को ऊर्जा संकट से उबारने के लिए चीन ने 2026 तक 90 से अधिक सोलर पार्क बनाने और 80 मिलियन डॉलर की आपातकालीन वित्तीय सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके बदले में क्यूबा की जमीन पर चीनी दखल बढ़ रहा है, जिसे ट्रंप प्रशासन बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। वहीं दूसरी ओर, अक्टूबर 2025 में रूस की संसद ने क्यूबा के साथ एक नए रक्षा सहयोग समझौते को मंजूरी दी, जिसके तहत रूसी विशेषज्ञ क्यूबा के सैन्य बुनियादी ढांचे को आधुनिक बना रहे हैं। अमेरिका को डर है कि यह शीत युद्ध के समय वाले ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ की पुनरावृत्ति हो सकती है।
चीन-रूस से सबंध खत्म करने का दवाब
ट्रंप प्रशासन ने सत्ता में आते ही क्यूबा को फिर से आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों की सूची में डाल दिया है। इस एक कदम ने क्यूबा के लिए अंतरराष्ट्रीय फंड और बैंकिंग सेवाओं के रास्ते बंद कर दिए हैं। व्यापार, यात्रा और वित्तीय लेन-देन पर लगी पाबंदियों को और भी सख्त कर दिया गया है। ट्रंप का मकसद साफ है, क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर इतना दबाव बनाना कि वह या तो टूट जाए या फिर चीन-रूस से अपने संबंध खत्म कर अमेरिका की शरण में आ जाए।

अमेरिका और क्यूबा के बीच दुश्मनी की नींव 1959 में फिदेल कास्त्रो की क्रांति के समय ही पड़ गई थी। कास्त्रो ने सत्ता में आते ही अमेरिकी व्यवसायों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, जिसके जवाब में अमेरिका ने दशकों लंबा आर्थिक घेरा डाला था। शीत युद्ध के दौरान क्यूबा सोवियत संघ का सबसे भरोसेमंद साथी था। आज जब दुनिया फिर से गुटों में बंट रही है, क्यूबा ने फिर से वेनेजुएला, रूस और चीन जैसे उन देशों के साथ मजबूत गठजोड़ किया है जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देते हैं। वॉशिंगटन में नीति-निर्माता क्यूबा को लैटिन अमेरिका में अमेरिका-विरोधी गुट का मुख्य स्तंभ मानते हैं।
लैटिन अमेरिका में छिड़ा युद्ध
डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत वे पश्चिमी गोलार्ध से रूस और चीन के प्रभाव को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं। ट्रंप की नजर में क्यूबा पर दबाव बनाना उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने जैसा है जो अमेरिका के घर के करीब पनप रहा है। यदि बातचीत का दौर विफल रहता है, तो ट्रंप ने सैन्य ऑपरेशन के विकल्प को भी मेज से नहीं हटाया है। दुनिया अब इस डर में है कि क्या 2026 में लैटिन अमेरिका में एक और बड़ा युद्ध छिड़ने वाला है?
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