
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गुरुवार को एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर सामने आई जिसने राज्य के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई भेंट ने न केवल चर्चाओं को जन्म दिया है, बल्कि आगामी चुनावों से पहले एक नई वैचारिक लड़ाई का बिगुल भी फूंक दिया है। इस मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने भाजपा पर चौतरफा हमला करते हुए न केवल संतों की राजनीति पर सवाल उठाए, बल्कि सरकार की विफलताओं और आंतरिक कलह को लेकर भी तीखे तेवर दिखाए हैं।
इसे भी पढ़ें- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बड़ा ऐलान, 11 मार्च को लखनऊ में होगी ‘असली-नकली’ संतों की पहचान
बीजेपी को घेरने की रणनीति
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई इस मुलाकात के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए अखिलेश यादव ने बीजेपी पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे यहां केवल आशीर्वाद लेने आए थे। उन्होंने आगे कहा, ‘असली संतों से मिलने का अवसर मिला है और अब समय आ गया है कि नकली संतों का अंत होने जा रहा हैं। अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर उन तमाम स्वयंभू संतों और धर्मगुरुओं पर एक बड़ा प्रहार माना जा रहा है, जिन्हें लेकर विपक्ष लगातार भाजपा पर संरक्षण देने के आरोप लगाता रहा है। यह बयान यह दर्शाता है कि समाजवादी पार्टी अब हिंदुत्व और संत परंपरा के मुद्दे पर भाजपा को उसी के पाले में घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।
गाय और डेयरी के मुद्दे को उठाया

भाजपा पर हमलावर होते हुए सपा प्रमुख ने गाय और डेयरी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने याद दिलाया कि, जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तो उन्होंने गरीब किसानों के उत्थान और गायों की बेहतर देखभाल के लिए विशेष योजनाएं बनाई थीं। अखिलेश ने कहा, हमारी सरकार में प्रदेश का पहला काऊ मिल्क प्लांट लगाया गया था, जिसका उद्देश्य न केवल दूध का उत्पादन बढ़ाना था, बल्कि गायों की सुरक्षा और उनकी आर्थिक उपयोगिता सुनिश्चित करना भी था लेकिन भाजपा की सरकार ने हर अच्छी बात का विरोध करने की अपनी पुरानी आदत के चलते उस प्लांट को ही बंद करवा दिया।
उन्होंने दावा किया कि सपा हमेशा से गायों की भलाई के लिए कार्य करती रही है और भविष्य में भी उनकी पार्टी गायों के कल्याण के लिए बड़े और दूरगामी फैसले लेने से पीछे नहीं हटेगी।
बैठक से बाहर किए गए डिप्टी सीएम
प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर निशाना साधते हुए अखिलेश यादव ने तंज कसा कि भाजपा की हालिया बैठकों में क्या हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी की बैठक से दोनों डिप्टी सीएम को डांटकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि बैठक का एजेंडा संभवतः टिकट वितरण और चुनावी रणनीति पर चर्चा करना था, लेकिन स्थिति यह है कि भाजपा के ये नेता शायद कहीं से चुनाव लड़ भी लें, तो उनकी जीत सुनिश्चित नहीं है। सपा प्रमुख का यह बयान भाजपा के भीतर जारी आपसी अंतर्कलह और सत्ता के समीकरणों में चल रही उठापटक को उजागर करने की कोशिश माना जा रहा है।
रसोई गैस संकट पर भी बोले अखिलेश
महंगाई और बुनियादी जरूरतों को लेकर अखिलेश यादव ने केंद्र और प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के गलत फैसलों और नीतियों का खामियाजा आज आम जनता भुगत रही है। प्रदेश के कई हिस्सों में एलपीजी का गहरा संकट पैदा हो गया है, जिसके चलते लोगों को मजबूरन घरों में चूल्हे और भट्टियां जलानी पड़ रही हैं।
जिनके ध्यान मात्र से मिलता आशीर्वाद है
उनके साक्षात् दर्शन का मिला सौभाग्य है!सच्चे संत का सम्मान ही सनातन का सम्मान है। pic.twitter.com/zV3tQrArRX
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) March 12, 2026
अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के अपने जिले में गैस सिलेंडर के लिए मारामारी मची है। लोग गैस के लिए आपस में लड़ रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जनता के बीच में भी थोड़ा बहुत ‘मुख्यमंत्री का प्रभाव’ आ गया है, शायद इसीलिए लोग अब लाइन में लगने के बजाय आपस में लड़ रहे हैं। सपा प्रमुख का यह तंज जनता की हताशा और सरकार की विफलता को एक साथ जोड़ने की कोशिश थी।
राजनीतिक चाल है ये मुलाकात
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह मुलाकात केवल आशीर्वाद तक सीमित नहीं है। शंकराचार्य जैसे बड़े धार्मिक व्यक्तित्व के साथ उनकी यह सार्वजनिक भेंट एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है। एक ओर जहां भाजपा खुद को हिंदू धर्म के सबसे बड़े रक्षक के रूप में पेश करती है, वहीं अखिलेश यादव का संतों के एक बड़े वर्ग के साथ संवाद करना यह दिखाता है कि सपा धर्मनिरपेक्ष राजनीति के साथ-साथ ‘सांस्कृतिक हिंदुत्व’ के दायरे में भी भाजपा को चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
आगामी समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा का यह असली बनाम नकली संत का नैरेटिव जनता के बीच कितना असर करता है। फिलहाल, योगी सरकार और भाजपा के लिए अखिलेश यादव का यह आक्रामक रुख नई चुनौतियां पेश कर रहा है, खासकर तब जब वे सीधे मुख्यमंत्री के कार्यक्षेत्र और पार्टी के आंतरिक मामलों पर सवाल उठा रहे हैं।
इसे भी पढ़ें- शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने फूंका ‘गौरक्षार्थ धर्म युद्ध’ का बिगुल



