
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर जहां एक्शन, रोमांस और बड़े-बड़े स्टार्स वाली फिल्में छाई रहती हैं, वहीं एक ऐसी साइकोलॉजिकल थ्रिलर ने सबका ध्यान खींच लिया है जो समाज की गहरी परतों को छूती है और दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है। नेटफ्लिक्स पर 27 फरवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म ‘अक्यूज्ड’ रिलीज के कुछ ही घंटों में भारत सहित कई देशों में ट्रेंडिंग नंबर 1 पर पहुंच गई। यह फिल्म न केवल रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ जैसी बड़ी रिलीज को पीछे छोड़कर टॉप पर आई, बल्कि ग्लोबली 84 देशों में ट्रेंडिंग लिस्ट में जगह बनाई।
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हटके है फिल्म की कहानी
निर्देशक अनुभूति कश्यप की यह फिल्म ‘डॉक्टर जी’ के बाद एक और हटके कहानी लेकर आई है, जो #MeToo जैसे संवेदनशील मुद्दे को एक नए नजरिए से पेश करती है। फिल्म की कहानी लंदन में सेट है और केंद्र में दो महिलाओं का रिश्ता है, डॉ. गीतिका सेन (कोंकणा सेन शर्मा) और डॉ. मीरा (प्रतिभा रांटा)। दोनों एक शादीशुदा लेस्बियन कपल हैं। गीतिका एक सफल और प्रतिष्ठित गायनेकोलॉजिस्ट हैं, जो अस्पताल में सबसे कम उम्र की हेड ऑफ डिपार्टमेंट हैं और जल्द ही डीन बनने वाली हैं। उनका करियर चरम पर है, जीवन संतुलित लगता है और मीरा के साथ उनका रिश्ता मजबूत और प्यार भरा है।

मीरा एक पैडियाट्रिशियन हैं, जो मीठी और संवेदनशील हैं। दोनों मिलकर एक बच्चा गोद लेने का फैसला करते हैं और इस खुशी का ऐलान भी कर देते हैं। लेकिन ठीक अगले दिन गीतिका की जिंदगी उलट-पुलट हो जाती है।कहानी में असली ट्विस्ट तब आता है जब एक अनाम मैसेज से शुरू होता है। गीतिका पर सेक्सुअल मिसकंडक्ट और हैरासमेंट का गंभीर आरोप लगता है। आरोप लगाने वाला कोई अनजान शख्स है, लेकिन खबर आग की तरह फैल जाती है। सोशल मीडिया, अस्पताल के सहकर्मी और मीडिया सब इसमें शामिल हो जाते हैं, जो गीतिका कल तक अस्पताल की स्टार डॉक्टर थीं, उन्हें पहले सस्पेंड कर दिया जाता है, फिर छुट्टी पर भेजा जाता है और अंततः नौकरी जाने की नौबत आ जाती है। आरोपों की वजह से उनका प्रोफेशनल रेपुटेशन तबाह होने लगता है। मीरा का मां बनने का सपना भी धीरे-धीरे बिखरने लगता है।
कोकणा सेन की दमदार एक्टिंग
फिल्म रिश्तों की परीक्षा, समाज की पारंपरिक सोच, पावर डायनामिक्स और पर्सेप्शन के खेल को गहराई से दिखाती है। क्या गीतिका वाकई दोषी हैं या यह एक सिस्टेमेटिक फ्रेम-अप है? फिल्म इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है।फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके अभिनय हैं। कोंकणा सेन शर्मा ने डॉ. गीतिका के किरदार को बेहद संयमित, डिग्निफाइड और प्रभावशाली तरीके से निभाया है। उनकी परफॉर्मेंस में हर इमोशन – गुस्सा, दर्द, शक और मजबूती सब दिखता है, बिना ओवरएक्टिंग के।
कोंकणा ने इस भूमिका में अपनी एक्टिंग की गहराई दिखाई है, खासकर उन सीन में जहां वे आरोपों से जूझ रही हैं और अपनी पत्नी के साथ रिश्ते की उलझनें सुलझा रही हैं। प्रतिभा रांटा, जो ‘लापता लेडीज’ से जानी जाती हैं, ने मीरा के किरदार में कमाल का संतुलन दिखाया है। मीरा का किरदार भावुक लेकिन मजबूत है, वह गीतिका का साथ देती है, लेकिन खुद भी टूटती है। दोनों एक्ट्रेसेस की केमिस्ट्री फिल्म को इमोशनल वेट देती है। सपोर्टिंग कास्ट में सुकांत गोयल, मोनिका महेंद्रू और मशहूर अमरोही जैसे कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।निर्देशक अनुभूति कश्यप ने फिल्म को एक स्लो-बर्न थ्रिलर की तरह बनाया है। शुरुआत से ही टेंशन बनाए रखती है। हर सीन में सस्पेंस है कि अगला क्या होगा।
फिल्म को मिले हैं 3.5 स्टार्स
स्क्रिप्ट सीमा अग्रवाल और यश केशवानी द्वारा लिखी गई #MeToo डिस्कोर्स को बैलेंस्ड तरीके से पेश करती है। यह न सिर्फ आरोपी की साइड दिखाती है, बल्कि पीड़ित की संभावित पीड़ा, सोसाइटी के जजमेंट और पावर इम्बैलेंस पर भी रोशनी डालती है। फिल्म लंदन के कोल्ड और पेल एनवायरनमेंट को बैकग्राउंड में इस्तेमाल करके मनोवैज्ञानिक दबाव को और बढ़ाती है। सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर (नील अधिकारी) फिल्म के मूड को सपोर्ट करते हैं। हालांकि, फिल्म की कुछ कमियां भी हैं।

कई रिव्यूज में कहा गया है कि क्लाइमेक्स उतना चौंकाने वाला नहीं है जितना एक डार्क थ्रिलर से उम्मीद की जाती है। आखिरी कुछ मिनट कुछ दर्शकों को साधारण या प्रेडिक्टेबल लग सकते हैं। कुछ क्रिटिक्स ने लिखा कि स्क्रिप्ट में ज्यादा डेप्थ की कमी है और ब्रिटिश सपोर्टिंग कास्ट थोड़ी कमजोर लगती है। मिक्स्ड रिव्यूज के बावजूद फिल्म को 3 से 3.5 स्टार्स मिले हैं। फिल्म का ग्लोबल इम्पैक्ट भी कमाल का है। रिलीज के बाद यह नेटफ्लिक्स पर इंडिया में नंबर 1 रही और वर्ल्डवाइड टॉप 10 में नंबर 2 पर पहुंची। यह भारतीय सिनेमा में क्वियर रिलेशनशिप और #MeToo जैसे मुद्दों पर बोल्ड तरीके से बात करने वाली फिल्मों की नई लहर का हिस्सा लगती है।
सोचने पर मजबूर करती है फिल्म
कोंकणा सेन शर्मा ने इंटरव्यू में कहा कि हर कहानी ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होती और फिल्म इसी ग्रे एरिया को एक्सप्लोर करती है। कुल मिलाकर ‘अक्यूज्ड’ एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ एंटरटेन नहीं करती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। अगर आप साइकोलॉजिकल थ्रिलर, सोशल कमेंट्री और मजबूत परफॉर्मेंस पसंद करते हैं, तो यह नेटफ्लिक्स पर जरूर देखें। 106 मिनट की यह फिल्म आपको स्क्रीन से बांधे रखेगी और खत्म होने के बाद भी दिमाग में घूमती रहेगी।
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