
हिंदू पंचांग के अनुसार 24 फरवरी दिन मंगलवार से होलाष्टक शुरू हो चुका है। ये तीन मार्च तक चलेगा। होलाष्टक फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन पूर्णिमा यानी होलिका दहन तक चलता है, जो इस साल 3 मार्च को होगी। इन दिनों में शुभ मुहूर्त पर कोई भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, नामकरण आदि वर्जित माने जाते हैं।
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नकारात्मक ऊर्जा रहती है

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलाष्टक में होलिका दहन की तैयारी के दौरान नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, इसलिए इन दिनों नए कार्य शुरू करने से बचना चाहिए। होलाष्टक के अलावा भी हिंदू कैलेंडर में कई ऐसे मौके आते हैं जब मांगलिक कार्य पूरी तरह प्रतिबंधित रहते हैं। ये अवधियां ग्रहों की स्थिति, पितरों की श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी होती हैं। आइए जानते हैं उन 5 प्रमुख मौकों के बारे में जब शुभ कार्य नहीं किये जाते।
पितृ पक्ष
पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन अमावस्या (सर्व पितृ अमावस्या) तक चलता है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। मांगलिक कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है क्योंकि यह समय पूर्वजों को समर्पित होता है। इस साल पितृ पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक रहेगा। इन 15 दिनों में विवाह, गृहप्रवेश या कोई नया कार्य शुरू करना अशुभ माना जाता है, क्योंकि इससे पितरों की अशांति हो सकती है।
चातुर्मास
चातुर्मास भगवान विष्णु की योगनिद्रा का चार महीने का काल है, जो देवशयनी एकादशी से शुरू होकर देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। इस दौरान देवता सो जाते हैं, इसलिए शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। भक्त उपवास, जप और तपस्या करते हैं। इस साल चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू होकर 20 नवंबर 2026 तक चलेगा। इन महीनों में विवाह, मुंडन या कोई नया निर्माण कार्य नहीं किया जाता, क्योंकि यह समय आध्यात्मिक साधना का माना जाता है।
ग्रहण काल
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के समय शुभ कार्य पूरी तरह वर्जित होते हैं। ग्रहण के दौरान सूतक लगता है, और पूजा-पाठ तक सीमित रहते हैं। इस साल 2026 में प्रमुख ग्रहण इस प्रकार हैं
पहला चंद्र ग्रहण: 3 मार्च 2026 को लगेगा, जो पूर्ण चन्द्र ग्रहण होगा।
सूर्य ग्रहण: हरियाली अमावस्या पर (जून-जुलाई के आसपास)
दूसरा चंद्र ग्रहण: सावन पूर्णिमा (रक्षाबंधन) पर लगेगा।
ग्रहण काल में घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते और सूतक के नियमों का पालन किया जाता है। ग्रहण के बाद शुद्धिकरण के बाद ही कार्य शुरू होते हैं।
पंचक
पंचक पांच दिनों का योग है जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि के अंतिम पांच नक्षत्रों (धनिष्ठा अंतिम भाग, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती) में रहता है। पंचक पांच प्रकार के होते हैं। रोग पंचक, नृप पंचक, चोर पंचक, मृत्यु पंचक और अग्नि पंचक। इन दिनों में कोई नया कार्य, विवाह या निर्माण शुरू नहीं किया जाता, क्योंकि इससे नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। पंचक लगभग हर महीने पड़ता है, जैसे जनवरी, फरवरी, मार्च आदि में। इन दिनों में अंतिम संस्कार जैसे कार्य भी विशेष नियमों से किए जाते हैं।
खरमास और अधिकमास
ग्रहों की कमजोर स्थिति और अतिरिक्त मास खरमास तब लगता है जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करता है। इन राशियों में सूर्य और बृहस्पति का प्रभाव कमजोर पड़ता है, जो शुभ कार्यों के लिए आवश्यक हैं, इसलिए इन अवधियों में मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। अधिकमास तीन साल में एक बार आता है, जो एक अतिरिक्त चंद्र मास होता है। इस दौरान भी शुभ कार्य टाले जाते हैं।
इस साल अधिकमास 15 मई 17 जून 2026 तक रहेगा। यह मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इसमें व्रत-उपवास से पुण्य प्राप्ति होती है, लेकिन विवाह आदि कार्य नहीं होते। ये सभी अवधियां हिंदू धर्म में धार्मिक, ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व रखती हैं। इन दिनों में शुभ कार्य टालकर लोग उपवास, पूजा-पाठ और दान-पुण्य पर ध्यान देते हैं। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इन नियमों का पालन करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और अशुभ प्रभाव कम होते हैं। होलाष्टक के साथ इन मौकों पर ध्यान देकर लोग अपने जीवन को संतुलित और शुभ बनाते हैं।
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