SC का सख्त फैसला: SIR में रुकावट बर्दाश्त नहीं, ममता बनर्जी की याचिका पर की सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जोयमलया बागची और एन.वी. अंजारिया शामिल हैं’ ने स्पष्ट संदेश दिया कि SIR में किसी भी तरह की बाधा या रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने कहा, “हम SIR में किसी भी बाधा की अनुमति नहीं देंगे। यह बात सभी राज्यों को समझ लेनी चाहिए।

डीजीपी को शो-कॉज नोटिस जारी करने का निर्देश

कोर्ट की ये टिप्पणी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका सहित संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान आई, जहां चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए आरोपों (धमकी, हिंसा और जबरन रुकावट) पर पश्चिम बंगाल के डीजीपी को शो-कॉज नोटिस जारी कर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि, SIR एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जो पूरे देश में समान रूप से लागू होती है। कोर्ट ने दोहराया कि मतदाता सूची का अंतिम निर्णय केवल चुनाव रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) द्वारा ही लिया जाएगा। माइक्रो-ऑब्जर्वर्स या अन्य सहायक अधिकारी कोई अंतिम आदेश नहीं दे सकते, वे केवल सहायता प्रदान करेंगे।

बढ़ाई गई समय सीमा 

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR की समयसीमा बढ़ाते हुए दस्तावेजों की जांच और आपत्तियों के निपटारे के लिए 14 फरवरी से एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में SIR प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए थे।

SIR

उन्होंने आरोप लगाया कि ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ कैटेगरी में मतदाताओं को गलत तरीके से वर्गीकृत किया जा रहा है, जिससे हाशिए पर रहने वाले लाखों वोटरों के नाम हटाए जा सकते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि, सरनेम में छोटी स्पेलिंग गलतियां, शादी के बाद नाम बदलने वाली महिलाओं या घर बदलने वालों पर असमान प्रभाव पड़ रहा है।

पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने का आरोप

ममता ने कहा कि यह प्रक्रिया पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बना रही है, जबकि असम जैसे अन्य राज्यों में ऐसा रिवीजन नहीं हो रहा है। उन्होंने कोर्ट से अंतरिम राहत मांगी थी, कि किसी भी वोटर का नाम न हटाया जाए, खासकर ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ लिस्ट वालों का। पिछली सुनवाई में ममता बनर्जी स्वयं सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई थीं और लोकतंत्र की रक्षा की अपील की थी।

उन्होंने कहा था कि, SIR सिर्फ नाम हटाने के लिए है, न कि शामिल करने के लिए। कोर्ट ने तब चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। इस बार सुनवाई में चुनाव आयोग ने दावा किया कि, अब तक उपद्रवियों के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं हुई है, लेकिन धमकी और हिंसा की घटनाएं हुई हैं।

पश्चिम बंगाल में बढ़ा राजनीतिक तनाव

कोर्ट ने इन आरोपों पर पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगा और कहा कि प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। SIR पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग ने  विधानसभा चुनाव से पहले शुरू किया। ममता सरकार का आरोप है कि यह TMC के वोट बैंक को कमजोर करने की साजिश है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें नामों की सत्यापन किया जा रहा है।

आपको बता दें कि, यह मामला पश्चिम बंगाल में राजनीतिक तनाव को बढ़ा रहा है, क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि SIR प्रक्रिया को बिना रुकावट पूरी कराई जाएगी, लेकिन कोर्ट व्यावहारिक समाधान भी तलाश रहा है ताकि किसी वास्तविक मतदाता का अधिकार प्रभावित न हो। अगली सुनवाई में और स्पष्ट निर्देश दिए जा सकते हैं।

मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा पर जोर
कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में दस्तावेजों की जांच और आपत्तियों के निपटारे के लिए समयसीमा बढ़ाते हुए 14 फरवरी से एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। साथ ही, राज्य सरकार को 8,505 ग्रुप बी अधिकारियों को SIR ड्यूटी के लिए उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, जो माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की जगह लेंगे। यह मामला 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक तनाव बढ़ा रहा है। TMC का आरोप है कि SIR उनके वोट बैंक को कमजोर करने की साजिश है, जबकि चुनाव आयोग इसे संवैधानिक बताता है। कोर्ट प्रक्रिया को बिना रुकावट पूरा कराने के साथ वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा पर भी जोर दे रहा है। अगली सुनवाई में और स्पष्ट निर्देश आ सकते हैं 

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