सड़क दुर्घटनाओं में कमी को लेकर यूपी पुलिस की बड़ी पहल, डीजीपी ने लखनऊ में दो दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन किया

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के क्रम में पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश राजीव कृष्ण के मार्गदर्शन में यह आयोजन पुलिस मुख्यालय स्थित अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद प्रेक्षागृह में किया गया।

लखनऊ। प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाली जनहानि को न्यूनतम करने के उद्देश्य से पुलिस मुख्यालय, उत्तर प्रदेश, लखनऊ में शुक्रवार को दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। यह कार्यशाला यातायात निदेशालय, उत्तर प्रदेश एवं इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन (IRTE), फरीदाबाद (हरियाणा) के सहयोग से आयोजित की जा रही है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के क्रम में पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश राजीव कृष्ण के मार्गदर्शन में यह आयोजन पुलिस मुख्यालय स्थित अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद प्रेक्षागृह में किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेश में सड़क सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाना है।

कार्यशाला में सड़क सुरक्षा के पाँच मूलभूत स्तंभ एजुकेशन, एनफोर्समेंट, इंजीनियरिंग, इमरजेंसी केयर और इनवायरमेंट पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। इसी क्रम में नवंबर 2025 में शुरू की गई जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट (जेडएफडी) योजना के सकारात्मक परिणाम भी साझा किए गए।

जेडएफडी के पहले चरण में मिले उत्साहजनक परिणाम

जेडएफडी योजना के प्रथम चरण में प्रदेश के 20 जनपदों के 242 क्रिटिकल थानों, 89 क्रिटिकल कॉरिडोर और 3233 क्रिटिकल क्रैश लोकेशन का चिन्हांकन कर योजनाबद्ध कार्रवाई की गई, जिसके परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

इन परिणामों से उत्साहित होकर योजना के द्वितीय चरण में प्रदेश के शेष 55 जनपदों के 245 सर्वाधिक दुर्घटनाग्रस्त क्रिटिकल थानों को शामिल किया गया है। इस कार्यशाला में इन 55 जनपदों से 44 राजपत्रित यातायात अधिकारी, 55 निरीक्षक/उपनिरीक्षक यातायात तथा 55 क्रिटिकल कॉरिडोर टीम प्रभारी भाग ले रहे हैं।

30 से 58 प्रतिशत तक घटीं दुर्घटनाएं : डीजीपी राजीव कृष्ण 

कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए निरंतर जन-जागरूकता और प्रभावी प्रवर्तन सबसे अहम हैं। उन्होंने कहा कि यातायात जागरूकता केवल नवंबर माह तक सीमित न रहकर पूरे वर्ष चलाई जानी चाहिए।उन्होंने अलीगढ़-बुलंदशहर, कानपुर-हमीरपुर और लखनऊ-सीतापुर मार्गों पर जेडएफडी के पायलट प्रोजेक्ट का उदाहरण देते हुए बताया कि केंद्रित पेट्रोलिंग और दुर्घटनाओं के कारणों की गहन जांच से मात्र दो महीनों में 30 से 58 प्रतिशत तक दुर्घटनाओं में कमी आई है।

डीजीपी ने यह भी स्पष्ट किया कि भारी जुर्माने से ज्यादा जरूरी है कि हर उल्लंघन पर निश्चित दंड मिले, जिससे नियमों के प्रति जवाबदेही बने। उन्होंने ओवर-स्पीडिंग पर मोबाइल अलर्ट, एआई कैमरों और ऑटोमैटिक चालान व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता बताई।

कार्यक्रम के दौरान आईआरटीई के अध्यक्ष डॉ. रोहित बलूजा ने सड़क दुर्घटना जांच में पुलिस और परिवहन विभाग के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि दुर्घटना जांच वैज्ञानिक, तथ्य-आधारित और तकनीकी साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए, केवल “तेज रफ्तार” या “लापरवाही” जैसे शब्द पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने भारतीय न्याय संहिता को मोटर व्हीकल अधिनियम से जोड़कर मजबूत कानूनी केस तैयार करने का सुझाव दिया तथा ‘ट्रेनर्स को ट्रेन’ मॉडल अपनाने की भी वकालत की।

अधिकारियों से प्रशिक्षण को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की अपील

कार्यशाला में अपर पुलिस महानिदेशक (यातायात एवं सड़क सुरक्षा) ए. सतीश गणेश ने प्रतिभागियों को सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम और जनहानि को न्यूनतम करने के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी।अंत में अधिकारियों से अपील की गई कि वे इस प्रशिक्षण को अपने-अपने जनपदों में पूरी निष्ठा से लागू करें, ताकि प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों को न्यूनतम किया जा सके।

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