नई दिल्ली। मोदी सरकार एक प्रोटोकॉल बनाने की योजना बना रही है, ताकि राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जितना सम्मान मिले। इस लेकर हाल ही में होम मिनिस्ट्री की एक हाई-लेवल मीटिंग हुई थी, जिसमें इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई थी। हालांकि, भारतीय संविधान के अनुसार, राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन कानूनी और ज़रूरी प्रोटोकॉल के मामले में दोनों में काफी अंतर है।

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मीटिंग में हुई चर्चा
असल में, राष्ट्रगान गाते समय खड़ा होना अनिवार्य है और इसका अपमान करने वाले को प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 के तहत सज़ा मिलती है। दूसरी तरफ, राष्ट्रगीत वंदे मातरम गाते समय खड़े होने के लिए कोई कानूनी बाध्यता या लिखा हुआ नियम नहीं है।

एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि, होम मिनिस्ट्री की एक मीटिंग में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। मीटिंग के दौरान, राष्ट्रगान गाने के नियमों और निर्देशों के साथ-साथ सम्मान के तरीके पर भी चर्चा हुई। साथ ही मीटिंग में इस बात पर भी चर्चा हुई कि, क्या वंदे मातरम गाने के समय, जगह और तरीके के लिए साफ़ नियम बनाए जाने चाहिए? क्या राष्ट्रगान की तरह इसे भी गाते समय खड़े होना ज़रूरी कर देना चाहिए? क्या राष्ट्रगीत का अपमान करने वालों पर जुर्माना या कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए?
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब मोदी सरकार साल भर वंदे मातरम मना रही है और भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति के चलते राष्ट्रगान के महत्व को कम करने का आरोप लगाया है।
विवाद का कारण
दरअसल, 1937 के कांग्रेस सेशन में वंदे मातरम के कुछ छंद हटा दिए गए थे। BJP का आरोप है कि, इसी पॉलिसी ने बंटवारे की नींव रखी। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि, BJP इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है। इसे लेकर पिछले कुछ वर्षों में, कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें मांग की गई है कि, वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा फ्रेमवर्क दिया जाए।
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आजादी का सबसे बड़ा नारा बना

केंद्र की मोदी सरकार ने साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि, राष्ट्रीय गीत के लिए अभी तक ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत इसका अपमान करने वाले को सजा दी जाये। बता दें कि, वन्देमातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1880 के दशक में लिखा था, जो स्वदेशी आंदोलन (1905-08) के दौरान आज़ादी का सबसे बड़ा नारा बनकर उभरा। अब केंद्र की मोदी सरकार इसे इसकी पुरानी शान वापस दिलाने के लिए प्रयासरत है। 1880 में लिखा गया ये गीत 1882 में नॉवेल आनंदमठ में पब्लिश हुआ था। यह आज़ादी की लड़ाई के दौरान देशभक्ति का सिंबल बन गया। हालांकि, इस गाने में मातृभूमि को देवी दुर्गा के तौर पर दर्शाने और मूर्ति पूजा के ज़िक्र की वजह से कुछ मुस्लिम समुदायों ने इस पर एतराज़ जताया। परिणामस्वरूप साल 1937 से ये राजनीतिक और धार्मिक विवाद का विषय बन गया।
मुस्लिमों ने जताया विरोध
बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे 1875 के आसपास बंगाली और संस्कृत के मिक्स में लिखा था। इस गीत को सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 के कांग्रेस सेशन में गाया था। हर किसी के दिलों में जोश भरने वाला ये गीत 1905 में बंगाल के बंटवारे के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ एक खास नारा बन गया था। ये वक्त ऐसा था जब हर भारतीय चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम सबकी जुबां पर ये गीत रहता था, लेकिन इस गाने में भारत माता को दुर्गा और मूर्ति पूजा का जिक्र था, जो मुस्लिमों को नागवार लग रहा था, ऐसे में कुछ समय बाद उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था।
1950 में मिला था राष्ट्रीय गीत का दर्जा
आलोचकों और जमीयत उलेमा-ए-हिंद का मानना है कि, ये गीत इस्लाम में एकेश्वरवाद (सिर्फ एक भगवान की पूजा) के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि इस्लाम में पूजा सिर्फ अल्लाह तक ही सीमित है। इसे लेकर साल 1930 और 1940 के दशक में मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका कड़ा विरोध किया था। इसके चलते जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 1937 में गाने के सिर्फ पहले दो हिस्सों को ही माना, जिनमें मूर्ति पूजा का कोई ज़िक्र नहीं था।

इसके बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। अब BJP और दूसरे ग्रुप की मांग है कि, वन्देमातरम को राष्ट्रगान जितना ही सम्मान मिलना चाहिए। विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। वन्देमातरम को लेकर उपजे विवाद के मामले के सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि, इसे गाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसका सम्मान जरूर करना चाहिए।
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