लखनऊ: प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शंकराचार्य से जुड़े विवाद के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धर्म, राष्ट्र और सनातन को लेकर कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। सीएम योगी ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि आज कुछ लोग धर्म की आड़ लेकर सनातन धर्म को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और समाज को ऐसे तत्वों से सतर्क रहने की जरूरत है।
उन्होंने ऐसे लोगों की तुलना रामायण के ‘कालनेमि’ से करते हुए कहा कि ये बाहर से धार्मिक दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से धर्मविरोधी एजेंडे पर काम करते हैं। उनके इस बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा कि आखिर रामायण में वर्णित कालनेमि कौन था।
रामायण में वर्णित एक मायावी राक्षस
कालनेमि का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कालनेमि रावण की सेना का एक शक्तिशाली राक्षस था। कथाओं में उसे रावण के मामा मारीच का पुत्र बताया गया है। वह न केवल बलशाली था, बल्कि छल, कपट और माया में भी निपुण माना जाता था। रावण के आदेशों का पालन करते हुए वह कठिन से कठिन कार्यों को अंजाम देने के लिए जाना जाता था।
हनुमान जी को रोकने के लिए रावण की चाल
लंका युद्ध के दौरान रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण को शक्ति बाण से घायल कर दिया था, जिससे वे मूर्छित हो गए और उनके प्राण संकट में पड़ गए। वैद्य सुशेण ने श्रीराम को बताया कि लक्ष्मण को बचाने के लिए सूर्योदय से पहले द्रोण पर्वत से संजीवनी बूटी लानी होगी। श्रीराम के आदेश पर हनुमान जी तुरंत आकाश मार्ग से द्रोण पर्वत की ओर रवाना हुए। यह सूचना जब रावण तक पहुंची, तो उसने हनुमान जी को रोकने के लिए कालनेमि को भेजा।
साधु का वेश और माया का जाल
हनुमान जी को भ्रमित करने के लिए कालनेमि ने साधु का रूप धारण किया। उसने रास्ते में माया से एक सुंदर आश्रम और शांत सरोवर का निर्माण कर दिया। आकाश मार्ग से गुजरते समय हनुमान जी को वह आश्रम दिखाई दिया, जहां साधु बने कालनेमि ने उन्हें आदरपूर्वक आमंत्रित किया। उसने स्नान, फलाहार और विश्राम का आग्रह किया। हनुमान जी पहले आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन साधु के सरल वचनों से प्रभावित होकर कुछ समय रुक गए।
मगरमच्छ के हमले से खुला राज
सरोवर में स्नान के दौरान एक राक्षसी मगरमच्छ ने हनुमान जी पर हमला कर दिया। पवनपुत्र ने तत्काल उसका वध कर दिया। मरते समय उस राक्षसी ने सच्चाई उजागर की कि साधु वास्तव में कोई तपस्वी नहीं, बल्कि रावण का दूत कालनेमि है।
हनुमान जी के हाथों कालनेमि का अंत
जब कालनेमि को यह आभास हो गया कि उसका भेद खुल चुका है, तो उसने हनुमान जी से युद्ध छेड़ दिया। हालांकि, शक्तिशाली बजरंगबली ने एक ही प्रहार में उसका वध कर दिया और इसके बाद बिना रुके संजीवनी बूटी लेने द्रोण पर्वत की ओर आगे बढ़ गए।
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