‘रत्ती भर का भी फर्क नहीं’—आखिर क्या होती है ये रत्ती? 90% लोग बोलते हैं, लेकिन असली मतलब नहीं जानते

लखनऊ: हम रोजमर्रा की बातचीत में अकसर कहते हैं कि ‘रत्ती भर का भी फर्क नहीं पड़ा’, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर यह रत्ती होती क्या है? यह शब्द इतना आम हो चुका है कि लोग बिना इसके वास्तविक अर्थ को जाने इसका इस्तेमाल करते रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि रत्ती सिर्फ एक मुहावरा नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास से जुड़ी एक बेहद अहम और सटीक माप इकाई रही है। आइए जानते हैं इस छोटे से शब्द के पीछे छिपा पूरा अर्थ और इसका रोचक इतिहास।

क्या है ‘रत्ती’ का असली मतलब
दरअसल, रत्ती जौ या गुंजा के बीज को कहा जाता है। प्राचीन भारत में इसे एक मानक वजन इकाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। खास तौर पर सोना, चांदी, हीरे और अन्य कीमती रत्नों को तौलने में रत्ती का प्रयोग किया जाता था। रत्ती का मतलब बेहद सूक्ष्म मात्रा से होता है, यानी इतनी कम कि उसका अंतर महसूस करना लगभग नामुमकिन हो।

कितना होता है एक रत्ती का वजन
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो एक रत्ती का वजन लगभग 0.121 ग्राम माना जाता है। पुराने समय में जब आधुनिक तराजू और डिजिटल कांटे उपलब्ध नहीं थे, तब व्यापारी और सुनार गुंजा के बीज के वजन के आधार पर कीमती धातुओं का मूल्य तय करते थे। उस दौर में रत्ती को बेहद भरोसेमंद और सटीक माप माना जाता था।

‘रत्ती भर का अंतर नहीं’ का भावार्थ
समय के साथ जब आधुनिक माप प्रणालियां प्रचलन में आईं, तो रत्ती का व्यावहारिक उपयोग कम हो गया। हालांकि, भाषा और कहावतों में इसका स्थान आज भी कायम है। जब कोई कहता है कि ‘रत्ती भर का अंतर नहीं’, तो उसका सीधा सा मतलब होता है कि दो चीजों में बिल्कुल भी फर्क नहीं है। आज यह मुहावरा राजनीति, खेल, व्यापार और आम जीवन की बातचीत में खूब सुनाई देता है।

सटीकता और ईमानदारी का प्रतीक
रत्ती केवल एक माप इकाई नहीं थी, बल्कि सटीकता, निष्पक्षता और ईमानदारी का भी प्रतीक मानी जाती थी। पुराने जमाने में सौदे रत्ती के हिसाब से तय होते थे, इसलिए इसमें जरा सी भी गड़बड़ी भरोसे को तोड़ सकती थी। यही कारण है कि आज भी पूर्ण समानता या बिल्कुल बराबरी दिखाने के लिए ‘रत्ती भर’ शब्द अपने आप जुड़ जाता है।

भाषा में आज भी जिंदा है रत्ती
कुल मिलाकर, रत्ती भले ही आज तराजू से गायब हो चुकी हो, लेकिन हमारी भाषा और सोच में उसकी मौजूदगी अब भी बरकरार है। यही वजह है कि जब भी कहा जाता है ‘रत्ती भर का फर्क नहीं’, तो उसका मतलब एकदम साफ होता है—फर्क इतना भी नहीं, जितना एक रत्ती के बराबर हो।

 

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