
नई दिल्ली: 26 जनवरी अब सिर्फ चार दिन दूर है और देश 77वां गणतंत्र दिवस पूरे शौर्य और गर्व के साथ मनाने जा रहा है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाली परेड को लेकर जोरदार तैयारियां चल रही हैं। सेना के अभ्यास और मार्चिंग के कई वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं, जिनमें जवानों का जोश और अनुशासन साफ नजर आ रहा है। कुमाऊं रेजिमेंट के मार्चिंग दस्ते का एक वीडियो भी चर्चा में है, जिसमें जवान कदमताल करते हुए मीम सॉन्ग गाते दिख रहे हैं।
21 तोपों की सलामी का जोरदार रिहर्सल
गणतंत्र दिवस से पहले एक और वीडियो सामने आया है, जिसमें जवान 21 तोपों की सलामी का अभ्यास कर रहे हैं। इस साल पहली बार स्वदेशी 105MM लाइट फील्ड गन से 21 तोपों की सलामी दी जाएगी। कुल आठ गन 52 सेकेंड में 21 गोले दागेंगी। ये ब्रिटिश दौर की 25-पाउंडर गनों की जगह ले रही हैं और मेक इन इंडिया की बड़ी सफलता मानी जा रही हैं। यही तोपें ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर भी इस्तेमाल की जा चुकी हैं।
स्वदेशी 105mm लाइट फील्ड गन की ताकत
105mm लाइट फील्ड गन पूरी तरह स्वदेशी है। इसकी रेंज करीब 17.5 किलोमीटर है और यह प्रति मिनट छह राउंड तक फायर कर सकती है। गणतंत्र दिवस पर 21 तोपों की सलामी एक बेहद टाइम-क्रिटिकल प्रक्रिया होती है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा झंडा फहराने, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की सलामी और राष्ट्रगान के साथ बिल्कुल सटीक तालमेल में पूरा किया जाता है। राष्ट्रगान के 52 सेकेंड के दौरान ही सलामी दी जाती है।
1950 से चली आ रही गौरवशाली परंपरा
21 तोपों की सलामी की परंपरा 26 जनवरी 1950 से चली आ रही है। India After Gandhi किताब के मुताबिक, पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जब तिरंगा फहराया था, तब तीन चरणों में 21 तोपों की सलामी दी गई थी। तब से लेकर आज तक यह परंपरा देश के सम्मान और सैन्य गौरव का प्रतीक बनी हुई है।
भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल का पहली बार प्रदर्शन
77वें गणतंत्र दिवस पर पहली बार भारत अपनी स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल को दुनिया के सामने पेश करेगा। यह लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल है, जिसे खासतौर पर भारतीय नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर DRDO ने विकसित किया है। लाइट फील्ड गन के साथ-साथ इस बार कर्तव्य पथ पर भारत की हाइपरसोनिक ताकत भी पूरी दुनिया देखेगी।
क्यों खतरनाक है ये हाइपरसोनिक हथियार
यह मिसाइल ध्वनि की गति से कई गुना तेज है, जिससे दुश्मन के रडार इसे न तो पकड़ सकते हैं और न ही ट्रैक कर सकते हैं। इसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर तक बताई जा रही है। यह अलग-अलग पेलोड ले जाने में सक्षम है और समुद्र में तैनात दुश्मन के जहाजों व एयरक्राफ्ट कैरियर तक को तबाह करने का दम रखती है। यही वजह है कि इसकी चर्चा इस समय इस्लामाबाद से लेकर बीजिंग तक हो रही है।
समुद्र में भारत की ताकत कई गुना बढ़ाएगी मिसाइल
DRDO इस समय हाइपरसोनिक ग्लाइड और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम कर रहा है। नौसेना में शामिल होने के बाद यह मिसाइल हिंद महासागर में चीन की चुनौतियों से निपटने में बड़ी भूमिका निभाएगी। जरूरत पड़ी तो ऑपरेशन सिंदूर 2.0 जैसे हालात में पाकिस्तान के लिए भी यह मिसाइल बड़ी परेशानी बन सकती है।



