दिल्ली की हवा साफ करेगी ‘एल्गी’, 40 जगहों पर लगेंगी मशीनें, जानें कैसे करेंगी काम

नई दिल्ली। जोहड़ों और झीलों में हरी परत के रूप में दिखने वाली काई अब राजधानी की जहरीली हवा से राहत दिलाने में भूमिका निभा सकती है। सूक्ष्म शैवाल यानी एल्गी पर आधारित तकनीकों के जरिए दिल्ली में प्रदूषण घटाने की तैयारी है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की इस योजना के तहत शहर के 40 अलग-अलग स्थानों पर नई तकनीकों वाली मशीनें लगाई जाएंगी। परियोजना पर कुल 104 करोड़ रुपये खर्च होंगे। हर साल सर्दियों में गैस चैंबर बन जाने वाली दिल्ली के लिए यह एक नया प्रयोग माना जा रहा है।

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40 पैकेजों में बंटी परियोजना

पूरी परियोजना को 40 पैकेजों में बांटा गया है और हर पैकेज की अनुमानित लागत 2.6 करोड़ रुपये रखी गई है। चयनित कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ उपकरण लगाने तक सीमित नहीं होगी। उन्हें इन मशीनों का संचालन और रखरखाव भी करना होगा। शुरुआती अनुबंध एक साल का होगा। यानी पहले साल के नतीजे देखकर ही आगे की दिशा तय की जाएगी।

अधिकारियों के मुताबिक, इस योजना में स्टार्टअप और अन्य कंपनियों को भी मौका दिया जा रहा है। मकसद यह है कि, नई सोच और नवाचार को बढ़ावा मिले और प्रदूषण से निपटने के लिए कई तरह के समाधान आजमाए जा सकें। अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तकनीकें लगने से यह भी परखा जा सकेगा कि, जमीनी स्तर पर कौन-सी तकनीक ज्यादा कारगर है।

क्या है ‘लिक्विड ट्री’ तकनीक

योजना में जिस तकनीक की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह ‘लिक्विड ट्री’ है। इसमें एक खास किस्म की एल्गी को पानी के साथ पारदर्शी चैंबर में रखा जाता है। चैंबर के निचले हिस्से से प्रदूषित हवा छोड़ी जाती है। हवा जब पानी से होकर गुजरती है, तो एल्गी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड सोख लेती है और बदले में ऑक्सीजन छोड़ती है।

Algae will clean Delhi's air,

जिस तरह पेड़ अपने पत्तों से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन देते हैं, उसी सिद्धांत पर यह मशीन भी काम करती है। फर्क यह है कि, इसके लिए बहुत कम जगह चाहिए। महानगरों में, जहां पेड़ लगाने की जमीन आसानी से नहीं मिलती, ऐसी तकनीक को एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। इसी वजह से इसे ‘ऑक्सीजन की फैक्ट्री’ कहा जा रहा है।

एल्गी की खासियत यह है कि, सही रोशनी और पोषक तत्व मिलने पर यह तेजी से बढ़ती है और प्रकाश संश्लेषण भी तेजी से करती है। हालांकि इन मशीनों के लिए नियमित देखभाल जरूरी होती है। पानी बदलना, एल्गी की सेहत देखना और चैंबर की सफाई जैसे काम समय पर न हों, तो असर घट सकता है, इसलिए कंपनियों पर संचालन और रखरखाव की शर्त जोड़ी गई है।

किन जगहों पर लगेंगी मशीनें

मशीनें ऐसी जगहों पर लगाई जा सकती हैं, जहां लोगों की आवाजाही ज्यादा रहती है और प्रदूषण का स्तर भी अपेक्षाकृत अधिक होता है। इनमें शामिल हैं:

  • कनॉट प्लेस
  • खान मार्केट
  • चांदनी चौक
  • डिफेंस कॉलोनी
  • प्रमुख बस अड्डे
  • अस्पताल
  • दिल्ली विश्वविद्यालय का नॉर्थ कैंपस

बाजारों, बस अड्डों और अस्पतालों जैसी जगहों को चुनने की वजह साफ है। यहां रोज हजारों लोग पहुंचते हैं और ये जगहें लोगों को दिखती भी हैं। ऐसे में तकनीक के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

नतीजे पर मिलेगा पैसा

इस योजना की सबसे अलग बात इसका भुगतान मॉडल है। कंपनियों को केवल मशीन लगा देने भर से पैसा नहीं मिलेगा। उनके प्रदर्शन की लगातार निगरानी की जाएगी और प्रदूषण में तय लक्ष्य के मुताबिक कमी दर्ज होने पर ही भुगतान किया जाएगा। यानी कंपनियों को अपनी तकनीक की प्रभावशीलता खुद साबित करनी होगी।

अधिकारियों का कहना है कि इस व्यवस्था से तकनीक के असली नतीजों पर जोर रहेगा। अब तक कई सरकारी परियोजनाओं में उपकरण खरीदने और लगाने पर तो खर्च हो जाता है, लेकिन उनका असर नापने की ठोस व्यवस्था नहीं होती। इस बार भुगतान को परिणाम से जोड़कर इसी कमी को दूर करने की कोशिश की गई है।

दिल्ली के सामने बड़ी चुनौती

दिल्ली की हवा खराब करने में कई कारक एक साथ काम करते हैं। वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, उद्योग, कचरा जलाना और आसपास के राज्यों में पराली जलाने जैसी वजहें इनमें गिनी जाती हैं। सर्दियों में हवा की रफ्तार कम होने और तापमान गिरने से प्रदूषक जमीन के पास ही फंस जाते हैं, जिससे हालात और बिगड़ते हैं। ऐसे में किसी एक तकनीक से समस्या का हल निकलने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसी वजह से सरकार अलग-अलग मोर्चों पर कई उपाय आजमा रही है।

असर पर अभी सवाल

हालांकि, इन मशीनों का राजधानी की कुल हवा पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। 40 जगहों पर लगी मशीनें इतने बड़े शहर की हवा को कितना बदल पाएंगी, इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके अलावा, एल्गी आधारित तकनीकें मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने के लिए जानी जाती हैं, जबकि दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे महीन कण हैं। इन कणों को घटाने में ये मशीनें कितनी कारगर होंगी, यह परियोजना के आंकड़ों से ही पता चलेगा। यही वजह है कि कंपनियों के प्रदर्शन की निगरानी और भुगतान को नतीजों से जोड़ने की शर्त अहम हो जाती है।

सही आकलन तभी संभव होगा, जब मशीनें काम करना शुरू करेंगी और प्रदूषण के स्तर में दर्ज होने वाली वास्तविक कमी के आंकड़े सामने आएंगे। एक साल के अनुबंध की अवधि में जो नतीजे मिलेंगे, वही तय करेंगे कि यह तकनीक दिल्ली के लिए कितनी उपयोगी है।

इसे राजधानी की हवा साफ करने की दिशा में एक नई कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अगर परिणाम उम्मीद के मुताबिक रहे, तो भविष्य में इस तकनीक का दायरा बढ़ाया जा सकता है। और अगर नहीं रहे, तो भी इस प्रयोग से यह सीख जरूर मिलेगी कि दिल्ली की हवा के लिए कौन-सी तकनीकें काम करती हैं और कौन-सी नहीं।

 

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