
नई दिल्ली। बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल से जुड़े केस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और ये अधिकार बच्चों पर भी बराबर लागू होता है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का हवाला देते हुए कहा कि, बच्चों को इस अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।
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सुरक्षा और आजादी विरोधी नहीं
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि, हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं और बच्चों को दोनों ही अधिकार मिलने चाहिए। पीठ ने सुझाव दिया कि, बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने के बजाय सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए ‘चाइल्ड मोड’ जैसे उपाय अपनाकर उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत किया जाना चाहिए।
बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के मामले में आई टिप्पणी
एक रिपोर्ट के अनुसार, यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन सेवाओं से बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दे रही थी।

अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यही पीठ ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ की उस याचिका की सुनवाई कर रही है, जिसमें सितंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान अदालत इस मुद्दे को बेहद गंभीर बता चुकी है और केंद्र सरकार से कहा था कि, वह ऐसी सामग्री के ऑनलाइन अपलोड होने या सामने आने को रोकने पर ध्यान दे।
इन अधिकारों से वंचित करना बेतुका
बेंच ने कहा कि, उसे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि, अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अदालत के अनुसार बच्चों को, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, यही अधिकार प्राप्त हैं।
अदालत ने कहा कि, उन्हें इन अधिकारों से पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि, एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों के पास न तो कोई ऐसी चेतना है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए और न ही कोई ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है जिसे व्यक्त किया जाना चाहिए।
पूरी पाबंदी कोई समाधान नहीं
पीठ ने माना कि इंटरनेट अपने मौजूदा रूप में बच्चों की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करता है, लेकिन अदालत ने साफ किया कि, चूंकि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हानिकारक सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने में विफल रहे हैं, इसलिए बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच को सीमित करना ऐसा होगा, मानो समस्या के लिए पीड़ित को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा हो।
अदालत ने इस पर भी विचार किया कि, क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। निष्कर्ष यह रहा कि, पूरी तरह पाबंदी लगाना इसका समाधान नहीं है।
सीखने और जानकारी का बड़ा जरिया
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ में जानकारी और विचारों को जानने, प्राप्त करने और साझा करने का अधिकार भी शामिल है। इंटरनेट को विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और जानकारी के बाजार के रूप में बताते हुए अदालत ने कहा कि, इसका महत्व केवल ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री तक सीमित नहीं है। यह सीखने, बातचीत करने और जानकारी तक पहुंचने के अवसर भी देता है। अदालत ने कहा कि, कई बच्चों के लिए, खासकर दूर-दराज के इलाकों में, इंटरनेट अक्सर सीखने और जानकारी पाने का एकमात्र जरिया होता है।
विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए अहम
पीठ ने यह भी कहा कि, इंटरनेट विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। उनके लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शायद एकमात्र ऐसी जगह हो सकती है, जहां उन्हें समान परिस्थितियों का सामना कर रहे अन्य लोगों का साथ मिल सके। यानी अदालत ने इंटरनेट को सिर्फ मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और सहारे का साधन भी माना है।
पुराने फैसलों को बनाया आधार
पीठ ने ‘अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ’ मामले में 2020 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि, इंटरनेट के जरिए बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी तथा कोई भी व्यापार या कारोबार करने की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) के तहत मौलिक अधिकार के रूप में संवैधानिक रूप से संरक्षित है।
उस फैसले में अदालत ने इस पर कोई राय नहीं दी थी कि इंटरनेट तक पहुंचने का अधिकार अपने आप में मौलिक अधिकार है या नहीं। ताजा फैसले में यह सवाल सीधे तौर पर हल कर दिया गया है।
पीठ ने ‘प्रज्ञा प्रसून व अन्य बनाम भारत संघ’ मामले में 2025 के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें अदालत ने डिजिटल पहुंच के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।
क्यों अहम है फैसला
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बहस चल रही है और कई जगह बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी की मांग उठ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन का रास्ता सुझाया है, जिसमें बच्चों को इंटरनेट से दूर करने के बजाय प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने और सुरक्षा के तकनीकी उपाय अपनाने पर जोर है।
अब निगाहें इस पर रहेंगी कि केंद्र सरकार और सोशल मीडिया कंपनियां अदालत के निर्देशों और सुझावों पर किस तरह अमल करती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्र ने पहले अदालत को बताया था कि इस संबंध में एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जा रही है। फैसले के बाद बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा के नियमों को लेकर बहस और तेज हो सकती है, वहीं डिजिटल पहुंच को मौलिक अधिकार मानने के इस रुख का असर भविष्य के नीतिगत फैसलों पर भी दिख सकता है।
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