
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को अभी लगभग एक साल बाकी है, लेकिन सभी राजनीतिक दल एक्टिव हो चुके हैं और चुनावी बिसात बिछाने में जुट गये हैं। सभी दल दलितों और पिछड़ों को अपने पाले में लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने भी अपनी रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है, जिसकी एक बड़ी बानगी आज राजधानी लखनऊ में देखने को मिल रही है। बहुजन समाज के बड़े प्रतीक और दलित राजनीति के शिखर पुरुष मान्यवर कांशीराम की जयंती से ठीक दो दिन पहले, कांग्रेस के कद्दावर नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज लखनऊ के दौरे पर हैं, जिससे राजधानी में सियासी हलचल तेज हो गई है।
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बुद्धिजीवियों से करेंगे संवाद
राहुल गांधी आज लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के जुपीटर हॉल में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। यहां वे विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों संवाद करेंगे। कांग्रेस नेता का ये संवाद केवल प्रतीकात्मक मुलाकात नहीं है, बल्कि पार्टी की उस दूरगामी रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह अपने पुराने और सबसे विश्वसनीय दलित-पिछड़ा वोट बैंक को वापस पाने की जद्दोजहद कर रही है। कांग्रेस इस आयोजन को सामाजिक परिवर्तन दिवस के रूप में मना रही है, जो सीधे तौर पर कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन के नारे से प्रेरि है।

इस विशेष सम्मेलन में राहुल गांधी देश और प्रदेश के जाने-माने दलित विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले बुद्धिजीवियों और युवा छात्र नेताओं के साथ सीधा संवाद कर रहे हैं। इस बहुजन संवाद का मुख्य केंद्र बिंदु संविधान की रक्षा और सामाजिक न्याय का वह मुद्दा है, जिसे राहुल गांधी पिछले लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर उठा रहे हैं।
15 मार्च को है कांशीराम जयंती
गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी के इर्द-गिर्द सिमटी रही, लेकिन अब कांग्रेस कांशीराम की विरासत पर अपना दावा ठोकती नजर आ रही है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि, दलित समाज का एक बड़ा तबका वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में नया विकल्प तलाश रहा है। ऐसे में राहुल गांधी का यह संवाद उस वैचारिक नेतृत्व को साथ जोड़ने की कोशिश है, जो समाज की दिशा तय करता है। सम्मेलन में जाति जनगणना, आरक्षण की स्थिति और हाशिए पर खड़े समुदायों की सत्ता में भागीदारी जैसे ज्वलंत विषयों पर विस्तार से चर्चा की जा रही है।
बता दें कि, 15 मार्च को कांशीराम की जयंती है और इससे ठीक पहले राहुल गांधी का लखनऊ आना यह संदेश देता है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रख रही है। इससे पहले 11 मार्च को राहुल गांधी का रायबरेली दौरा किन्हीं कारणों से टल गया था, लेकिन उसके तुरंत बाद लखनऊ के इस कार्यक्रम को प्राथमिकता देना बताता है कि, पार्टी दलित चेतना को साधने के इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती।
न्याय योद्धाओं की फ़ौज तैयार कर रही कांग्रेस
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का कहना है कि, कांशीराम किसी एक व्यक्ति या पार्टी की बपौती नहीं हैं, बल्कि उनके विचार और उनका संघर्ष पूरे वंचित समाज के लिए है, जिसे अब राहुल गांधी आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस के लिए यह राह इतनी आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश के जटिल जातिगत समीकरणों में बहुजन समाज पार्टी का आधार आज भी मजबूत है, खासकर जाटव समुदाय में मायावती का प्रभाव एक बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में गैर-जाटव दलित समुदायों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार किया है, जिसे भेद पाना किसी भी विपक्षी दल के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस अब अपनी पुरानी ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित सोशल इंजीनियरिंग को नए कलेवर में पेश करने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी के पीडीए के जवाब में कांग्रेस अपनी खुद की सामाजिक न्याय की पिच तैयार कर रही है। इसी कड़ी में पार्टी केवल बड़े कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने के लिए न्याय योद्धाओं की एक नई फौज तैयार की जा रही है।
दलित वोटों में है बिखराव
प्रदेश भर में 375 न्याय योद्धाओं को नियुक्त करने की जिम्मेदारी कांग्रेस के विधि विभाग को सौंपी गई है। ये योद्धा न केवल दलितों और पिछड़ों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न की घटनाओं पर नजर रखेंगे, बल्कि उन लोगों की हर स्तर पर कानूनी मदद भी करेंगे जो मुकदमा लड़ने में सक्षम नहीं हैं। यह कदम कांग्रेस की उस छवि को गढ़ने की कोशिश है, जिसमें वह खुद को पीड़ितों के साथ खड़े होने वाले रक्षक के रूप में पेश कर सके।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल दलित वोटों का बिखराव स्पष्ट नजर आ रहा है। एक तरफ भाजपा अपने हिंदुत्व और लाभार्थी कार्ड के जरिए इस वर्ग को जोड़े रखना चाहती है, तो दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस इसमें सेंधमारी की फिराक में हैं। राहुल गांधी का आज का लखनऊ संवाद इस बात का संकेत है कि, आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का मुख्य केंद्र जाति जनगणना और हिस्सेदारी ही रहने वाला है।
कांग्रेस इस मुद्दे को लखनऊ के गलियारों से उठाकर गांवों की चौपालों तक ले जाने की योजना बना रही है। राहुल गांधी के इस दौरे ने बसपा और भाजपा दोनों ही खेमों में हलचल बढ़ा दी है। अब देखना यह होगा कि लखनऊ के इस वैचारिक मंथन से जो अमृत निकलेगा, वह 2027 के चुनावों में कांग्रेस की चुनावी नैया पार लगाने में कितना सहायक सिद्ध होता है।
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