नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने आयातित हाइड्रोकार्बनों पर भारत की गहरी निर्भरता को लेकर चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक सप्लाई बाधा के कारण उत्पन्न होने वाले आर्थिक जोखिम उजागर हो रहे हैं। यह चुनौती स्ट्रक्चरल है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 87% आयात करता है, जिससे अर्थव्यवस्था वैश्विक सप्लाई झटकों और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। तेल और गैस मिलकर भारत के वार्षिक आयात बिल का लगभग 176 अरब डॉलर हिस्सा बनाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के प्रति अधिक प्रभावित रहती है।
उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि ताज़ा संकट इस बात की याद दिलाता है कि ऊर्जा सुरक्षा का आर्थिक स्थिरता से गहरा संबंध है।चूँकि वैश्विक तेल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, इसलिए क्षेत्र में किसी भी प्रकार की स्थिति बिगड़ने पर भारत के लिए ऊर्जा लागत तेजी से बढ़ सकती है, जिससे महंगाई, चालू खाता घाटे और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि ताज़ा संकट घरेलू अन्वेषण और उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाने की आवश्यकता को और अधिक रेखांकित करता है। यह प्रयास आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के साथ भी मेल खाता है। वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सरकार से इस क्षेत्र को तुरंत राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित करने का आग्रह किया है।
अग्रवाल ने कहा, “आज के अशांत भू-राजनीतिक माहौल में किसी संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में होने वाला कोई भी संघर्ष, जैसे कि ईरान में जारी संघर्ष, भारत को असुरक्षित बना देता है, क्योंकि भूमिगत प्राकृतिक संसाधनों के लिए हमारी आयात पर भारी निर्भरता है।
हमें इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित करना चाहिए, अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल बनाना चाहिए और घरेलू उत्पादन में तेजी से वृद्धि को सक्षम बनाना चाहिए।यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि इस दशक के अंत तक भारत सरकार ऊर्जा क्षेत्र में 500 अरब डॉलर के निवेश अवसर खोलने की योजना बना रही है। आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने में अन्वेषण और उत्पादन की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की उम्मीद है।
इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के विशाल लेकिन अपेक्षाकृत कम विकसित हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में अन्वेषण को तेज़ करना है। देश में लगभग 26 तलछटी बेसिन हैं, जो करीब 33.6 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं, लेकिन इनमें से केवल एक हिस्से का ही गहन अन्वेषण किया गया है। भारत के कई स्थलीय (ऑनशोर) और समुद्री (ऑफशोर) बेसिन वैश्विक स्तर पर विकसित हाइड्रोकार्बन क्षेत्रों की तुलना में अभी भी कम खोजे गए हैं, जो बड़े पैमाने पर अप्रयुक्त संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।
अग्रवाल ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा कि भारत की हाइड्रोकार्बन संभावनाओं को उजागर करने के लिए नीति दृष्टिकोण में बदलाव आवश्यक है रेगुलेटरी जटिलताओं से हटकर अन्वेषण और निवेश को सुगम बनाने की दिशा में कदम उठाने होंगे। उन्होंने आगे कहा, “तेल और गैस क्षेत्र को कड़े रेगुलेशन से आगे बढ़कर अन्वेषण को सुगम बनाने की दिशा में जाना होगा, ताकि देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सके।
भारत का अनुभव एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहाँ बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच देश महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों पर अधिक नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।यूनाइटेड स्टेट्स अमेरिका, जो कभी हाइड्रोकार्बनों का एक बड़ा आयातक था, ने पिछले दो दशकों में अन्वेषण को बढ़ावा देने और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के बाद घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय विस्तार किया है।
भारत के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ाना दूरगामी आर्थिक प्रभाव डाल सकता है। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के अलावा, इससे आयात बिल पर दबाव कम हो सकता है और अन्वेषण, ड्रिलिंग तथा ऑयलफील्ड सेवाओं जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं।ओएएलपी (OALP) बिड राउंड-X के खुले होने के साथ, जिसके तहत भारत ने लगभग 1.92 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने वाले 25 अन्वेषण ब्लॉकों को नीलामी के लिए पेश किया है, जिनमें गहरे और अति-गहरे समुद्री ब्लॉक भी शामिल हैं। ऐसे में उच्च लागत वाली डीपवॉटर वेल ड्रिलिंग के लिए निवेश आकर्षित करना देश के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है।
जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों को नया रूप दे रहे हैं, पॉलिसी -मेकर और उद्योग जगत के नेताओं के बीच यह बहस तेज़ हो रही है कि भारत की आर्थिक मजबूती का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी घरेलू हाइड्रोकार्बन क्षमता को कितनी तेजी से विकसित कर पाता है।



