नई दिल्ली 1984 दंगे: 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में कोर्ट का फैसला आ गया है। कोर्ट ने दंगे के मुख्य आरोपी साजेंट कुमार को दफन कर दिया है। कुमार सज्जन सिंह कांग्रेस पार्टी से पूर्व न्यूनतम रह चुके हैं। स्पेशल जज दिग विनय सिंह ने राक्षस रूप से एक ग्लैमर ऑर्डर सुनाते हुए सज्जन कुमार को दफन कर दिया है। हालाँकि अभी तक विस्तृत आदेश नहीं आया है। आदेश पर आये सज्जन कुमार ने हैण्ड कोर्ट का धन्यवाद अदा किया।
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दिसंबर 2025 पूरी हुई थी सुनवा ई
अगस्त 2023 में एक जजमेंट कोर्ट ने सज्जन कुमार पर हत्या और आपराधिक साजिश के तहत दुष्कर्म किया था, लेकिन दंगा फैलाने और दुश्मनी करने का आरोप लगाया गया था। इस मामले में कोर्ट ने दिसंबर 2025 में पूरी सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे आज 22 जनवरी 2026 को सुनाया गया।

फरवरी 2015 में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) ने दिल्ली के जनकपुरी और विकासपुरी में हुई हिंसा के दौरान सज्जन कुमार के खिलाफ दो एफआईआर में एफआईआर दर्ज की थी। पहली एफआईआर जेनपुरी में हुई हिंसा से संबंधित थी, जहां 1 नवंबर, 1984 को सोहन सिंह और उनके सहयोगी अवतार सिंह की हत्या कर दी गई थी। दूसरी एफआईआर गुरबचन सिंह के मामले में दर्ज की गई थी, जिसमें कथित तौर पर 2 नवंबर, 1984 को विकासपुरी में जिंदा जला दिया गया था।
2018 दिल्ली उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा का दावा किया
पूर्व सांसद नाबालिग रहे सज्जन कुमार अभी जेल में हैं। पिछले साल 25 फरवरी को 1 नवंबर, 1984 को एक ट्रायल कोर्ट ने सरस्वती विहार इलाके में सिंह और उनके बेटे तरनदीप सिंह की हत्या के मामले में एलियंस को सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा कि दो बेगुनाह लोगों की हत्या कोई मामूली अपराध नहीं था, लेकिन यह दुर्लभ से दुर्लभतम मामला भी नहीं था, जिसके लिए सज्जन कुमार की हत्या कर दी गई।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा कि, यह मामला उसी घटना का हिस्सा था और इसे उन कहानियों की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है, जो सज्जन कुमार के लिए 17 दिसंबर, 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पालम कॉलोनी इलाके में इसी तरह के आवास में पांच लोगों की हत्या का दोषी ठहराया था।
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नानावती आयोग ने की थी जांच
बता दें कि नानावती आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 587 एफआईआर दर्ज की गईं, जिसके परिणामस्वरूप 2,733 लोगों की मौत हो गई। कुल एफआईआर में करीब 240 लोगों को पुलिस ने ‘पता नहीं’ लगाया और 250 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। हिंसा और उसके बाद के शीशों की जांच के लिए नानावती कमीशन का गठन किया गया था।

587 एफआईआर में से सिर्फ 28 में ही सजा हुई, जिसमें करीब 400 लोगों की मौत हो गई। एक पूर्व अल्पसंख्यक जिसमें लगभग 50 लोगों की हत्या का दोषी ठहराया गया था। कुमार सज्जन, जो उस समय एक कुलीन कांग्रेस नेता और अल्पसंख्यक थे, पर 1 और 2 नवंबर, 1984 को दिल्ली के पालम कॉलोनी में पांच लोगों की हत्या से जुड़े एक मामले का आरोप लगाया गया था। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई थी और साजा को चुनौती देने वाली उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में है।
इस वजह से भड़का था दंगा
1984 का सिख विरोधी दंगा मुख्य रूप से 31 अक्टूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख बॉडीगार्डों द्वारा हत्या का विरोध शुरू हुआ, जो पूरे देश में, विशेषकर दिल्ली में फैल गया। इन दंगों को अक्सर राजनीतिक परमाणु हथियारों और परमाणु हथियारों की विफलता के बीच एक “व्यवस्थित नरसंहार” माना जाता है।
असल, जून 1984 में अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में शुरू हुए ऑपरेशन (ऑपरेशन ब्लू स्टार) से सिख बहुत टूटे हुए थे और तनाव पहले से ही चरम पर था। इससे नाराज इंदिरा गांधी के दो सिख बॉडीगार्ड ने उनकी हत्या कर दी थी। गांधीजी की मौत के तुरंत बाद, सिख आश्रम, वियतनाम और गुरुद्वारों के बीच बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई। इस दंगे में हजारों सिखों की मौत हो गई थी।
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