जब श्रीकृष्णा का महारास देख सुध-बुध खो बैठा चंद्रमा, एक रात में बीत गए थे 6 महीने

श्रीकृष्णा की अनगिनत लीलाएं है, जिनके बारे में सुनने मात्र से ही मन मुग्ध हो जाता है। महारास श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं में से एक है। इसकी कल्पना गोपियों ने वृंदावन में मार्गशीर्ष के महीने में की थी। गोपियों ने वृंदावन में यमुना की रेत पर एक माह तक लगातार देवी कात्यायनी की पूजा की और रोज जाप किया। उनके प्रेम और तप के कारण प्रभु कृष्ण को आना ही पड़ा।

वहां प्रत्येक गोपी के साथ अलग-अलग रूप धारण कर कृष्ण ने महारास रचाया। इस महारास के गीत भागवत के दशम स्कंध में रास पंच अध्यायी के रूप से वर्णित किया हैं। महारास पूरे छह माह तक चला और यह रात्रि अहोरात्रि कहलाई।

कृष्‍ण का यह महारास देखकर चंद्रमा भी अपनी सुध-बुध गंवा बैठा और अपलक दृष्टि से इस महारास का साक्षी बना रहा जिसके चलते वह अपनी गति भूल गया। इस रास के कारण ही महरास एक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

मंदिरों में ठाकुर जी को श्वेत वस्‍त्र पहनाए जाते हैं। खीर, बूरे का प्रसाद लगाया जाता है साथ ही इस दिन दर्शन मध्यरात्रि तक खुले रहते हैं। केवल महरास पर बांके बिहारी ठाकुर जी बंसी धारण करते हैं।

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वर्ष में केवल एक बार ही प्रभु को इस दिन बंसी धारण करते देखा जा सकता है। दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। मान्यता यह भी है कि महारास के दिन चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं को बिखेरता है ऐसे में रात्रि को घी और बूरा अथवा खीर रात भर चांदनी रात में रखने और सुबह खाने से सांस के रोग में बड़ी राहत मिलती है।

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