
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में गैरसैंण महज एक स्थान नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन की भावनाओं, पहाड़ की आकांक्षाओं और विकास की उम्मीदों का प्रतीक रहा है। इसी गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार का दो दिवसीय विधानसभा सत्र कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
सरकार के सामने जहां वित्तीय वर्ष की जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान करने की जिम्मेदारी है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और ग्रीष्मकालीन राजधानी की भूमिका को मजबूत करने का अवसर भी है। सत्र के पहले दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 7,844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट सदन में पेश किया। इसके साथ ही वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट का कुल आकार बढ़कर 1,19,547.38 करोड़ रुपये होने का प्रावधान सामने आया।
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बजट में हरिद्वार कुंभ-2027 की तैयारियों के लिए 290 करोड़ रुपये और गैरसैंण क्षेत्र में जलापूर्ति बांध परियोजना के लिए 122 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। नए स्टेट डाटा सेंटर के निर्माण के लिए भी 40 करोड़ रुपये रखे गए हैं। ये प्रावधान बताते हैं कि, सरकार के वित्तीय एजेंडे में बुनियादी ढांचे, आगामी बड़े आयोजनों और तकनीकी सुविधाओं को जगह मिली है, लेकिन गैरसैंण सत्र का महत्व बजट के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक अहमियत यह है कि, राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी में विधानसभा की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।

वर्ष 2025 में यहां बजट और मानसून सत्र आयोजित हुए थे। वर्ष 2026 में मार्च के बजट सत्र के बाद अक्टूबर में दोबारा सत्र आयोजित होना गैरसैंण की विधायी भूमिका के विस्तार का संकेत है। मुख्यमंत्री धामी ने भी गैरसैंण को उत्तराखंड की भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बताते हुए यहां सुविधाओं के विकास और गतिविधियों को बढ़ाने की बात कही है। इंटरनेट कनेक्टिविटी, मीडिया सेंटर, पुलिसकर्मियों के लिए आवासीय सुविधाओं और भराड़ीसैंण को आधुनिक शहर के रूप में विकसित करने की योजनाओं का उल्लेख किया गया है।
सरकार की मंशा है कि, गैरसैंण की भूमिका केवल विधानसभा सत्र आयोजित करने तक सीमित न रहे, बल्कि यहां साल भर गतिविधियां बढ़ें और आसपास के क्षेत्रों को भी विकास का लाभ मिले। धामी सरकार के पक्ष में इसे गैरसैंण को संस्थागत रूप से सक्रिय बनाने की पहल के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, किसी भी राजधानी क्षेत्र की वास्तविक सफलता का पैमाना केवल वहां आयोजित होने वाली बैठकों या घोषित परियोजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन में आने वाला बदलाव होता है।
सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार और संचार सुविधाओं में कितना सुधार होता है, यही गैरसैंण के विकास की दिशा तय करेगा। विधानसभा सत्र में पेश अनुपूरक बजट भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। अतिरिक्त बजट का उद्देश्य स्वीकृत योजनाओं और आवश्यक खर्चों के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है। इसलिए असली सवाल यह होगा कि घोषित प्रावधानों में से कितना धन समय पर खर्च होता है, परियोजनाएं कितनी तेजी से पूरी होती हैं और उनका लाभ आम नागरिकों तक किस सीमा तक पहुंचता है।
विशेष रूप से पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं, ग्रामीण संपर्क मार्गों, पेयजल और रोजगार के क्षेत्र में ठोस परिणाम जनता का भरोसा मजबूत कर सकते हैं। इस सत्र में अध्यादेश और विभिन्न विभागों से जुड़े विधेयक भी सदन के पटल पर रखे गए हैं। 28 अक्टूबर यानी कि आज को अनुपूरक बजट और विधायी कार्यवाही पर चर्चा तथा मतदान निर्धारित है।
ऐसे में सत्र की सफलता का आकलन इस आधार पर भी होगा कि महत्वपूर्ण वित्तीय और विधायी प्रस्तावों पर कितनी सार्थक चर्चा होती है और जनता से जुड़े सवालों को कितना स्थान मिलता है। दूसरी ओर, गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग अब भी राज्य की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा है। कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं ने राजधानी तथा पर्वतीय विकास से जुड़े सवाल उठाए हैं।

इससे साफ है कि गैरसैंण में सत्र आयोजित करना और गैरसैंण को लेकर दशकों से चली आ रही सभी अपेक्षाओं को पूरा करना दो अलग-अलग बातें हैं। सरकार के लिए चुनौती यही है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी की भूमिका बढ़ाने के साथ-साथ पहाड़ की बुनियादी समस्याओं पर भी ठोस प्रगति दिखाई दे। मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में एक वर्ष के भीतर गैरसैंण में दो विधानसभा सत्र आयोजित होना सरकार की ओर से इस क्षेत्र को महत्व देने का एक तथ्यात्मक संकेत है।
इसे आगे बढ़ाते हुए यदि घोषित परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाता है, स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और आसपास के गांवों को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं, तो गैरसैंण की यह सक्रियता व्यापक पर्वतीय विकास से जुड़ सकती है। आखिरकार, गैरसैंण की असली पहचान विधानसभा भवन की भव्यता से नहीं, बल्कि उस भवन में लिए गए फैसलों के पहाड़ के गांवों तक पहुंचने से बनेगी। धामी सरकार के सामने अवसर भी यही है और सबसे बड़ी कसौटी भी राज्य आंदोलन की भावनाओं को विकास के ठोस परिणामों में बदलना भी है।
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