गैरसैंण में नया अध्याय: एक साल में दो विधानसभा सत्र, सीएम धामी के नेतृत्व में बदली तस्वीर

 देहरादून/गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के लिए मंगलवार का दिन ऐतिहासिक रहा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा भवन में विधानसभा सत्र की शुरुआत हो गई। इसके साथ ही गैरसैंण में पहली बार एक साल के भीतर दो विधानसभा सत्र आयोजित होने का नया अध्याय जुड़ गया। इससे पहले इसी वर्ष मार्च में भराड़ीसैंण में बजट सत्र आयोजित किया गया था। अब अक्टूबर में दोबारा सदन की बैठक होने से पर्वतीय अंचल में विधायी गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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2014 में हुई थी शुरुआत

गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। तब से यहां समय-समय पर सदन की कार्यवाही संचालित होती रही है। हालांकि इस सफर में निरंतरता का अभाव भी रहा। कुछ वर्षों में यहां कोई सत्र आयोजित ही नहीं हुआ, जबकि कुछ वर्षों में साल में केवल एक बार कार्यवाही चली।

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आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2014 में गैरसैंण में पहली बार तीन दिवसीय विधानसभा सत्र हुआ। वर्ष 2015 और 2016 में दो-दो दिन तथा 2017 में भी दो दिन का सत्र आयोजित किया गया। वर्ष 2018 में यहां विधानसभा की कार्यवाही छह दिन तक चली, जो उस समय तक की सबसे लंबी अवधि मानी जा सकती है। वर्ष 2019 में गैरसैंण में कोई सत्र नहीं हुआ। इसके बाद 2020 में पांच दिवसीय सत्र आयोजित किया गया। वर्ष 2021 में एक से छह मार्च तक भराड़ीसैंण में छह दिवसीय बजट सत्र चला।

बीच के वर्षों में सूनापन

वर्ष 2022 में गैरसैंण में विधानसभा सत्र नहीं हुआ। हालांकि इसके बाद सत्रों का सिलसिला फिर पटरी पर लौटा। वर्ष 2023 में चार दिन और 2024 में तीन दिवसीय सत्र आयोजित किया गया। वर्ष 2025 में यहां बजट सत्र के साथ मानसून सत्र भी हुआ, यानी उस वर्ष भी दो बार सदन की बैठक बैठी। अब वर्ष 2026 में मार्च के बजट सत्र के बाद अक्टूबर में दूसरी बार विधानसभा सत्र आयोजित किया जा रहा है।

इस क्रम से साफ है कि,  बीते कुछ वर्षों में गैरसैंण को विधायी गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिशें तेज हुई हैं। जहां शुरुआती वर्षों में सत्र दो-तीन दिन तक सीमित रहते थे और बीच-बीच में लंबा अंतराल आ जाता था, वहीं अब एक ही वर्ष में दो सत्रों का आयोजन इस दिशा में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।

पर्वतीय मुद्दों को मिलेगी आवाज

गैरसैंण में विधानसभा सत्रों का यह क्रम राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में इसकी भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाता है। राज्य गठन के बाद से ही पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याएं, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं, सड़क और संचार जैसे मुद्दे जनता के बीच चर्चा के केंद्र में रहे हैं। ऐसे में पहाड़ के बीच बैठकर पहाड़ के सवालों पर चर्चा करना विशेष महत्व रखता है।

पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं, विकास की जरूरतों और स्थानीय जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों को विधानसभा के माध्यम से उठाने के लिहाज से भराड़ीसैंण में सत्रों का आयोजन अहम माना जा रहा है। जनप्रतिनिधियों को पहाड़ की जमीनी हकीकत के करीब रहकर नीतियों पर विचार करने का अवसर मिलता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में एक ही वर्ष में दो बार सत्र का आयोजन गैरसैंण को राज्य की विधायी गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

गैरसैंण जनभावनाओं का प्रतीक: धामी

सत्र की शुरुआत के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गैरसैंण के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गैरसैंण उत्तराखंड की जनभावनाओं और हमारी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्रों के आयोजन के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं, जनअपेक्षाओं और विकास से जुड़े विषयों को प्राथमिकता मिले।

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धामी ने कहा कि गैरसैंण की भूमिका को सशक्त बनाना और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के संतुलित विकास को गति देना सरकार की प्रतिबद्धता है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार जनभावनाओं के अनुरूप विकास और सुशासन के संकल्प के साथ निरंतर कार्य कर रही है।

सत्र पर टिकी निगाहें

गैरसैंण में आयोजित हो रहे इस सत्र पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं। पहाड़ की जनता को उम्मीद है कि सदन में उनकी समस्याओं पर गंभीर चर्चा होगी और विकास की योजनाओं को ठोस दिशा मिलेगी। गैरसैंण को लेकर उत्तराखंड के लोगों की भावनाएं राज्य आंदोलन के दौर से ही जुड़ी रही हैं। ऐसे में यहां नियमित और अधिक सत्रों का आयोजन लोगों के बीच सकारात्मक संदेश देता है।

भराड़ीसैंण में एक साल के भीतर दो सत्रों का आयोजन गैरसैंण के सफर में मील का पत्थर माना जा रहा है। यह न केवल ग्रीष्मकालीन राजधानी की भूमिका को मजबूती देता है, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों को विधायी विमर्श के केंद्र में लाने की दिशा में भी एक अहम कदम है।

 

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