मोदी कैबिनेट ने 13 पद खाली जल्द हो सकता है विस्तार, जा सकती है इन मंत्रियों की कुर्सी

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तीसरे कार्यकाल को करीब ढाई साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान कई मंत्री मंत्रिपरिषद से बाहर हो चुके हैं, जिसकी वजह से तय संख्या के मुकाबले 13 पद खाली हैं। नतीजतन कई कैबिनेट मंत्री एक साथ तीन-तीन मंत्रालयों का कामकाज है।

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बीते दिन यानी सोमवार को भाजपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए आठ उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया। इस सूची से जो संकेत मिल रहे हैं कि, उससे ऐसा लग रहा है कि, जल्द ही दो और मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ सकता है। ऐसे में नवंबर-दिसंबर में संभावित संसद के शीतकालीन सत्र से पहले मंत्रिपरिषद के विस्तार और फेरबदल की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है।

पहली बार होगा विस्तार!  

गौरतलब है कि, पीएम मोदी ने अपने तीनों कार्यकालों में अब तकएक बार भी मंत्रिपरिषद का विस्तार नहीं किया है, लेकिन अब कुछ मंत्रियों पर बढ़ते कामकाज के दबाव को देखते हुए बड़े बदलाव के आसार दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि, इस कवायद में कुछ नए चेहरों को जगह मिल सकती है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों के विभाग भी बदले जा सकते हैं।

Cabinet Expansion

तीसरा कार्यकाल जून 2024 में शुरू हुआ था। तब दूसरे कार्यकाल के ज्यादातर मंत्रियों को दोबारा मौका मिला था। अब सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल का लगभग आधा हिस्सा पूरा कर चुकी है, इसीलिए भी मंत्रिमंडल विस्तार की संभावना को बल मिल रहा है। माना जा रहा है कि शीतकालीन सत्र से पहले कभी भी मंत्रिपरिषद में बदलाव का ऐलान किया जा सकता है।

कई मंत्रियों के पास एक से अधिक मंत्रालय

मौजूदा मोदी कैबिनेट में 12 मंत्री ऐसे हैं, जो एक से ज्यादा विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यह कुल कैबिनेट मंत्रियों का करीब 40 प्रतिशत है। दो कैबिनेट मंत्रियों के पास तो तीन-तीन बड़े मंत्रालय हैं। एक से ज्यादा मंत्रालय संभालने वालों में गृह मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, शिवराज सिंह चौहान, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, मनोहर लाल खट्टर, अश्विनी वैष्णव, प्रह्लाद जोशी और जी किशन रेड्डी शामिल हैं।

इस स्थिति की एक बड़ी वजह शिक्षा मंत्रालय से जुड़ा घटनाक्रम है। नीट-यूजी को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को अपने मौजूदा दायित्वों के साथ-साथ शिक्षा जैसे अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ रही है।

हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा खतरे में!

सोमवार की राज्यसभा सूची के बाद सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर है। उन्हें इस बार राज्यसभा का टिकट नहीं मिला है। उनका मौजूदा कार्यकाल अगले महीने पूरा हो रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले उन्हें पेट्रोलियम मंत्रालय छोड़ना पड़ सकता है। इसी तरह केंद्रीय राज्यमंत्री बीएल वर्मा का नाम भी उम्मीदवारों की सूची में नहीं है। अगर उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया तो उन्हें भी मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। पुरी और वर्मा दोनों का यह दूसरा राज्यसभा कार्यकाल है।

इससे पहले जून में भी ऐसा ही हो चुका है। तब तत्कालीन केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन को भाजपा ने दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा था, जिसके चलते दोनों को मंत्री पद छोड़ना पड़ा। इन दोनों का तो राज्यसभा में पहला ही कार्यकाल था।

81 की सीमा, मौजूदा संख्या 68

संविधान के अनुच्छेद 75(1क) के तहत केंद्रीय मंत्रिपरिषद में अधिकतम 81 मंत्री हो सकते हैं। यह संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत के बराबर है। फिलहाल मोदी सरकार में 29 कैबिनेट मंत्री, पांच राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 34 राज्यमंत्री हैं, यानी कुल 68 मंत्री। यह अधिकतम सीमा का करीब 84 प्रतिशत है।

Cabinet Expansion

अगर पुरी और वर्मा भी पद से हटते हैं तो मंत्रियों की संख्या घटकर 66 रह जाएगी। आमतौर पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद में करीब 75 मंत्री रहते हैं, लेकिन अभी अधिकतम सीमा के मुकाबले 13 मंत्रियों की गुंजाइश बची है। इन दोनों के जाने की स्थिति में कम से कम नौ नए मंत्रियों को शामिल करने की जरूरत पड़ेगी।

यूपी और पंजाब चुनाव पर पड़ सकता है असर

माना जा रहा है कि, अगला विस्तार आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश के कुछ और बड़े चेहरों को मंत्रिपरिषद में जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है। पंजाब चुनाव को देखते हुए किसी सिख नेता को मंत्री बनाए जाने के भी आसार हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि पुरी के जाने के बाद सरकार में सिख प्रतिनिधित्व शून्य हो सकता है।

ईसाई नेता को मिल सकती है जगह

मौजूदा सरकार में इस समय कोई मुस्लिम या ईसाई मंत्री नहीं है। अल्पसंख्यक चेहरों के नाम पर सिर्फ किरेन रिजिजू हैं, जो बौद्ध समुदाय से आते हैं। ऐसे में अगले विस्तार में किसी ईसाई नेता को भी जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है।

इसलिए विस्तार जरूरी

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कामकाज का संतुलन साधने की है। एक-एक मंत्री पर तीन-तीन मंत्रालयों का भार होने से नीतिगत फैसलों और योजनाओं की निगरानी पर असर पड़ने की आशंका रहती है। शिक्षा और पेट्रोलियम जैसे अहम मंत्रालयों के लिए पूर्णकालिक मंत्री की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही है।

साथ ही, कार्यकाल के मध्य बिंदु पर किया गया फेरबदल सरकार को नई ऊर्जा देने और क्षेत्रीय व सामाजिक समीकरण साधने का मौका भी देता है। अब निगाहें इस पर हैं कि संसद के शीतकालीन सत्र से पहले प्रधानमंत्री मोदी इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं।

 

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