उत्तराखंड में भी दिखा मिडिल ईस्ट संकट का असर, गहराया बिजली संकट, अघोषित कटौती शुरू

देहरादून। उत्तराखंड में जैसे-जैसे मार्च की तपिश बढ़ रही है, वैसे-वैसे राज्य की बिजली व्यवस्था चरमराने लगी है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच पैदा हुआ भारी अंतर आम जनमानस के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि, उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) को राज्य के कई इलाकों में अघोषित बिजली कटौती करनी पड़ रही है।

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मांग के सापेक्ष में कम सप्लाई

एक मार्च को पूरे उत्तराखंड में बिजली की मांग महज 3.8 करोड़ यूनिट थी, जो बढ़ती गर्मी के कारण महज कुछ ही दिनों में बढ़कर 4.5 करोड़ यूनिट के स्तर पर पहुंच गई है। इसके विपरीत, राज्य में बिजली की कुल उपलब्धता अभी 2.3 करोड़ यूनिट के आसपास ही अटकी हुई है। इस मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर ने न केवल प्रशासन की नींद उड़ा दी है, बल्कि राज्य की औद्योगिक गतिविधियों और घरेलू जीवन पर भी गहरा असर डाला है।

मौजूदा आपूर्ति की बात करें तो प्रदेश की विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं से लगभग 90 लाख यूनिट बिजली मिल पा रही है, जबकि केंद्रीय पूल से राज्य को करीब 1.3 करोड़ यूनिट बिजली आवंटित हो रही है। कुल मिलाकर, राज्य को 2.3 करोड़ यूनिट बिजली ही मिल रही है। इस अंतर को पाटने के लिए UPCL खुले बाजार से करीब 70 लाख यूनिट बिजली खरीद रहा है, लेकिन वहां भी कीमतों का रुख चिंताजनक है। एक्सचेंज में बिजली की दरें 10 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गई हैं, जिसके कारण महंगी बिजली खरीदना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

गैस आधारित पॉवर प्लांट ठप

इस बिजली संकट के पीछे एक बड़ा कारण गैस आधारित पावर प्लांटों का ठप होना है। दरअसल, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब उत्तराखंड की बिजली उत्पादन क्षमता पर भी पड़ने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों के कारण काशीपुर स्थित 214 मेगावाट क्षमता वाले ‘श्रावंती’ और ‘गामा’ पावर प्लांट पूरी तरह ठप हो गए हैं। ऐसे में अगर बाजार से महंगी गैस खरीदकर इन प्लांटों को चलाया जाता है, तो प्रति यूनिट बिजली उत्पादन की लागत 10 रुपये से भी ऊपर चली जाएगी, जो कि UPCL के लिए आर्थिक रूप से घाटे का सौदा होगा।

बिजली कटौती की मार सबसे अधिक हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रही है। यहां रोजाना दो से ढाई घंटे तक बिजली गुल रहना सामान्य हो गया है। वहीं, राज्य के छोटे कस्बों में भी उपभोक्ताओं को डेढ़ घंटे तक बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि राज्य की रीढ़ माने जाने वाले औद्योगिक क्षेत्रों पर भी इसका असर दिखने लगा है। स्टील फर्नेस से जुड़ी औद्योगिक इकाइयों में रोजाना करीब दो घंटे की कटौती की जा रही है, जिससे कंपनियों की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है और श्रमिकों के रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

चुनौतीपूर्ण हुई स्थिति

UPCL की प्रबंधन टीम के लिए एक और बड़ी चुनौती बिजली खरीद समझौते ( PPA) को लेकर आ रही है। UPCL ने पहले 500 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए PPA किया था, लेकिन तकनीकी कारणों से इसमें से 350 मेगावाट की आपूर्ति नहीं हो पाई। रही सही कसर नियामक आयोग ने पूरी कर दी, जिसने शेष 150 मेगावाट की खरीद पर भी रोक लगा दी है। अब इस PPA को पुनर्जीवित करने के लिए आयोग से दोबारा अनुमति लेनी होगी, जिसमें समय लग सकता है।

UPCL के प्रबंध निदेशक अनिल कुमार ने स्वीकार किया है कि स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मांग और आपूर्ति के अंतर को कम करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि, यदि बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग इसी गति से बढ़ती रही, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी विकट हो सकती है। फिलहाल, निगम का पूरा जोर बाजार से बिजली खरीदने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने पर है।

 

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