
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अब तेज हो गई है। सभी पार्टियों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भारतीय जनता पार्टी भी सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी के लिए कमर कस रही है और रणनीति बना रही है। बीजेपी इस बार दलित वोट बैंक को मजबूत करने पर पर खास फोकस कर रही है। पार्टी ने दलित महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर पूरे साल कार्यक्रमों का एक कैलेंडर तैयार किया है। इस कैलेंडर में करीब 15 प्रमुख दलित और वंचित समाज के महापुरुषों को शामिल किया गया है, जिनमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम से लेकर संत रविदास तक के नाम शामिल हैं।
इसे भी पढ़ें- उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय से बोला-पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की प्रकिया जारी
पीडीए को काउंटर करने का प्लान

पार्टी ने ये रणनीति मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति का जवाब देने के लिए तैयार की है। इसके साथ ही भाजपा ने बहुजन समाज की मुखिया मायावती पर सीधे हमला न करते हुए दलित महापुरुषों और उनकी विरासत का सम्मान करने का रास्ता अपनाया है। पार्टी किसी भी दलित नेता या महापुरुष से सीधे टकराव की बजाय उनके योगदान को आगे बढ़ाने और समाज के निचले तबके तक पहुंचने पर जोर दे रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार की योजनाओं को हर वर्ग तक पहुंचाने के साथ-साथ लगातार संपर्क और संवाद का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
सत्ता की कुंजी है दलित वोट बैंक
आपको बता दें कि, उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक को सत्ता की कुंजी माना जाता है। राज्य में अनुसूचित जाति (एससी) मतदाताओं की संख्या लगभग 20-22 प्रतिशत है, जो करीब 150 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। पिछले कुछ वर्षों में इस वोट बैंक में बिखराव देखने को मिला है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के बावजूद बसपा दलित वोटों पर मजबूत पकड़ बनाए रखने में सफल रही थी, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी-मोदी सरकार की नीतियों, विशेषकर कोरोना काल में मुफ्त अनाज योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं ने दलित वोट बैंक के एक बड़े हिस्से का झुकाव भाजपा की तरफ चला गया।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान बदलने के मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर और पीडीए फॉर्मूले के जरिए अखिलेश यादव ने बसपा से छिटके दलित वोटों के बड़े हिस्से को सपा के साथ जोड़ने में सफलता हासिल की। भाजपा का प्रदर्शन 2017 के 62 सीटों से घटकर 33 पर आ गया, खासकर आरक्षित सीटों पर पार्टी का रिजल्ट खराब रहा। इस झटके के बाद पार्टी ने दलित आउटरीच को प्राथमिकता दी है।
भाजपा की ‘डी पॉलिटिक्स’ रणनीति
भाजपा अब 2027 के चुनाव को जीतने के लिए ‘डी पॉलिटिक्स’ (दलित पॉलिटिक्स) पर फोकस कर रही है। पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा ने एक वर्षीय कैलेंडर तैयार किया है, जिसमें 15 से अधिक दलित और वंचित महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि पर प्रदेशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें प्रमुख रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर,कांशीराम, संत रविदास, संत गाडगे महाराज, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, उदा देवी, झलकारी बाई, वीरा पासी, लखन पासी, रमाबाई अंबेडकर, तिलका मांझी, स्वामी अछूतानंद, नारायण गुरु और अहिल्याबाई होल्कर के नाम शामिल हैं।
इसे भी पढ़ें- मेजबान उत्तर प्रदेश 18 स्वर्ण पदक के साथ इस बार भी बना चैंपियन
कलेंडर में दर्ज हैं ये नाम
यह कैलेंडर फरवरी से शुरू होकर साल भर चलता रहेगा। उदाहरण के लिए, फरवरी में संत रविदास जयंती, रमाबाई अंबेडकर, तिलका मांझी और संत गाडगे के कार्यक्रम होंगे। मार्च में सावित्रीबाई फुले स्मृति दिवस और कांशीराम जयंती शामिल हैं। सितंबर-अक्टूबर में दुर्बलनाथ खटीक, नारायण गुरु और वाल्मीकि जयंती जैसे आयोजन होंगे।

भाजपा नेताओं का कहना है कि, इन कार्यक्रमों के जरिए कार्यकर्ता दलित समाज के लोगों से सीधे मिलेंगे, उनकी समस्याएं सुनेंगे और सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाएंगे। पार्टी का मकसद है कि लगातार संपर्क से वोटरों का विश्वास जीता जाए और 2024 में छिटके वोटों को वापस लाया जाए।
पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत कर रहीं मायावती
एक तरफ अखिलेश यादव पीडीए फॉर्मूले के साथ गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की कोशिश में जुटे हैं। दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती अपनी पारंपरिक दलित बेस को मजबूत करने में लगी है, लेकिन हाल के चुनावों में उनका वोट प्रतिशत 10 प्रतिशत के आसपास सिमट गया है। भाजपा इन दोनों को काउंटर करने के लिए सोशल इंजीनियरिंग पर जोर दे रही है।पार्टी न केवल महापुरुषों की विरासत को आगे बढ़ा रही है, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं जैसे आवास, स्वच्छता कार्यकर्ताओं के लिए बीमा और सम्मान राशि बढ़ाने जैसे कदमों से भी दलित समाज को जोड़ रही है। योगी आदित्यनाथ ने कई मौकों पर दलित आइकॉन्स का जिक्र कर उनकी भूमिका को रेखांकित किया है।
दिलचस्प होगा मुकाबला
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह से सभी पार्टियां अपनी-अपनी गोटियां बिछा रही है, उसे देखकर ये कहना गलत नहीं होगा कि इस बार का चुनाव काफी दिल चस्प होने वाला है। इस बार के चुनाव में उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों और सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा इम्तिहान होगा। भाजपा की यह रणनीति दलित वोट बैंक को फिर से सॉलिड करने की कोशिश है, जबकि सपा और बसपा अलग-अलग तरीकों से इसका जवाब देने की तैयारी में हैं। यदि भाजपा सफल रही तो यह तीसरी बार सत्ता में वापसी का रास्ता आसान कर सकती है, अन्यथा विपक्षी एकता और जातीय गठजोड़ खेल बदल सकते हैं। अब ये तो आने वाला समय ही बतायेगा कि सत्ता किसके हाथ में जायेगी, लेकिन कमर सभी दलों ने कसनी शुरू कर दी है।
इसे भी पढ़ें- उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस पर राष्ट्रपति मुर्मु का संदेश, बोलीं- भारत की विकास यात्रा का मजबूत स्तंभ है यूपी



