
नई दिल्ली। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान उस वक्त हंगामा मच गया जब नेता प्रति पक्ष राहुल गांधी ने चीन से संबंधित मुद्दों को उठाते हुए पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का जिक्र किया और उसे पढ़ा। राहुल के इस बयान पर सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। भाजपा ने इसे संसदीय नियमों का उल्लंघन और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला का अपमान करार देते हुए कहा कि कांग्रेस को इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी की मांगनी चाहिए।

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पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब के जिक्र से हंगामा
इस घटना ने एक बार फिर संसद की मर्यादा और नियमों के पालन पर बहस छेड़ दी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण के बाद जब राहुल गांधी को बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने, चीन के साथ सीमा विवाद को उठाया और दावा किया कि पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब में वर्णित घटनाओं से पता चलता है कि, सरकार की नीतियां कमजोर हैं। उन्होंने किताब से उदाहरण देते हुए कहा कि 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के दौरान सरकार ने सेना की सलाह की अनदेखी की थी, जिससे सैनिकों की जान खतरे में पड़ी। राहुल ने आगे कहा कि चीन ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जा किया है और सरकार इस पर चुप्पी साधे हुए है। राहुल के इस बयान के सदन में हंगामा मच गया।

राहुल के इस बयान पर सत्ता पक्ष ने तुरंत आपत्ति जताई और कहा वे एक अप्रकाशित किताब का हवाला दे रहे हैं, जो संसदीय नियमों के खिलाफ है। दरअसल, नियम 352 के तहत, सांसदों को केवल प्रमाणित और सूचीबद्ध स्रोतों से उदाहरण देने की अनुमति है। अप्रकाशित सामग्री को सदन में उठाना मर्यादा का उल्लंघन माना जाता है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी राहुल को कई बार चेतावनी दी और कहा उन्हें सदन में तथ्यों और नियमों के दायरे में रहकर ही बोलना चाहिए। अगर कोई सदस्य नियमों का पालन नहीं करता, तो मुझे अन्य सदस्यों को अवसर देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।”
सूचीबद्ध नहीं था मुद्दा
स्पीकर ने राहुल को पांच बार रोका और कहा कि चीन का मुद्दा चर्चा के लिए सूचीबद्ध नहीं है, इसलिए इसे न उठाएं। इस चेतावनी के बावजूद राहुल ने अपना बयान जारी रखा, जिस पर भाजपा सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी। ‘शर्म करो’, ‘माफी मांगो’ जैसे नारे गूंजे। सदन की कार्यवाही कुछ मिनटों के लिए स्थगित करनी पड़ी। स्पीकर ने बाद में कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों का दायित्व है और नियमों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सदन के बाहर मीडिया से बातचीत में कहा, “राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर का अपमान किया है। वे विपक्ष के नेता हैं, लेकिन शुरुआत से ही नियमों की अनदेखी कर रहे थे। उन्होंने एक ऐसी किताब से उद्धरण दिए, जिसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है और प्रकाशन की कोई जानकारी नहीं है। यह शर्मनाक है। राहुल गांधी को देश से माफी मांगनी चाहिए।” रिजिजू ने कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, “कांग्रेस बताए कि, 1959 और 1962 में चीन ने जो भारतीय जमीन कब्जाई, उसे वापस लाने के लिए क्या किया? कांग्रेस के पापों के लिए राहुल को माफी मांगनी चाहिए। क्या किसी बड़े परिवार में जन्म लेने से कोई व्यक्ति संसद से ऊपर हो जाता है? भारत लोकतांत्रिक देश है, यहां नियम सबके लिए बराबर हैं।” रिजिजू ने आगे कहा, संसद किसी व्यक्ति की जागीर नहीं है। यह नियमों और परंपराओं से चलती है। राहुल ने चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे को बिना सूचीबद्ध कराए उठाया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। उन्होंने सवाल किया कि जो सांसद स्पीकर के फैसले का पालन नहीं करते, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए? रिजिजू ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल के नियम उल्लंघन पर तालियां बजा रहे थे, जो सदन की मर्यादा को ठेस पहुंचाता है।
राजनाथ सिंह ने भी जताई आपत्ति

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी राहुल के बयान पर आपत्ति जताई। रक्षामंत्री ने सदन मे कहा “अप्रकाशित किताब या संस्मरण से उदाहरण देना नियमों के खिलाफ है। चीन सीमा एक गंभीर मुद्दा है, इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। सरकार ने गलवान में सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया और सीमा पर मजबूती से खड़ी है।” राजनाथ ने कहा कि राहुल का स्रोत भरोसेमंद हो सकता है, लेकिन संसदीय प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा, आजादी के बाद ऐसा पहली बार ऐसा हुआ कि किसी सांसद को एक ही बात दोहराने से पांच बार रोका गया। यह पूर्व नियोजित लग रहा था। राहुल का भाषण शर्मनाक और निंदनीय है। उचित कार्रवाई होनी चाहिए।” पाल ने राहुल पर आरोप लगाया कि वे सदन को राजनीतिक मंच बना रहे हैं, जबकि चर्चा राष्ट्रपति अभिभाषण पर होनी चाहिए।
विपक्ष ने घेरा
विपक्ष ने इस विवाद पर सत्ता पक्ष को घेरा। राज्यसभा सांसद और आरजेडी नेता मनोज झा ने कहा, “सदन ने अपने ही नियमों से दूरी बना ली है। मैंने कई बार पत्रिकाओं और प्रकाशित स्रोतों का हवाला दिया है, कभी आपत्ति नहीं हुई, लेकिन अब पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब पर सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या इसे प्रकाशित होने की अनुमति मिलेगी?” झा ने चिंता जताई कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने भी कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “बार-बार नेहरू का नाम लेकर विपक्ष के चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं। संसद में सांसदों के लिए कुछ शेष नहीं बचा। उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। देश की जनता जवाब देगी।” बनर्जी ने कहा कि सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज दबा रहा है, जो संसदीय परंपरा के खिलाफ है।
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