
26/11 हमले के दोषी अजमल कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाने वाले सरकारी वकील उज्ज्वल निकम का नाम देश में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अदालत में उनकी दलीलों और जीत के किस्से लोगों ने खूब सुने हैं, लेकिन देश के लिए लड़ी गई इस लड़ाई की सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई? इस सवाल का जवाब उनके अपने परिवार के पास है। इसी अनकही दास्तान को पर्दे पर उतारने आई है फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’।
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कोर्टरूम से आगे की कहानी
फिल्म साफ दिखाती है कि खूंखार अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाना कितना कठिन काम है। मगर यह कहानी सिर्फ अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। इसमें निकम की निजी जिंदगी की झलक भी है, जहां देश की जिम्मेदारी संभालते-संभालते उनके अपने पीछे छूटते चले गए।

पर्दे पर वकील के पीछे से वह पिता उभरता है, जो देश के लिए लड़ते हुए अपने बेटे से दूर होता गया। बाप-बेटे के बीच के भावुक दृश्य इस कहानी की असली जान हैं। यही वजह है कि फिल्म कानूनी ड्रामा होने के बावजूद दिल को छूने का काम करती है।
राजकुमार राव फिर छाए
सरकारी वकील की भूमिका में राजकुमार राव ने एक बार फिर साबित किया है कि वे किरदार को सिर्फ निभाते नहीं, उसे जीते हैं। उनकी दमदार अदाकारी ने फिल्म को देखने लायक बना दिया है। अदालत में आक्रामक तेवर और घर के सन्नाटे में बेबसी, दोनों रंग उन्होंने इतनी सहजता से पकड़े हैं कि सीधे दिल पर असर करते हैं। क्लोजिंग स्टेटमेंट वाले दृश्य में तो तालियां बजाने का मन करता है।
अजमल कसाब के किरदार में ललित प्रभाकर इस कदर ढल गए हैं कि उन्हें देखकर गुस्सा आता है। अदालत में कसाब का कबूलनामा बिल्कुल असली लगता है, जो उनके अभिनय की सबसे बड़ी कामयाबी है। वामिका गब्बी का किरदार छोटा जरूर है, लेकिन असरदार है। वे अपने अभिनय से दर्शकों को भावुक कर देती हैं। बचाव पक्ष के वकील की भूमिका में सिकंदर खेर भी दमदार नजर आते हैं। जयदीप अहलावत फिल्म में चौंकाते हैं। उनका यह संवाद कि “केस खत्म हो जाए, फिर परिवार को वक्त दूंगा” सीधे दिल को छू जाता है।
पर्दे पर संजीदगी से उतरी हकीकत
निर्देशक अविनाश अरुण ने कानूनी दांव-पेंच के साथ परिवार की भावनाओं और तन्हाई को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उन्होंने भावनात्मक पहलू को कहीं भी कमजोर नहीं पड़ने दिया। चाहे बाप-बेटे का रिश्ता हो या पति-पत्नी के बीच की अनकही बातें, हर जगह जज्बात को महसूस कराने में वे कामयाब रहे हैं।
आज के दौर में जब ज्यादातर निर्माता मसाला फिल्मों पर पैसा लगाते हैं, ऐसे में निर्माता दिनेश विजन की तारीफ करनी होगी। उन्होंने कंटेंट को चुना और इस कहानी को दर्शकों तक पहुंचाया।
देखने से पहले यह जान लें
फिल्म देखने जाने से पहले एक बात समझ लेना जरूरी है। ‘प्रहार’ सिर्फ 26/11 मुंबई हमले का री-क्रिएशन नहीं है। कोर्टरूम की सुनवाई के बीच हमला कब और कैसे हुआ और पुलिस ने आतंकियों को कैसे रोका, इसके कुछ दृश्य जरूर आते हैं, लेकिन फिल्म का असली फोकस आतंकी हमले पर नहीं, बल्कि सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की निजी और कानूनी जंग पर है। जो दर्शक हमले के ब्योरे की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें थोड़ी निराशा हो सकती है।

कुछ दिनों पहले उज्ज्वल निकम ने बताया था कि उन्होंने फिल्म के मेकर्स के सामने शर्त रखी थी कि उन्हें हीरो की तरह न दिखाया जाए, बल्कि हकीकत दिखाई जाए। फिल्म इसी सोच के साथ बनी भी है। उनके किरदार को जरूरत से ज्यादा ग्लैमराइज नहीं किया गया है। इसके बावजूद पर्दे पर बिना कुछ कहे वे हीरो ही लगते हैं।
संजय दत्त को भी दिलवाई थी सजा
फिल्म की एक कमी यह है कि निकम का योगदान जितना दिखाया गया है, असल में वह उससे कहीं बड़ा है। फिल्म उनकी जिंदगी के एक अहम मुकदमे और 26/11 केस पर ही केंद्रित रहती है, जबकि उनका कानूनी सफर सिर्फ इसी केस तक सीमित नहीं रहा।
अवैध हथियार मामले में संजय दत्त को जेल की सजा दिलाने में भी उज्ज्वल निकम की अहम भूमिका थी। इसके अलावा उन्होंने 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट, गुलशन कुमार हत्याकांड और प्रमोद महाजन की हत्या जैसे कई बड़े और चर्चित मामलों में भी अभियोजन पक्ष की पैरवी की। उनकी जिंदगी और करियर की इस व्यापक कहानी में कई और अहम अध्याय हैं, जिन्हें फिल्म में जगह नहीं मिल पाती।
जीत के शोर के पीछे की ख़ामोशी
‘प्रहार’ एक ऐसी फिल्म है जो अदालती जीत के शोर के पीछे की खामोशी को आवाज देती है। राजकुमार राव का दमदार अभिनय, कसाब बने ललित प्रभाकर की असरदार मौजूदगी और बाप-बेटे के संवेदनशील दृश्य इसे खास बनाते हैं। हां, निकम के पूरे करियर की झलक की चाह रखने वालों को यह फिल्म अधूरी लग सकती है, लेकिन अगर आप एक वकील के पिता बनने और पिता के वकील बने रहने की कशमकश देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके वक्त की हकदार है।
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