बीमा कमीशन पर घमासान: ब्रोकर्स बोले, 10 लाख लोगों की रोजी-रोटी पर संकट, PMO दे दखल

  • IRDAI के प्रस्तावित कमीशन कैप और खर्च में कटौती पर IBAI को आपत्ति

  • कहा- ग्राहकों को सस्ते प्रीमियम की कोई गारंटी नहीं

नई दिल्ली। बीमा क्षेत्र के नियामक IRDAI के प्रस्तावित बदलावों को लेकर इंश्योरेंस ब्रोकर्स की संस्था खुलकर विरोध में उतर आई है। ‘इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (IBAI) ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर मामले में दखल देने की मांग की है। संस्था का दावा है कि, प्रस्ताव लागू हुए, तो पांच साल में 10 लाख से ज्यादा लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।

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क्या है IRDAI का प्रस्ताव?

IRDAI ने बीते 23 सितंबर को एक परामर्श पत्र (कंसल्टेशन पेपर) जारी किया था। इसमें देश में बीमा वितरण और कमीशन के ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव है। इसका मकसद वितरण ढांचे को सरल बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और गलत बिक्री (मिस-सेलिंग) पर रोक लगाना है। कमीशन की लागत घटाकर ग्राहकों के लिए प्रीमियम सस्ता करना भी लक्ष्य है।

IRDAI

प्रस्ताव में अलग-अलग बीमा उत्पादों और चैनलों पर 30 से ज्यादा तरह के कमीशन कैप, यानी अधिकतम सीमा, लगाने की बात है। बीमा कंपनियों के कुल खर्च की सीमा में करीब एक-तिहाई की कटौती का प्रावधान भी है।

कहां है आपत्ति

नरेंद्र भरिंडवाल की अगुवाई वाली IBAI ने साफ किया है कि, वह गलत बिक्री रोकने के IRDAI के प्रयासों का समर्थन करती है, लेकिन उसका तर्क है कि, प्रस्तावित कमीशन सीमा और खर्च पर पाबंदियों से पॉलिसीधारकों, ब्रोकर्स, रोजगार, प्रतिस्पर्धा और बीमा क्षेत्र में निवेश पर बुरा असर पड़ सकता है।

ये हैं आपत्तियां

30 से ज्यादा कमीशन कैप

अलग-अलग चैनलों से मिलने वाले कमीशन में काफी अंतर होता है,  इसलिए संस्था को इतनी तरह की सीमाएं मंजूर नहीं हैं।

ब्लैंकेट कैप का विरोध

संस्था का कहना है कि कमीशन पर एक समान सीमा लगाने से बाजार की स्वाभाविक ग्रोथ रुक जाएगी।

ग्राहकों को लाभ की गारंटी नहीं

पत्र के मुताबिक, खर्च में कटौती का असर मुख्य रूप से ब्रोकर्स, बीमा कर्मचारियों और बीमा कंपनियों पर पड़ेगा। पर इसकी कोई गारंटी नहीं कि ग्राहकों को कम प्रीमियम या बेहतर फायदे मिलेंगे।

‘ब्रोकर’ शब्द पर ऐतराज

प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ‘इंश्योरेंस ब्रोकर’ शब्द को बदलकर ‘इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी’ करने की बात है। IBAI के मुताबिक, यह प्रस्ताव ग्राहकों का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रोकर्स और बीमा कंपनियों के उत्पाद बेचने वाले डिस्ट्रीब्यूटर्स के बीच कोई अंतर नहीं करता।

आंकड़ों के सहारे दलील

IBAI ने अपने पक्ष में आंकड़े भी रखे हैं। पत्र में बताया गया है कि, जनरल इंश्योरेंस कंपनियों का परिचालन खर्च वित्त वर्ष 2022-23 में कुल प्रीमियम का 28.2 प्रतिशत था। वित्त वर्ष 2024-25 में यह घटकर 26.5 प्रतिशत रह गया। इसी दौरान प्रीमियम में सालाना करीब 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

संस्था का कहना है कि इससे साफ है कि, 2023 का मौजूदा ‘एक्सपेंसेस ऑफ मैनेजमेंट’ (EoM) फ्रेमवर्क पूरी तरह कारगर है। उसके अनुसार कंपनियां खुद खर्च नियंत्रित कर उपभोक्ताओं को आकर्षित कर रही हैं। ऐसे में नियमों को सख्त कर वितरण नेटवर्क, यानी ब्रोकर्स और एजेंटों, की आय घटाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

 10 लाख से ज्यादा लोगों की आजीविका पर संकट

IBAI के मुताबिक, प्रस्तावित बदलावों से पांच साल में 10 लाख से ज्यादा लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। देश में अभी कुल 27.18 लाख पॉइंट-ऑफ-सेल (POS) बीमा कर्मचारी काम कर रहे हैं। इनमें से 54 प्रतिशत से ज्यादा, यानी 14.81 लाख को, सीधे बीमा ब्रोकर्स की ओर से व्यावसायिक और तकनीकी सहायता मिलती है।

मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स (MISP) के नेटवर्क में ब्रोकर्स की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत है। इस नेटवर्क से जुड़े ज्यादातर लोग टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। उनकी पूरी आजीविका मोटर वाहन बीमा की रिटेल बिक्री और सर्विसिंग पर टिकी है। IBAI का तर्क है कि ब्लैंकेट कमीशन कैप और खर्चों में 33 प्रतिशत की कटौती लागू होने पर इस विशाल नेटवर्क पर सीधा असर पड़ेगा।

पीएमओ पर नजर

IRDAI का मकसद ग्राहकों के लिए प्रीमियम सस्ता करना और गलत बिक्री रोकना है, जबकि ब्रोकर्स की संस्था इसे रोजगार और बाजार के लिए खतरा बता रही है। अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस पत्र पर क्या रुख अपनाता है और IRDAI अपने प्रस्ताव में कोई बदलाव करता है या नहीं।

 

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