गोलकुंडा किला किसने बनवाया? औरंगजेब के लिए क्यों बना प्रतिष्ठा का सवाल

हैदराबाद के प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों और पर्यटक स्थलों में शुमार शहर का गोलकुंडा किला आज भी पर्यटक की दृष्टि से बहद अहम है। यह किला पूरी तरह खंडहर नहीं हुआ है। इसकी विशाल दीवारें, बुर्ज, दरवाजे और कई ऐतिहासिक संरचनाएं अब भी अपने स्थान पर खड़ी है और अपनी मजबूती का सबूत दे रही हैं। भारतीय पर्यटन की वेबसाइट भी इसे हैदराबाद के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल करती है। कई विवरणों में दावा किया जाता है कि, 30 सितंबर 1687 को मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस किले पर कब्जा किया था। हालांकि, उस वक्त इस किले पर कब्जा करना बादशाह के लिए आसान नहीं रहा। एक समय ऐसा भी आया, जब यह किला उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया।

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इस किले की ध्वनि-वास्तुकला भी खासी मशहूर है। कहते हैं इस किले के प्रवेश क्षेत्र में ताली बजाने पर उसकी आवाज किले के ऊपरी हिस्से तक सुनाई देती है। यहां सवाल यह है कि, इतने मजबूत और चर्चित किले को किसने बनवाया और औरंगजेब के लिए इस पर कब्जा इतना अहम क्यों हो गया।

किले की नींव किसने रखी?

गोलकुंडा दक्षिण भारत के इतिहास का एक अहम दुर्ग है, लेकिन इसकी कहानी किसी एक शासक से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआती नींव और बाद के निर्माण के बीच कई सदियों का अंतर है। इतिहासकार आम तौर पर गोलकुंडा की शुरुआती किलेबंदी का श्रेय काकतीय शासकों को देते हैं। यह किला 13वीं सदी में एक पहाड़ी पर बनाया गया था। तब यह दुर्ग मिट्टी और स्थानीय सामग्री से तैयार हुआ था और उसका काम क्षेत्र की रक्षा करना था। काकतीय सत्ता कमजोर पड़ने के बाद गोलकुंडा पर अलग-अलग शक्तियों का नियंत्रण रहा।

Golconda Fort

14वीं सदी में यह किला बहमनी सल्तनत के अधिकार में आया। इस बदलाव के साथ किले का राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया। बाद में बहमनी सत्ता कमजोर पड़ी, तो दक्कन में कई स्वतंत्र सल्तनतें उभरीं।

कुतुबशाही शासकों का योगदान

करीब 1518 में सुल्तान कुली कुतुब-उल-मुल्क ने गोलकुंडा में कुतुबशाही सत्ता की नींव रखी। उनके शासन और बाद के कुतुबशाही सुल्तानों के दौर में किले को लगातार मजबूत और विस्तृत किया गया। मिट्टी के पुराने दुर्ग की जगह पत्थर की मजबूत दीवारें, बुर्ज और प्रवेश-द्वार बनाए गए। यही कारण है कि, किले की मौजूदा भव्यता का बड़ा हिस्सा कुतुबशाही काल से जुड़ा माना जाता है। कुतुबशाही शासकों ने गोलकुंडा को अपनी राजधानी और सत्ता का केंद्र बनाया। बाद में उन्होंने हैदराबाद शहर बसाया और राजधानी वहां ले गए। इसके बावजूद गोलकुंडा सैन्य और राजनीतिक दृष्टि से अहम बना रहा। उसकी ऊंची चट्टानी स्थिति और मजबूत दीवारें उसे किसी भी हमलावर के लिए कठिन लक्ष्य बनाती थीं।

क्यों इतना अहम था गोलकुंडा?

गोलकुंडा की अहमियत सिर्फ उसके किले तक सीमित नहीं थी। कुतुबशाही राज्य दक्कन का समृद्ध और प्रभावशाली राज्य माना जाता था। इस इलाके का हीरा व्यापार दूर-दूर तक मशहूर था और गोलकुंडा का नाम हीरे-जवाहरात और धन के साथ जुड़ गया था। हालांकि, गोलकुंडा के बाजार में बिकने वाले सभी हीरे किले के आसपास से नहीं निकलते थे। वे आसपास के व्यापक क्षेत्र की खानों और व्यापारिक मार्गों से आते थे।

राजनीतिक नजरिए से देखें, तो गोलकुंडा दक्कन में मुगल विस्तार के रास्ते में खड़ा एक स्वतंत्र राज्य था। औरंगजेब चाहता था कि, दक्षिण के स्वतंत्र सल्तनती राज्य मुगल साम्राज्य के अधीन आ जाएं। उसे गोलकुंडा से धन, क्षेत्र और सैन्य लाभ मिलने की उम्मीद थी, इसलिए यह अभियान महज एक किले को जीतने का मामला नहीं था, बल्कि दक्कन पर मुगल नियंत्रण कायम करने की बड़ी नीति का हिस्सा था।

औरंगजेब के लिए कैसे बना प्रतिष्ठा का प्रश्न?

औरंगजेब ने दक्कन में लंबे समय तक मुगल सत्ता फैलाने की कोशिश की। 1686 में उसने बीजापुर को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद गोलकुंडा दक्कन का प्रमुख स्वतंत्र राज्य बचा था। उसे अधीन करना औरंगजेब के अभियान की अगली बड़ी मंजिल थी।

बीजापुर के बाद गोलकुंडा पर भी नियंत्रण मिलने से औरंगजेब की दक्कन नीति पूरी होती। अगर वह लंबे अभियान के बावजूद इसे न जीत पाता, तो उसकी शक्ति और सैनिक प्रतिष्ठा पर सवाल उठ सकते थे। एक और वजह यह थी कि कुतुबशाही राज्य पूरी तरह मुगलों के अधीन नहीं आया था। मुगल दरबार के साथ उसके संबंधों में तनाव और अधीनता से जुड़े विवाद थे। औरंगजेब ने इन्हें गोलकुंडा पर दबाव बढ़ाने के आधार के रूप में इस्तेमाल किया। उसके लिए यह राज्य साम्राज्य की सीमाओं को दक्षिण में आगे ले जाने की चुनौती भी था।

1687 की घेराबंदी के बाद मुगलों का कब्जा

औरंगजेब की सेना ने 1687 में गोलकुंडा को घेर लिया। किले की दीवारें और रक्षात्मक व्यवस्था मजबूत थीं, इसलिए घेराबंदी कई महीनों तक चली। मुगल सेना ने किले को चारों ओर से दबाव में रखा और उसकी रसद तथा संपर्क को बाधित करने की कोशिश की। किले के भीतर कुतुबशाही शासक अबुल हसन कुतुब शाह थे, जिन्हें तानाशाह के नाम से भी जाना जाता है। लंबे संघर्ष के बाद 1687 में मुगलों ने किले पर कब्जा कर लिया।

Golconda Fort

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि किले के भीतर के एक अधिकारी की मदद से फतेह दरवाजा खोला गया। इस प्रसंग का ब्यौरा अलग-अलग लेखों में अलग तरह से मिलता है। कब्जे की तारीख के रूप में कई आधुनिक विवरण 30 सितंबर 1687 बताते हैं। हालांकि व्यापक रूप से स्थापित ऐतिहासिक तथ्य यह है कि गोलकुंडा का पतन 1687 में हुआ। इसके बाद अबुल हसन को बंदी बनाया गया और कुतुबशाही सल्तनत का अंत हो गया।

जीत के बाद क्या बदला?

गोलकुंडा पर कब्जे से मुगलों को दक्कन में एक और बड़ा क्षेत्र मिला। कुतुबशाही राज्य की स्वतंत्र सत्ता खत्म हो गई और किले तथा उसके आसपास के संसाधन मुगल प्रशासन के नियंत्रण में आ गए। इस जीत से औरंगजेब को तत्काल राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली, लेकिन इसकी कीमत भी भारी थी। दक्कन के लंबे युद्धों ने मुगल सेना और खजाने पर दबाव डाला। गोलकुंडा का पतन मुगल विस्तार की बड़ी सफलता जरूर था, पर इससे दक्षिण के संघर्ष खत्म नहीं हुए। मराठों के साथ युद्ध जारी रहे और औरंगजेब को दक्कन में लंबे समय तक सेना और संसाधन लगाए रखने पड़े।

  कहा जा सकता है कि गोलकुंडा की शुरुआती किलेबंदी काकतीय शासकों के समय हुई। बहमनी शासन के बाद कुतुबशाही शासकों ने इसे मजबूत और भव्य दुर्ग का रूप दिया। औरंगजेब ने 1687 में लंबे सैन्य अभियान के बाद इस पर कब्जा किया। यह उसके लिए प्रतिष्ठा, साम्राज्य विस्तार और दक्कन पर नियंत्रण से जुड़ी निर्णायक जीत थी। फिर भी यह जीत स्थायी शांति नहीं ला सकी। दक्कन के युद्धों ने मुगल साम्राज्य की ताकत और संसाधनों पर लगातार बोझ डाला।

 

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