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GST बचत उत्सव के प्रचार पर सबसे ज्यादा 27.1 करोड़
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कुल खर्च का करीब 59 प्रतिशत प्रिंट मीडिया को गया
योजनाओं की जानकारी पहुंचाने का तर्क
सरकार का तर्क रहा है कि, योजनाओं का फायदा तभी मिल सकता है, जब लोगों को उसकी जानकारी होगी। इसी वजह से टीवी, रेडियो, सिनेमा हॉल, सोशल मीडिया, होर्डिंग और पोस्टर जैसे कई माध्यमों से योजनाओं का प्रचार किया जाता है। लक्ष्य होता है कि, ज्यादा से ज्यादा लोगों को योजनाओं के बारे में जानकारी हो और जरूरतमंद लोग योजनाओं से आसानी से जुड़ सकें। हालांकि, RTI से मिले आंकड़ों के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि, प्रचार पर होने वाला खर्च किन योजनाओं और किन माध्यमों पर केंद्रित रहा।
किस योजना पर कितना खर्च
आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे ज्यादा राशि GST बचत उत्सव के प्रचार पर खर्च हुई। इस पहल के विज्ञापन पर करीब 27.1 करोड़ रुपये लगे, यानी कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा अकेले इसी अभियान पर खर्च किया गया।

दूसरे नंबर पर प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना रही, जिसके प्रचार-प्रसार पर 12.6 करोड़ रुपये खर्च किए गए। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के विज्ञापन पर 7.4 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज हुआ।
इन तीनों को मिलाकर खर्च करीब 47.1 करोड़ रुपये बैठता है। कुल 54.5 करोड़ रुपये में से बची लगभग 7.4 करोड़ रुपये की राशि बाकी सात योजनाओं और पहलों के प्रचार पर खर्च हुई। यानी शीर्ष तीन योजनाओं ने कुल विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा अपने नाम कर लिया।
प्रिंट मीडिया सबसे आगे
खर्च के माध्यम के लिहाज से भी तस्वीर साफ है। सरकार ने विज्ञापन के लिए कई साधन अपनाए, लेकिन सबसे ज्यादा पैसा अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं यानी प्रिंट मीडिया को गया।
प्रिंट मीडिया: कुल खर्च का 58.8 प्रतिशत
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया: 19.5 प्रतिशत
डिजिटल मीडिया: 14.6 प्रतिशत
आउटडोर विज्ञापन (होर्डिंग, पोस्टर आदि): 7.2 प्रतिशत
54.5 करोड़ रुपये के कुल खर्च के हिसाब से मोटे अनुमान में प्रिंट मीडिया पर करीब 32 करोड़ रुपये, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर लगभग 10.6 करोड़ रुपये, डिजिटल पर करीब 8 करोड़ रुपये और आउटडोर पर लगभग 4 करोड़ रुपये खर्च हुए। ये आंकड़े प्रतिशत के आधार पर निकाले गए अनुमान हैं, आधिकारिक रकम नहीं।
डिजिटल के दौर में भी अखबारों पर भरोसा
इन आंकड़ों की एक खास बात यह है कि, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते चलन के बावजूद सरकारी विज्ञापनों में प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी सबसे बड़ी बनी हुई है। डिजिटल माध्यम का हिस्सा 15 प्रतिशत से भी कम रहा, जबकि टीवी और रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को करीब 20 प्रतिशत मिला।

जानकारों की मानें, तो अखबारों की पहुंच छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक है। सरकारी योजनाओं के लाभार्थी बड़ी संख्या में वहीं रहते हैं, इसलिए प्रिंट को प्राथमिकता दी जाती रही है। हालांकि यह सरकार की ओर से दिया गया आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं है।
आरटीआई में मिली जानकारी
इन आंकड़ों का स्रोत RTI के तहत मिले जवाब और राज्यसभा में दी गई जानकारी है। RTI कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज और खर्च की जानकारी मांगने का अधिकार देता है। संसद में सरकार की ओर से दी गई जानकारी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा होती है। इन दोनों स्रोतों को मिलाकर विज्ञापन खर्च की यह तस्वीर बनी है।
खर्च पर बहस के बिंदु
सरकारी विज्ञापनों का मुद्दा पहले भी बहस में रहा है। समर्थकों का कहना है कि, जनता को योजनाओं की जानकारी देना सरकार का दायित्व है, और बिना प्रचार के पात्र लोग लाभ से वंचित रह सकते हैं। आलोचकों का तर्क है कि, प्रचार पर होने वाले खर्च की पारदर्शिता और उसकी प्रभावशीलता की जांच होनी चाहिए, यानी यह देखा जाए कि, पैसा जिस उद्देश्य से खर्च हुआ, वह पूरा हुआ या नहीं।
- कुल खर्च: 54.5 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26)
- योजनाओं की संख्या: 10 बड़ी योजनाएं और पहल
- सबसे ज्यादा खर्च: GST बचत उत्सव, करीब 27.1 करोड़ रुपये
- PM इंटर्नशिप योजना: 12.6 करोड़ रुपये
- PM विश्वकर्मा योजना: 7.4 करोड़ रुपये
- सबसे ज्यादा हिस्सेदारी वाला माध्यम: प्रिंट मीडिया, 58.8 प्रतिशत
RTI से सामने आए ये आंकड़े इसी बहस को नया आधार देते हैं। तीन वित्त वर्षों में 54.5 करोड़ रुपये की रकम बड़ी जरूर है, पर इसके बदले योजनाओं की पहुंच कितनी बढ़ी, इसका जवाब इन आंकड़ों से नहीं मिलता।



