
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा जाति और क्षेत्र की अहमियत देखने को मिली है। यहीं सभी दल बड़े ही व्यवस्थित तरीके से जातिवाद और क्षेत्रवाद की समीकरण को साधने की कोशिश करते हैं। माना जाता है कि प्रदेश की सत्ता की चाभी पिछड़ा और दलित वर्ग के हाथों से होकर गुजरती है। यही वजह है कि हर दल इन्हें साधने की कोशिश में जुटा रहता है। सूबे की राजधानी लखनऊ के सियासी गलियारों में इन दिनों एक नई हलचल देखने को मिल रही है, जो भारतीय जनता पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति की ओर इशारा कर रही है।
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पिछड़ी जातियों पर बीजेपी का ध्यान
2024 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने बीजेपी के थिंक-टैंक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि, जिस गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक ने उन्हें एक दशक तक अजेय बनाए रखा, उसमें आखिर सेंध कैसे लगी। दरअसल, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के दांव ने बीजेपी की राज्य की राजनीतिक जमीन को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। इस चुनौती की काट निकालने के लिए अब बीजेपी ने अपनी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए ओबीसी समाज की उन 30 से ज्यादा पिछड़ी जातियों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जो चुनावी नतीजों को पलटने की ताकत रखती हैं।

अगर हम पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि, साल 2014 के बाद से बीजेपी की प्रचंड जीत का मुख्य आधार ओबीसी मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन रहा है। इसी समर्थन के बल पर पार्टी ने न केवल दो बार केंद्र में पूर्ण बहुमत हासिल किया, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी लगातार दो बार विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक सफलता दर्ज की। हालांकि, 2024 के आम चुनावों ने इस विजय रथ की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया।
2024 में गिरा वोट प्रतिशत
2019 में जहां बीजेपी गठबंधन ने प्रदेश की 80 में से 62 सीटों पर कब्जा किया था, वहीं 2024 में यह आंकड़ा गिरकर महज 33 पर आ गया। इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह माना जा रहा है, कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, निषाद और सैनी जैसी जातियां, जो कभी बीजेपी का मजबूत स्तंभ थीं, लेकिन इस बार सपा के पीडीए नैरेटिव की तरफ आकर्षित हो गईं। सपा पिछड़ों और दलितों के बीच यह संदेश फैलाने में सफल हो गई थी कि, मौजूदा व्यवस्था में उनके हक और आरक्षण के साथ समझौता किया जा सकता है, जिससे बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी दरार पैदा हो गई।
अब बीजेपी इस दरार को भरने के लिए ‘प्लान-30’ पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि उत्तर प्रदेश की 75 से अधिक पिछड़ी जातियों में से लगभग 30 ऐसी जातियां हैं, जिनकी आबादी और प्रभाव विभिन्न जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है। इनमें मौर्य, कुर्मी, कश्यप, कुशवाहा, निषाद, राजभर, सैनी, पाल और प्रजापति जैसी जातियों का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इन समुदायों को फिर से अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी के पिछड़ा वर्ग मोर्चा ने एक व्यापक अभियान की रूपरेखा तैयार की है।
सामाजिक स्तर पर संवाद बढ़ाने की भी तैयारी
इस अभियान के तहत न केवल राजनीतिक रैलियां की जा रही हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर संवाद बढ़ाने की भी तैयारी है। बीजेपी अब केवल बड़े नेताओं के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि उसने हर जिले में इन जातियों के स्थानीय सामाजिक और धार्मिक चेहरों को आगे करने का फैसला किया है। इसके पीछे मंशा यह है कि जब समाज का अपना व्यक्ति मंच पर होगा, तो आम जनता के बीच विश्वास का संकट खत्म होगा।
इस नई व्यूह रचना में नेतृत्व के स्तर पर भी बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं। बीजेपी ने इस बार ओबीसी वोटों के प्रबंधन की कमान केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को सौंपी है। पंकज चौधरी कुर्मी समाज के एक वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता माने जाते हैं, और कुर्मी वोट बैंक यूपी की राजनीति में एक बड़ी ताकत है। उनके साथ प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी फ्रंट फुट पर रखा गया है।
केशव मौर्य लंबे समय से बीजेपी में ओबीसी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं और हाल ही में लखनऊ में आयोजित पिछड़ा वर्ग मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन में उनकी सक्रियता ने साफ कर दिया कि पार्टी आने वाले चुनावों में पिछड़ों को ही अपना मुख्य केंद्र बनाएगी। इस सम्मेलन में मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेंद्र कुमार कश्यप की भूमिका भी काफी अहम रही, जिन्होंने अति-पिछड़ी जातियों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया है।
तूफानी दौरा कर रहे राज्य स्तर के मंत्री
बीजेपी की इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सामाजिक संवाद है। पार्टी के केंद्रीय और राज्य स्तर के मंत्री इन दिनों प्रदेश के विभिन्न जिलों का तूफानी दौरा कर रहे हैं। इन दौरों का उद्देश्य केवल भाषण देना नहीं है, बल्कि स्थानीय ओबीसी समुदायों के प्रमुखों और उनके सामाजिक गुरुओं के साथ सीधा संपर्क स्थापित करना है।
बीजेपी नेताओं का तर्क है कि उत्तर प्रदेश की आबादी में पिछड़ों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है और यदि इस बड़े हिस्से के एक महत्वपूर्ण भाग को साध लिया जाए, तो किसी भी विपक्षी गठबंधन की काट आसान हो जाएगी। इसके लिए पार्टी अब गांव-गांव जाकर चौपालें लगा रही है और लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे कि मुफ्त राशन, पीएम आवास और उज्ज्वला योजना का सबसे बड़ा लाभार्थी यही पिछड़ा समाज रहा है।
सपा के पीडीए फॉर्मूले ने जिस तरह से जातीय ध्रुवीकरण किया है, उसने बीजेपी के सामने एक वैचारिक चुनौती भी खड़ी की है। सपा का दावा है कि वह पिछड़ों और दलितों के अधिकारों की असली लड़ाई लड़ रही है, जबकि बीजेपी इसे केवल वोट बैंक की राजनीति करार दे रही है। बीजेपी का पलटवार यह है कि सपा केवल एक विशेष जाति (यादव) और एक विशेष धर्म के तुष्टिकरण की राजनीति करती है, जबकि बीजेपी ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र के साथ सभी पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व दे रही है।
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