
नई दिल्ली। अमेरिका दुनिया भर के दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स और क्रिटिकल मिनरल्स) पर एक बड़ा ‘महागठबंधन’ बना रहा है। इस गठबंधन में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूके, यूरोपीय यूनियन समेत कई अन्य देश शामिल हो रहे हैं। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में चीन के एकाधिकार को कमजोर करना और वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के साथ ही उसे विविध और भरोसेमंद बनाना है।

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4 फरवरी को होगी बैठक

इसे लेकर चार फरवरी को वाशिंगटन में क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल की एक बैठक होने वाली है। इसमें भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी हिस्सा लेंगे। इसके लिए उन्हें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की तरफ से आमंत्रित किया जा चुका है। यह बैठक पैक्स सिलिका (Pax Silica) पहल से जुड़ी हुई है, जो ट्रंप प्रशासन द्वारा दिसंबर 2025 में शुरू की गई एक रणनीतिक पहल है। पैक्स सिलिका का लक्ष्य सिलिकॉन-आधारित तकनीकों, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर, क्रिटिकल मिनरल्स और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग की सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है।
सबसे पहले इसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, इजरायल, नीदरलैंड्स, यूके शामिल हुए। इसके बाद फरवरी 2026 में भारत को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने का न्योता दिया गया है। अमेरिकी अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जैकब हेलबर्ग ने इसे “21वीं सदी की आर्थिक-सुरक्षा गठबंधन” की संरचना बताया है, जिसमें निजी क्षेत्र की कंपनियां जैसे रियो टिंटो, सैमसंग और ASML भी जुड़ी हुई हैं।
चीन की निर्भरता कम करना है मकसद
वाशिंगटन में होने वाली बैठक में अमेरिका के अलावा भारत, यूरोपीय यूनियन, यूके, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अन्य देश के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। यह पिछले एक महीने में क्रिटिकल मिनरल्स पर दूसरा बड़ा शिखर सम्मेलन है। इसमें G7 देशों (अमेरिका, यूके, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा) के साथ-साथ भारत, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और संभवतः अर्जेंटीना जैसे लगभग 20 देश शामिल होंगे। बैठक का मुख्य फोकस सेमीकंडक्टर, AI, दुर्लभ खनिजों की सप्लाई चेन पर चीन की निर्भरता को कम करना है।
आपको बता दें कि, चीन वैश्विक रेयर अर्थ प्रोडक्शन का करीब 70% और प्रोसेसिंग का 90% नियंत्रित करता है। चीन ने ट्रंप के “लिबरेशन डे” टैरिफ के जवाब में अप्रैल 2025 से अमेरिका को रेयर अर्थ एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, नवंबर 2025 में एक अस्थायी समझौते से अमेरिका को कुछ राहत मिल गई थी, लेकिन यह निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा, क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी, डिफेंस टेक्नोलॉजी और AI हार्डवेयर के लिए खतरा बनी हुई है।
ऐसे में अब अमेरिका अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक नया इको-सिस्टम बना रहा है, जिसके तहत माइनिंग, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन को मजबूत किया जा सके।
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बैठक का एजेंडा
लिथियम, कोबाल्ट, निकल, रेयर अर्थ जैसे खनिजों की माइनिंग, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन को सुरक्षित करना।
सेमीकंडक्टर चिप निर्माण और डिजाइन को बढ़ावा देना।
डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग पावर और AI हार्डवेयर के लिए साझा नेटवर्क बनाना।
EV बैटरी और क्लीन एनर्जी उपकरणों के लिए खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
न्यूनतम मूल्य गारंटी की मांग हुई
इस बीच, एक बड़ा विवाद भी उभर रहा है। कई सहयोगी देश अमेरिका से न्यूनतम मूल्य गारंटी की मांग कर रहे हैं ताकि माइनिंग प्रोजेक्ट्स आर्थिक रूप से व्यवहार पूर्वक रहे। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने इस मांग को खारिज कर दिया है, जिससे ऑस्ट्रेलिया के शेयर बाजार में गिरावट आई। एक रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि, ऑस्ट्रेलिया खुद को चीन के विकल्प के रूप में प्रेजेंट करने की कोशिश कर रहा है।

जनवरी 2026 में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 1.2 बिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (लगभग 802 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की क्रिटिकल मिनरल्स स्ट्रैटेजिक रिजर्व की घोषणा की, जिसमें एंटीमनी, गैलियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स को प्राथमिकता दी गई है। यह रिजर्व 2026 के अंत तक ऑपरेशनल हो जाएगा, ताकि सप्लाई चेन में रुकावट आने पर कई सालों तक भंडार उपलब्ध रहे। ऑस्ट्रेलिया जापान के मॉडल पर चल रहा है, जहां सरकारी समर्थन से स्टॉकपाइलिंग की जाती है।
पाकिस्तान का भी जिक्र
कुछ रिपोर्टस में बताया जा रहा है कि, पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर ने पिछले साल ट्रंप को क्रिटिकल मिनरल्स निकालने का ऑफर दिया था, इसे लेकर एक समझौता भी हुआ, लेकिन पैक्स सिलिका और इसकी बैठक में पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया। इस गठबंधन अमेरिका के रणनीतिक सहयोगियों और भरोसेमंद पार्टनर्स को ही शामिल किया गया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा है कि “अंतरराष्ट्रीय पार्टनर्स के साथ क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन को मजबूत करना अमेरिकी अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, टेक्नोलॉजिकल लीडरशिप और मजबूत एनर्जी भविष्य के लिए जरूरी है।”
चीन को तोड़ना है मकसद
द गार्डियन की रिपोर्ट पर गौर करें, तो इसमें कहा गया है कि, अगर बैठक सफल रही, तो एक संयुक्त बयान जारी होगा, जिसे अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए मील का पत्थर माना जाएगा। यह गठबंधन न केवल आर्थिक है, बल्कि भू-राजनीतिक भी। ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका ने कई सहयोगियों से संबंधों में तनाव के बावजूद, ट्रांस अटलांटिक और इंडो-पैसिफिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश की है। भारत की भागीदारी खास महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में प्रतिभा पूल, सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाएं और रणनीतिक लोकेशन है।
जयशंकर की यात्रा के दौरान रूबियो से द्विपक्षीय बैठक में व्यापार, टैरिफ और अन्य मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है।कुल मिलाकर, यह बैठक और पैक्स सिलिका पहल वैश्विक तकनीकी और ऊर्जा क्रांति में चीन की “लीश” (निर्भरता) को तोड़ने की दिशा में निर्णायक कदम है। अगर ये बाथक सफल रही तो एक नई वैश्विक आर्थिक-सुरक्षा व्यवस्था की नींव रखी जा सकती है
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