भारतीय वैज्ञानिकों ने श्रीहरिकोटा से चंद्रयान-3 का सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस मिशन को लेकर पूरी दुनिया में बड़ी उत्साह और गर्व की भावना है। आपको बता दे, चंद्रयान-3 चांद के उस हिस्से यानी की ‘शेकलटन क्रेटर’ पर उतर सकता है जहां अभी तक किसी भी देश का कोई अभियान नहीं पहुंचा पाया है, इसलिए यह मिशन महत्वपूर्ण है। चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण LVM3 रॉकेट से किया गया है और इसमें विभिन्न सुरक्षा उपकरण भी संलग्न किए गए हैं।
हालांकि, चंद्रयान-3 को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए कई कठिनाइयां होंगी। अब आपको बताने जा रहे चंद्रयान-3 की पांच मुख्य चुनौतियों के बारे में जो की इसरो के पूर्व वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव जो जीएसएलवी-एफ 06 रॉकेट लॉन्चिंग टीम का हिस्सा थे। उन्होंने खुद इस मिशन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं। उन्होने बताया, चंद्रयान-3 में दो हिस्से होंगे। पहला हिस्सा होगा प्रोपल्शन मॉड्यूल और दूसरा हिस्सा होगा लैंडर मॉड्यूल। प्रोपल्शन मॉड्यूल का वजन 2148 किलोग्राम होगा और इसका कार्य होगा लैंडर और रोवर को 100×100 किलोमीटर लूनर ऑर्बिट तक पहुंचाना। इसके लिए इसको लॉन्च व्हीकल इंजेक्शन ऑर्बिट से लैंडर सेपरेशन तक पहुंचाना होगा।
चंद्रयान-3 के सामने पांच मुख्य चुनौतियां हैं:
- पृथ्वी की कक्षा में सफर को सही समय पर पूरा करना:
चंद्रयान-3 को पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचने के बाद, इसे 22 दिनों तक पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा करना होगा। इसके बाद, इसे पृथ्वी की कक्षा से दूर ले जाकर चंद्र की कक्षा में ट्रांसफर करना होगा। इस चरण में चंद्रयान की रफ्तार और दूरी को ठीक से नियंत्रित रखना मुश्किल होगा। यदि कोई गलती हो जाए, तो मिशन को खतरा हो सकता है। - स्पीड को समय के साथ नियंत्रित रखना:
चंद्रयान-3 को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए रॉकेट को उच्च गति पर ले जाना होगा, लेकिन जब यह अपने लक्ष्य के करीब पहुँचेगा, तो उसकी गति को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है। पृथ्वी पर, रॉकेट को अधिकतम फ्रिक्शन का सामना करना पड़ता है जो उसकी गति को कम कर सकता है, लेकिन चांद पर यह समस्या नहीं होती है। इसलिए, इस प्रॉब्लम का समाधान करने के लिए प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग किया जाता है। - सही रूट पर जाना:
अंतरिक्ष रॉकेट में कोई जीपीएस नहीं होता है, इसलिए वैज्ञानिकों को इसे सही रास्ते पर निर्देशित करना होता है। चंद्रयान-3 की लैंडिंग के दौरान भी यही चुनौती आ सकती है। सही रूट पर लैंडिंग होना और चंद्रयान को ठीक से काम करने के लिए सही स्थान पर उतारना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। - चांद की कक्षा में परिक्रमा:
चंद्रयान-3 को चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद, इसे 13 दिनों तक परिक्रमा करना होगा। इसके बाद, प्रोपल्शन मॉड्यूल से लैंडर अलग होगा। यह प्रक्रिया भी चुनौतीपूर्ण होगी क्योंकि इस दौरान वैज्ञानिक नहीं होंगे, और सभी गणनाएं पहले से निर्धारित डेटा के आधार पर होंगी। इसमें गलती होने का खतरा होता है और हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है। - लैंडिंग की चुनौती:
चंद्रयान-3 के लैंडर को चंद्र की सतह पर सफलतापूर्वक उतारना सबसे बड़ी चुनौती होगी। चंद्रयान-2 में यह काम नहीं हो सका था। लैंडिंग के साथ-साथ, लैंडर के दोनों रोवर को अलग करने की प्रक्रिया भी चुनौतीपूर्ण होगी। रोवर अलग होने के बाद ही चन्द्रमा से जानकारी मिल सकेगी। यह महत्वपूर्ण होगा कि लैंडिंग के बाद रोवर सही ढंग से काम करें। रोवर एक अज्ञात स्थान पर लैंड होगा, इसलिए लैंडिंग स्थान और उसकी स्थिति का ठीक से चयन भी महत्वपूर्ण होगा।
ये चुनौतियां चंद्रयान-3 मिशन को बहुत कठिन बना सकती हैं, लेकिन इसरो की टीम का लक्ष्य है कि वे इन सभी चुनौतियों का सामना करें और मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करें। यह मिशन भारतीय वैज्ञानिकों के लिए गर्व का विषय है और पूरी दुनिया में इसका बड़ा महत्व है।
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