127 करोड़ का बजट, फिर भी चोटों से परेशान टीम इंडिया, रोहित की चोट पर बोर्ड खामोश

भारतीय क्रिकेट में खिलाड़ियों की चोट अब सिर्फ मैदान की नहीं, बल्कि बोर्ड के बजट और रणनीति के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है। बीसीसीआई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (COE) के इंजरी मैनेजमेंट प्रोग्राम को लेकर आई एक रिपोर्ट में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं, जिसने बोर्ड की नींद उड़ा दी है। 

रिपोर्ट में बताया गया है कि, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच देश के 32 अहम खिलाड़ी चोटिल हुए और इससे उबरने के लिए रिहैबिलिटेशन प्रक्रिया से गुजरे। आईपीएल 2026 के बाद हालात इतने खराब हो गए कि, लगभग हर सीरीज में औसतन दो खिलाड़ी चोटिल हुए हैं।

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32 खिलाड़ियों का हुआ रिहैब

रिपोर्ट के अनुसार, जिन 32 खिलाड़ियों ने सीओई में रिहैब कराया, उनमें 20 सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट वाले सीनियर खिलाड़ी हैं। बाकी 12 खिलाड़ी इंडिया ए या टारगेटेड ग्रुप का हिस्सा रहे। यानी चोट की समस्या केवल सीनियर टीम तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की टीम तैयार करने वाले पूल में भी यह चिंता बनी हुई है।

injured player

 एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि, महिला और पुरुष दोनों वर्गों को मिलाकर सीओई की स्पोर्ट्स साइंस एंड मेडिसिन (एसएसएम) टीम ने कुल 68 खिलाड़ियों की चोटों का इलाज किया। इनमें ज्यादातर मामले मांसपेशियों में खिंचाव से जुड़े थे। इससे संकेत मिलता है कि खिलाड़ियों पर बढ़ते क्रिकेट कार्यभार और लगातार मुकाबलों का असर उनके शरीर पर पड़ रहा है।

सिर्फ एक ‘इम्पैक्ट इंजरी’

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि, इस अवधि में सिर्फ एक मामला ‘इम्पैक्ट इंजरी’ की श्रेणी में आया। यह मामला था विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत का। पन्त को जुलाई 2025 में मैनचेस्टर टेस्ट के दौरान पैर में फ्रैक्चर हुआ था। बाकी ज्यादातर खिलाड़ियों की चोटें मांसपेशियों से जुड़ी रहीं, जिन्हें आमतौर पर बेहतर प्रबंधन और कार्यभार नियंत्रण से कम किया जा सकता है।

रोहित की चोट पर बोर्ड की चुप्पी

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा पूर्व कप्तान रोहित शर्मा से जुड़ा है। बताया गया है कि, आईपीएल 2026 के बाद रोहित हैमस्ट्रिंग की चोट के चलते रिहैब के लिए सीओई पहुंचे थे, लेकिन बीसीसीआई ने इस बारे में कभी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया। इसी वजह से रिपोर्ट में कहा गया कि, उनकी चोट को सार्वजनिक नहीं किया गया।

भारतीय क्रिकेट में रोहित जैसे दिग्गज खिलाड़ी की फिटनेस को लेकर प्रशंसकों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। ऐसे में बोर्ड की ओर से पारदर्शिता न बरते जाने पर सवाल उठ रहे हैं। खिलाड़ी की चोट की स्थिति, वापसी की समयसीमा और उपलब्धता की जानकारी न केवल प्रशंसकों, बल्कि टीम चयन और रणनीति की दृष्टि से भी अहम मानी जाती है।

30 सितंबर तक जुड़े और नाम

30 सितंबर तक की अपडेटेड सूची में कुछ और बड़े नाम जुड़ गए हैं। इस लसी  विराट कोहली, वरुण चक्रवर्ती, प्रिंस यादव और हर्ष दुबे चोटिल खिलाड़ियों में शामिल बताए गए हैं। सूची लंबी होती जा रही है और इससे टीम प्रबंधन के सामने विकल्पों के संतुलन की चुनौती भी बढ़ गई है।

बार-बार चोटिल होने वाले खिलाड़ी

रिपोर्ट के मुताबिक कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं जो बार-बार चोट की चपेट में आते रहे। इनमें जसप्रीत बुमराह, वॉशिंगटन सुंदर, नीतीश कुमार रेड्डी, हर्षित राणा, हार्दिक पंड्या और प्रसिद्ध कृष्णा के नाम शामिल हैं। इनमें से हर्षित राणा, हार्दिक पंड्या और नीतीश रेड्डी ने पिछले 18 महीनों में कम से कम चार-चार महीने सीओई में ही बिताए हैं।

injured player

यह आंकड़ा बताता है कि कुछ खिलाड़ियों के लिए रिहैब अब अस्थायी पड़ाव नहीं, बल्कि लगभग नियमित ठिकाना बनता जा रहा है। लगातार चोट और वापसी के चक्र में फंसे खिलाड़ियों के लिए अपनी लय बनाए रखना भी कठिन हो जाता है।

बजट में 35 करोड़ की बढ़ोतरी

चोटों के बढ़ते मामलों के बीच सीओई का बजट भी तेजी से बढ़ाया गया है। पिछले वित्त वर्ष में सीओई का कुल खर्च 92 करोड़ रुपये रहा था। वहीं 2026-27 के लिए अनुमानित बजट बढ़ाकर 127 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यानी करीब 35 करोड़ रुपये की बड़ी बढ़ोतरी की गई है।

यह बढ़ोतरी संकेत देती है कि बोर्ड चोट प्रबंधन और रिहैबिलिटेशन ढांचे को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। हालांकि, सवाल यह भी है कि भारी-भरकम खर्च के बावजूद चोटों की संख्या क्यों कम नहीं हो रही। जानकारों का मानना है कि, सिर्फ इलाज और रिहैब पर निवेश काफी नहीं है, बल्कि चोट की रोकथाम, कार्यभार प्रबंधन और घरेलू से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक कार्यक्रम के संतुलन पर भी ध्यान देना होगा।

बीसीसीआई के सामने दोहरी चुनौती

आने वाले महीनों में भारतीय टीम को व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का सामना करना है। ऐसे में अहम खिलाड़ियों की फिटनेस टीम की सफलता में निर्णायक भूमिका निभाएगी। यदि हर सीरीज में दो खिलाड़ी चोटिल होते रहे, तो टीम संयोजन और रणनीति पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

बीसीसीआई के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर चोटों की संख्या घटाना और खिलाड़ियों को जल्द फिट कर मैदान पर लाना है, दूसरी ओर खिलाड़ियों की चोट से जुड़ी जानकारी को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव भी है। 127 करोड़ रुपये के बजट का असल नतीजा तभी दिखेगा, जब मैदान पर चोटिल खिलाड़ियों की संख्या में कमी आएगी।

 

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