
जब भी भारत में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात होती है, तो सबसे पहला नाम जो जुबान पर आता है, वह है डॉ. श्रीकांत जिचकर का। जिचकर की गिनती देश के सबसे अधिक शिक्षित लोगों में होती है। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां आज भी लोगों को हैरान करती हैं। उनके पास अलग-अलग विषयों में इतनी डिग्रियां थीं कि उनकी गिनती किसी सामान्य व्यक्ति के लिए कल्पना से परे लगती है।
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उन्होंने चिकित्सा, कानून, प्रशासन, पत्रकारिता और समाजशास्त्र जैसे बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों में गहन अध्ययन किया था, लेकिन डॉ. जिचकर की पहचान केवल एक डिग्रीधारी व्यक्ति तक सीमित नहीं थी, वे एक कुशल प्रशासक, राजनेता, लेखक और गंभीर विचारक भी थे। उनका पूरा जीवन आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत बना हुआ है, जो यह साबित करता है कि सीखने की कोई तय उम्र नहीं होती।
इस विषय पर चर्चा इसलिए भी प्रासंगिक हो जाती है क्योंकि हर साल 8 सितंबर को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इस खास दिन को मनाने की घोषणा यूनेस्को ने 17 नवंबर 1965 को की थी। इसके लिए 8 सितंबर की तारीख तय की गई थी। इसके एक साल बाद, यानी 1966 से विश्व स्तर पर इस दिवस को मनाने की शुरुआत हुई थी। वर्ष 2026 के लिए इस दिवस की थीम रखी गई थी “लिटरेसी फॉर पीपल, द प्लैनेट एंड प्रॉस्पेरिटी”, जो साक्षरता को लोगों, धरती और समृद्धि से जोड़कर देखने पर जोर देती है।

गौरतलब है कि, जब इस दिवस की शुरुआत हुई थी, उस दौर में पूरी दुनिया की साक्षरता दर बहुत संतोषजनक स्थिति में नहीं थी। अगर भारत की बात करें, तो वर्तमान में देश की साक्षरता दर 80.9 फीसदी है, जबकि वर्ष 2011 में यह आंकड़ा 74 फीसदी हुआ करता था। इससे भी पीछे जाएं तो 1961 में भारत की साक्षरता दर महज 28.30 फीसदी थी, और इसके ठीक दस साल बाद यानी 1971 में यह बढ़कर 34.45 फीसदी हो पाई थी। यानी आजादी के करीब 79 साल बीत जाने के बावजूद भारत अब तक सौ फीसदी साक्षरता का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
डॉ. श्रीकांत जिचकर का जन्म महाराष्ट्र में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी पढ़ाई में गहरी रुचि रही। वे हर विषय को न सिर्फ समझने बल्कि उसकी गहराई तक जाने की कोशिश करते थे। उनका व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली माना जाता था। वे स्वभाव से अत्यंत मेहनती और अनुशासित थे, और अपने लक्ष्यों को लेकर हमेशा स्पष्ट रहते थे। उनके लिए पढ़ाई कभी भी केवल नौकरी हासिल करने का जरिया नहीं रही, बल्कि वे ज्ञान को जीवन को बेहतर बनाने का एक सशक्त माध्यम मानते थे।
कई विषयों में हासिल की उच्च शिक्षा
डॉ. जिचकर ने अपने शैक्षणिक जीवन में बेहद विविध क्षेत्रों में शिक्षा हासिल की। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की, इसके बाद कानून के क्षेत्र में भी गहन अध्ययन किया। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े विषयों में भी विशेष शिक्षा हासिल की। इसके अलावा उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों का भी गहराई से अध्ययन किया। संस्कृत सहित अन्य भाषाओं में भी उनकी विशेष रुचि रही, और उन्होंने पत्रकारिता व साहित्य से जुड़े विषयों को भी बारीकी से समझा।
उनकी शिक्षा का दायरा इतना व्यापक था कि, वे किसी एक विषय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि विज्ञान और कला दोनों ही क्षेत्रों में समान रुचि रखते थे। यही खासियत उन्हें अन्य विद्वानों से अलग बनाती थी। दावा किया जाता है कि, उनके पास कुल 20 डिग्रियां, 28 गोल्ड मेडल थे, और उन्होंने यूनिवर्सिटी तथा प्रतियोगी परीक्षाओं समेत कुल 42 परीक्षाएं दी थीं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में भी गाड़े सफलता के झंडे
अकादमिक उपलब्धियों के साथ-साथ डॉ. श्रीकांत जिचकर ने कई महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बड़ी सफलता हासिल की। उन्होंने प्रशासनिक सेवा से संबंधित कठिन परीक्षाओं में भाग लिया और भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस की परीक्षा भी सफलतापूर्वक पास की। इसके अतिरिक्त उन्होंने चिकित्सा और कानून से जुड़ी परीक्षाओं में भी अपनी काबिलियत साबित की।
वे लगातार अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते थे, जबकि हर परीक्षा के लिए अलग रणनीति और अलग तरह की मेहनत की जरूरत होती है। इसके बावजूद उन्होंने कई क्षेत्रों में अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। उनकी सफलता केवल परीक्षा पास करने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि वे हर विषय को गहराई से समझते थे और अपने विचारों को बेहद स्पष्टता के साथ व्यक्त कर पाते थे। यही वजह रही कि वे शिक्षा और सार्वजनिक जीवन, दोनों ही क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर सके।
शिक्षा के बाद राजनीति में की एंट्री
अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों के बाद डॉ. जिचकर ने राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य चुने गए, और इसके बाद उन्हें राज्यसभा सदस्य बनने का भी अवसर मिला। अपने पूरे राजनीतिक कार्यकाल के दौरान उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीरता से काम किया।
वे समाज के समग्र विकास को लेकर हमेशा चिंतित और सक्रिय रहते थे। उनका दृढ़ मानना था कि, किसी भी देश की सच्ची प्रगति के लिए शिक्षित और जागरूक नागरिकों का होना बेहद जरूरी है। वे राजनीति को सत्ता का साधन नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम मानते थे और हमेशा आम लोगों की समस्याओं को गहराई से समझने का प्रयास करते थे। उनकी हमेशा यह कोशिश रही कि देश में बेहतर शिक्षा व्यवस्था और प्रभावी प्रशासन कायम हो सके।
डिग्रियां नहीं, व्यापक ज्ञान की मिसाल
किसी व्यक्ति को सबसे पढ़ा-लिखा कहना केवल उसकी डिग्रियों की गिनती पर निर्भर नहीं होना चाहिए। असली शिक्षा वही मानी जाती है, जो व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को बढ़ाए, उसे विनम्र बनाए और समाज के प्रति एक गहरी जिम्मेदारी का भाव पैदा करे। डॉ. जिचकर में ये सभी गुण साफ तौर पर दिखाई देते थे। वे अलग-अलग विषयों को आपस में जोड़कर देखने की क्षमता रखते थे और किसी भी समस्या को कभी एक ही नजरिए से नहीं परखते थे।
वे विज्ञान, समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति, इन सभी पहलुओं को एक साथ समझने की कोशिश करते थे। उनका ज्ञान केवल किताबों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वे समाज और प्रशासन की जमीनी सच्चाइयों से भी गहराई से जुड़े हुए थे और उन्होंने अपने विशाल ज्ञान का सदुपयोग सार्वजनिक जीवन में बखूबी किया।
पढ़ाई के प्रति थे समर्पित
डॉ. जिचकर की सबसे बड़ी खूबी उनका अटूट समर्पण था। वे जीवनभर नियमित रूप से पढ़ते रहे और नए-नए विषयों को सीखने से कभी पीछे नहीं हटे। आमतौर पर कई लोग एक डिग्री हासिल करने के बाद आगे पढ़ाई करना बंद कर देते हैं, लेकिन डॉ. जिचकर ने ऐसा कभी नहीं किया। वे जीवन के हर पड़ाव पर सीखते रहे और हर नए विषय को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
उनका जीवन यह स्पष्ट संदेश देता है कि, किसी भी बड़ी सफलता के लिए केवल प्रतिभा होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके साथ मेहनत, अनुशासन और निरंतर अभ्यास का होना भी उतना ही जरूरी है। अगर लक्ष्य बड़ा हो, तो समय का सही और सटीक उपयोग करना अनिवार्य हो जाता है।
क्या वे सचमुच भारत के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे?
डॉ. श्रीकांत जिचकर को अक्सर भारत का सबसे पढ़ा-लिखा व्यक्ति कहा जाता रहा है। हालांकि इस तरह की उपाधि को पूरी तरह आधिकारिक तौर पर मान्यता देना थोड़ा मुश्किल है। दरअसल भारत में समय-समय पर ऐसे कई विद्वान हुए हैं, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में बेहद उच्च स्तर की शिक्षा हासिल की। कुछ विद्वानों ने बड़ी संख्या में डिग्रियां प्राप्त कीं, तो वहीं कुछ ने शोध, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। ऐसे में यह कहना अधिक उचित प्रतीत होता है कि डॉ. जिचकर भारत के सबसे अधिक शिक्षित और बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न व्यक्तियों में से एक थे। उन्हें सबसे पढ़ा-लिखा कहे जाने की यह लोकप्रिय धारणा दरअसल उनकी असाधारण और बेमिसाल शैक्षणिक उपलब्धियों पर ही आधारित है, जिसने उन्हें आज भी देश के इतिहास में एक अनोखा स्थान दिलाया हुआ है।
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