
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश का प्रयागराज जिला हिन्दू धर्म के लोगों के लिए काफी अहमियत रखता है। इस जिले को तीर्थों का राजा कहा जाता है। यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है। यहां कुम्भ मेला और माघ मास मेला लगता है, जिसमें लाखों करोड़ों श्रद्धालु शिरकत करते हैं। इस समय यहां माघ मेला लगा हुआ है। ऐसे में यहां हर दिन लाखों श्रद्धालुओं के लिए का जमावड़ा लग रहा है। इस साल यह मेला 3 जनवरी (पौष पूर्णिमा) से शुरू होकर 15 फरवरी (महाशिवरात्रि) तक चलेगा। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, माघ मास में सभी देवी-देवता इस पावन संगम पर निवास करते हैं।

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बढ़ जाता है दान का महत्व
मान्यता है कि, माघ मेले में पुण्य प्रदायिनी मां गंगा, पापनाशिनी मां यमुना और बुद्धिदायिनी मां सरस्वती के संगम पर स्नान, पूजा और दान का फल असंख्य गुना बढ़ जाता है। इस दौरान श्रद्धालु पूरे महीने कठोर अनुशासन के साथ रहते हैं। सुबह-सुबह संगम में स्नान, जप-तप, हवन, यज्ञ, व्रत और भजन-कीर्तन करते हैं। कल्पवास इस मेला की आत्मा है, जहां भक्त संगम तट पर डेरा लगाकर सादा जीवन जीते हैं, एक समय भोजन करते हैं और आत्म-शुद्धि की साधना करते हैं। कल्पवास में दान का विशेष महत्व है।

शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार, तीर्थ स्थलों पर किया गया दान सामान्य से हजारों गुना अधिक फलदायी होता है और प्रयागराज जैसे तीर्थराज में माघ मास का दान तो असीम पुण्य प्रदान करता है। ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि, कल्पवास के दौरान दान कई हजार गुना फल देता है। सामान्यतः प्रयागराज में 10 मुख्य दान प्रचलित हैं – गाय, घी, तिल, सोना, भूमि, वस्त्र, अन्न, गुड़, चांदी और नमक। इनके अलावा वेणी दान (मृत्यु के बाद बाल कटवाकर दान), गुप्त दान और शय्या दान का भी अत्यधिक महत्व है।
शय्या दान क्या है और इसका महत्व?
शय्या दान (शैय्या दान या सेजिया दान) हिंदू परंपरा में एक विशेष और उच्च कोटि का दान है। यह मुख्य रूप से दो अवसरों पर किया जाता है। पहला- किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद या कल्पवास की लंबी अवधि (खासकर 12 वर्ष) पूर्ण होने पर। इसका मूल उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति और पापों से पूर्ण मुक्ति है। कल्पवास के दौरान भक्त कठोर तप करते हैं- जमीन पर सोते हैं, सादा भोजन करते हैं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं। इस दौरान अनजाने में कोई छोटी-मोटी गलती या दोष हो सकता है। शय्या दान इन गलतियों का पश्चाताप करने और उन्हें क्षमा कराने का माध्यम माना जाता है, इसलिए इसे “पश्चाताप का दान” भी कहा जाता है।
शय्या दान में शामिल होती हैं ये चीजें
मान्यता है कि कल्पवास पूरा तभी माना जाता है जब शय्या दान किया जाए। 12 वर्ष के कल्पवास के बाद यह दान जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। शय्या दान में क्या दिया जाता है? इसमें बिस्तर (शय्या), गद्दा, तकिया, चादर, कंबल, पलंग जैसी आरामदायक वस्तुएं शामिल होती हैं। कभी-कभी घरेलू उपयोग की अन्य जरूरी चीजें जैसे टीवी, स्कूटी आदि भी दान की जाती है। यह दान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कल्पवासी पूरे समय सुख-आराम त्यागकर तप करते हैं और अंत में इन वस्तुओं का दान करके वे दूसरों को सुख प्रदान करते हैं, जो उनकी त्याग की पराकाष्ठा दर्शाता है।
किसे दिया जाता है शय्या दान

सनातन धर्म में दान के अधिकारी अलग-अलग होते हैं। मृत्यु के बाद शय्या दान महापात्र (विशेष ब्राह्मण) को दिया जाता है, लेकिन तीर्थ स्थल पर, खासकर प्रयागराज में, यह दान स्थानीय तीर्थ पुरोहितों या कुल के पुरोहितों को ही दिया जाता है। हर ब्राह्मण इसका अधिकारी नहीं होता, क्योंकि यह पापों का दान भी है, इसलिए कुल परंपरा से जुड़े पुरोहित ही इसे ग्रहण करते हैं। प्रयागराज में शय्या दान संगम तट पर रहने वाले स्थानीय पुरोहितों को ही जाता है।
कल्पवास और शय्या दान का महत्व
कल्पवास 30 दिनों (या लंबे समय) की साधना है, जो 100 वर्षों की तपस्या के बराबर पुण्य देती है। इसमें स्नान, दान, सेवा और आत्म-चिंतन से मनुष्य पापों से मुक्त होता है, मानसिक शांति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
कल्पवास का समापन है शय्या दान
यह त्याग, करुणा और पश्चाताप का प्रतीक है। दंडी स्वामी महेशाश्रम जैसे संतों के अनुसार, यह दान पापों का नाश करता है और मोक्ष द्वार खोलता है। माघ मास मेले की महिमा सदैव बनी रहेगी। इसके अलावा यहां कुंभ और अर्ध कुंभ भी लगता है, जिसमें देश ही नहीं विदेश से भी श्रद्धालु जुटे हैं।
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