Wednesday , September 30 2020

शिक्षक-स्नातक एमएलसी चुनाव: अटेवा के कूदने से बदल सकती तस्वीर

पल्लव शर्मा

लखनऊ. लोकतंत्र की खूबसूरती है कि जनता उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जनता अपने नुमाइंदे चुनकर सदन में भेजती है, जिससे उनकी समस्याओं को सदन में उठाकर उनका निराकरण कराया जा सके। समस्याओं को सदन में वही व्यक्ति उठा सकता है जिसे समस्या की पूर्ण जानकारी हो या स्वयं भी उससे प्रभावित हो। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने विधानपरिषद में शिक्षको व स्नातकों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए कुछ स्थान निर्धारित कर दिया गया, ताकि उनका प्रतिनिधि उनकी समस्याओं को सदन में उठाकर उनका निराकरण करा सके। कुछ समय तक तो यह व्यवस्था ठीक ढंग से चलती रही। किन्तु कालान्तर में विधानपरिषद में अपने दल के विधायकों की संख्या बढ़ाने की लालसा और सत्ता प्रेम ने राजनैतिक दलों व सेवानिवृत्त शिक्षकों का इन स्थानों पर आधिपत्य हो गया और शनैः-शनैः शिक्षकों व स्नातकों की समस्याओं की ओर से ध्यान हटता चला गया।

आज स्थिति यह है कि इन विशेष स्थानों में से अधिकांश सीटों पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से राजनैतिक दलों व सेवानिवृत्त लोगों का कब्जा हो गया है। यही कारण है कि आज स्नातकों व शिक्षकों की विभिन्न समस्याएं न केवल जस की तस बनी हुई हैं बल्कि बढ़ती ही जा रहीं हैं। इनके प्रतिनिधि किसी न किसी राजनैतिक दल के प्रभाव में हैं और अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए है और वर्षों से सीटों पर कब्जा जमाए हुए हैं।


शिक्षकों की समस्याओं पर यदि बात करें तो आज तमाम समस्याएं उनके सामने खड़ी हैं जिनमे पुरानी पेंशन की बहाली से लेकर अन्य न्यायपूर्ण मांगे सम्मिलित हैं। इनकी समस्याओं पर जब सदन में बैठे तमान नुमाइंदों ने ध्यान नहीं दिया, तो शिक्षकों/ कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर विजय कुमार ‘बन्धु’ ने अटेवा नामक संगठन बनाकर विभिन्न मंचों और स्तरों पर पुरानी पेंशन बहाली के लिए आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। ब्लॉक, जिला, मण्डल व प्रदेश से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक पुरानी पेंशन बहाली के लिए आंदोलन किया। शिक्षक-विधायकों से इस बाबत चर्चा की, देश के लगभग सभी राजनैतिक दलों तक अपनी समस्या लेकर गए, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इसी बीच उत्तर प्रदेश में शिक्षक एवं स्नातक एमएलसी की ग्यारह सीटों पर चुनाव घोषित हुआ तो सामान्य शिक्षक व कर्मचारियों ने अटेवा से इस चुनाव में प्रतिभाग करने का आग्रह करना प्रारंभ कर दिया, जिससे पुरानी पेंशन सहित कर्मचारियों की अन्य न्यायपूर्ण मांगों को सदन में मजबूती के साथ रखा जा सके।

चुनाव में प्रतिभाग करने का निर्णय लिया
सामान्य शिक्षक- कर्मचारियों के आग्रह को देखते हुए अटेवा प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार बन्धु व महामन्त्री डॉ नीरजपति त्रिपाठी ने प्रदेश, मण्डल, जिला, ब्लॉक पदाधिकारियों के साथ बैठक कर सर्व- सहमति से शिक्षक व स्नातक चुनाव में प्रतिभाग करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में अटेवा ने अपने प्रत्याशी घोषित करने प्रारम्भ कर दिया। प्रत्याशी घोषित होते ही वर्तमान समय में पदासीन शिक्षक-स्नातक विधायकों की परेशानी पर बल पड़ गए, क्योंकि अटेवासंगठन का विस्तार जिला-तहसील व ब्लॉक से लेकर न्याय पंचायत स्तर तक विस्तृत है। ऐसे में स्नातक व शिक्षक एमएलसी चुनावों में बड़े उलटफेर की संभावना को नहीं नकारा जा सकता है, इसका अंदाजा होने वाले चुनाव के प्रत्याशियों को है, क्योंकि पुराने खिलाड़ियों की छटपटाहट साफ देखी जा रही है। इसकी पुष्टि के लिए अध्यक्ष विजय कुमार ”बन्धु’ से जब बात की गई तो उन्होंने बताया “अब प्रदेश के जागरूक वोटरों को तय करना है कि वोट मुद्दे के आधार पर देना है या फिर जाति, धर्म, या क्षेत्र के आधार पर। यह चुनाव एक नई राजनीतिक दिशा तय करेंगे।

राजनैतिक दलों एवं सेवानिवृत्त लोगों से शिक्षक स्नातक वोटर बेहद नाराज है और पूरे प्रदेश में एक नए तरह के बदलाव की बयार चल निकली है। अटेवा और उसके नेतृत्व ने संघर्ष का एक प्रतिमान स्थापित किया है इसी कारण लोगों का झुकाव इस ओर स्वाभाविक है।
अटेवा के महामन्त्री डॉ नीरजपति त्रिपाठी

नौजवानों की फौज इस बार परिवर्तन का मूड बना चुकी है। अब जबकि अटेवा ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिया है तो निश्चित ही मुकाबला मठाधीशों के लिए अब आसान नहीं रह गया है, अब देखना यह है कि क्या सामान्य शिक्षक व स्नातक अपना नुमाइंदगी मुद्दों के साथ रहने वाले प्रत्याशियों को देता है या फिर वर्षों से रिटायर लोगों को जो खुद वोट देने के अधिकारी नहीं हैं। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा

शिक्षक डॉ रवि शंकर सिंह