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8 सितंबर के गोपनीय तबादला आदेशों से ढाका के सैन्य गलियारों में हलचल
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प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार पर उठीं उंगलियां
ढाका। बांग्लादेश की राजनीति में जारी उठापटक के बीच अब देश की सेना के भीतर से भी हलचल की खबरें सामने आ रही हैं। 8 सितंबर को जारी सेना के कुछ गोपनीय तबादला और पोस्टिंग आदेशों ने राजधानी के सैन्य हलकों में चर्चा तेज कर दी है। सवाल उठ रहा है कि, क्या यह फेरबदल सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान के अधिकारों और उनके ऑपरेशनल प्रभाव को धीरे-धीरे सीमित करने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
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संवेदनशील ब्रिगेड में बदलाव
इन आदेशों के केंद्र में ढाका की 46वीं स्वतंत्र इन्फैंट्री ब्रिगेड है, जिसे राजधानी की सुरक्षा और रणनीतिक व्यवस्था के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। यह ब्रिगेड सीधे सेना मुख्यालय के अधीन काम करती है। रिपोर्टों के मुताबिक, मिलिट्री ट्रेनिंग डायरेक्टर के पद पर तैनात ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद हुमायूं कबीर को इस ब्रिगेड की कमान सौंपी गई है।

यह पद सामान्य प्रशासनिक जिम्मेदारी से कहीं अधिक संवेदनशील माना जाता है, इसलिए यहां किसी नए अधिकारी की तैनाती का असर केवल सैन्य ढांचे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सत्ता और सेना के समीकरणों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि इस नियुक्ति ने सैन्य हलकों में गहरी सुगबुगाहट पैदा कर दी है।
एयर डिफेंस और 33वीं डिवीजन में भी फेरबदल
बदलाव सिर्फ एक ब्रिगेड तक सीमित नहीं हैं। मीरपुर स्थित छठी स्वतंत्र एयर डिफेंस ब्रिगेड और 33वीं इन्फैंट्री डिवीजन में भी वरिष्ठ अधिकारियों की अदला-बदली की गई है। जानकारों का कहना है कि, इससे पूरे कमांड ढांचे में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। ढाका के आसपास की अहम इकाइयों और संस्थागत नियुक्तियों के बीच वरिष्ठ कमांड संबंधों का नए सिरे से बंटवारा हुआ है।
कौन है पर्दे के पीछे
औपचारिक रूप से ये आदेश सेना प्रमुख के नाम से ही जारी हुए हैं, लेकिन रिपोर्टों में दावा किया गया है कि, इन तैनातियों के पीछे असली भूमिका प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) एकेएम शमसुद्दीन इस्लाम की है। बताया जा रहा है कि उन्हें प्रधानमंत्री तारिक रहमान का पूरा समर्थन हासिल है।
गौरतलब है कि, अप्रैल में शमसुद्दीन इस्लाम को रक्षा मंत्रालय के साथ-साथ आर्म्ड फोर्सेस डिवीजन की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी दी गई थी, तभी से उनका प्रशासनिक कद काफी बढ़ा है और नागरिक-सैन्य व्यवस्था की कड़ी में इसकी झलक साफ दिखती है।
जनरल वकार-उज-जमान के पर कतरने की कोशिश
बांग्लादेश सेना के सूत्रों का कहना है कि, इन बदलावों के बाद जनरल वकार-उज-जमान के पास पहले जो व्यापक अधिकार थे, वे काफी कम हो गए हैं। इसी आधार पर यह चर्चा गर्म है कि उनके पर कतरने की कोशिश हो रही है।
आधिकारिक रुख बनाम जमीनी चर्चा
नॉर्थ ईस्ट न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार आधिकारिक दस्तावेजों में इन आदेशों को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है। सेना में तबादले और पोस्टिंग सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते भी हैं। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इनकी टाइमिंग और जिन पदों पर बदलाव हुए हैं, उन्हें देखते हुए यह मानना मुश्किल है कि बांग्लादेश की सत्ता और सेना के बीच सब कुछ सामान्य है।
क्यों अहम है यह घटनाक्रम
बांग्लादेश में सेना हमेशा से सत्ता-संतुलन की एक निर्णायक ताकत रही है। ऐसे में राजधानी की सुरक्षा से जुड़ी इकाइयों की कमान बदलना सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं, राजनीतिक संदेश भी माना जाता है। एक ओर निर्वाचित सरकार अपने भरोसेमंद अधिकारियों के जरिए सैन्य ढांचे पर पकड़ मजबूत करना चाहती दिखती है, तो दूसरी ओर सेना प्रमुख की परंपरागत स्वायत्तता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नागरिक नेतृत्व और सेना के बीच यह संतुलन कैसे बैठता है, यह आने वाले दिनों में देश की राजनीतिक स्थिरता की दिशा तय कर सकता है।
अब तक क्या स्पष्ट नहीं
फिलहाल यह साफ नहीं है कि सरकार या सेना की ओर से इन दावों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया आई है या नहीं। ये सभी बातें सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं, और इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। “तख्तापलट” जैसे शब्द भी फिलहाल अटकलों की भाषा हैं। अब तक सामने आए तथ्यों में सत्ता परिवर्तन जैसी किसी घटना का संकेत नहीं है, बल्कि कमान में फेरबदल और अधिकारों के कथित पुनर्वितरण की बात है।
सेना प्रमुख का नहीं आया बयान
पर्यवेक्षकों की नजर अब दो बातों पर है: पहली, क्या सेना प्रमुख या सेना मुख्यालय की ओर से इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बयान आता है; दूसरी, क्या आने वाले हफ्तों में और तबादले होते हैं। यदि फेरबदल का सिलसिला जारी रहता है, तो सरकार और सेना के रिश्तों को लेकर कयास और तेज हो सकते हैं।
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