कब है सर्वपितृ अमावस्या, जानें शुभ मुहूर्त, श्राद्ध-तर्पण की विधि और दीपदान का महत्व

आश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसे दर्श अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है। इस बार यह पर्व 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर उन्हें श्रद्धा के साथ विदा करेंगे।

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पितरों की विदाई का दिन

मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान पितर धरती पर आते हैं और अपने परिवार के बीच रहते हैं। अमावस्या के दिन वे अपने लोक लौट जाते हैं। इसी कारण इस तिथि को पितरों की विदाई का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। परिवार के लोग इस दिन विधि-विधान से पूजन कर पितरों से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।

क्यों खास है सर्वपितृ अमावस्या

धार्मिक मान्यता है कि, यह तिथि पितरों को मोक्ष दिलाने वाली है, जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि परिजनों को याद नहीं होती, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है।

Sarvapitri Amavasya

इसके अलावा पितृपक्ष में किसी कारणवश जिनका श्राद्ध छूट गया हो, उनका श्राद्ध भी इसी दिन करने की परंपरा है। यही वजह है कि इसे ‘सर्वपितृ’ यानी सभी पितरों की अमावस्या कहा जाता है।ब्रह्म पुराण के अनुसार श्रद्धा से दिया गया दान ही श्राद्ध है। श्राद्ध से तृप्त होकर पितर अपने परिवार को सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

शुभ मुहूर्त और सही तिथि

अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर को रात 9:35 बजे शुरू होगी। यह तिथि 10 अक्टूबर को रात 9:19 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के नियम के अनुसार पर्व 10 अक्टूबर को ही मनाया जाएगा, इसलिए श्रद्धालुओं को 10 अक्टूबर को पूरे दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना सबसे फलदायी रहेगा।

श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि

इस दिन सुबह जल्दी उठकर सादे पानी से स्नान करना चाहिए और साफ वस्त्र पहनने चाहिए। घर में बिना प्याज-लहसुन का सात्विक भोजन तैयार किया जाता है।

परिवार के बड़े सदस्य दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं। वे जौ के आटे, तिल और चावल से बने पिंड अर्पित करते हैं। इसके बाद कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन निकाला जाता है। मान्यता है कि, पितर इन्हीं रूपों में आकर भोजन ग्रहण करते हैं। अंत में ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है और यथाशक्ति दान-दक्षिणा दी जाती है।

शाम को दीपदान का विशेष महत्व

सर्वपितृ अमावस्या पर शाम के समय पितरों के लिए विशेष दीपदान किया जाता है। सूर्यास्त के बाद घर की छत पर दक्षिण दिशा में चौमुखा दीपक जलाया जाता है। मान्यता है कि, यह दीपक पितरों के लौटने का मार्ग रोशन करता है। इसके साथ ही घर के मंदिर में गाय के घी का दीपक भी लगाना चाहिए।

पीपल पूजन और अन्य उपाय

इस दिन सुबह पीपल के पेड़ में जल चढ़ाकर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। मछलियों को आटे की गोलियां और चींटियों को शक्कर मिला आटा खिलाने की भी परंपरा है। मान्यता है कि,  इन उपायों से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं।

पौराणिक कथा 

इस तिथि के नामकरण से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार पितरों की मानसी कन्या अक्षोदा ने घोर तपस्या की थी। उनके तप के तेज से पूरा पितृलोक जगमगा उठा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सभी पितृ उन्हें वरदान देने पहुंचे। इसी दौरान अक्षोदा पितृ अमावसु के रूप पर मोहित हो गईं। उन्होंने अमावसु के सामने मर्यादा के विपरीत प्रस्ताव रख दिया। अमावसु ने धर्म का पालन करते हुए उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया।

Sarvapitri Amavasya

इससे अन्य पितर नाराज हो गए और उन्होंने अक्षोदा को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। वहीं, अमावसु के संयम से सभी पितर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने इस तिथि को अमावसु के नाम पर ‘अमावस्या’ नाम दिया। साथ ही वरदान दिया कि, जो व्यक्ति इस दिन श्राद्ध करेगा, उसे पूरे वर्ष के श्राद्ध का फल प्राप्त होगा।

श्रद्धा और संयम का संदेश

धर्माचार्यों का कहना है कि, श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा और कृतज्ञता है। इस दिन केवल कर्मकांड ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने, उनके आदर्शों को अपनाने और परिवार में आपसी प्रेम बनाए रखने का संकल्प भी लिया जाता है। मान्यता है कि सात्विक आचरण, संयम और जरूरतमंदों को दान देने से पितर प्रसन्न होते हैं।

 

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