भारत से डरा अमेरिका, तभी तो लगा रहा अडंगे, नहीं चाहता दूसरा चीन बने इंडिया!

नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रंप जब से दोबारा से व्हाइट हॉउस पहुंचे हैं, तब से लगातार वे भारत-अमेरिका संबंधों में तल्खी के संकेत दे रहे हैं। अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय से जुड़े मुद्दे, H1B वीजा नीति, पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी और अब टैरिफ विवाद इन सभी मोर्चों पर ट्रंप प्रशासन का रुख भारत के प्रति काफी सख्त रहा है। इसी कड़ी में सबसे ताजा और सबसे बड़ा झटका अमेरिकी संसद से पारित हुआ एक नया कानून “लिंडसे ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026” है।

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इस कानून के पास होने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार मिल गया है कि, वे रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकेंगे। इस सूची में चीन के साथ-साथ भारत का नाम भी सबसे ऊपर है।

25 साल पुरानी कहानी आई याद

दिलचस्प बात यह है कि, भारत-अमेरिका संबंधों में यह तनाव एक ऐतिहासिक संयोग के साथ सामने आया है। ठीक 25 साल पहले, सितंबर 2001 में, तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रशासन ने भारत पर 1998 से लगे प्रतिबंध हटाए थे। ये प्रतिबंध पोखरण-II परमाणु परीक्षण के बाद लगाए गए थे।

India US Relation

उस फैसले ने दोनों देशों के बीच संबंधों को नई दिशा दी और अगले दो दशकों में भारत-अमेरिका रिश्ते लगातार मजबूत होते गए, लेकिन अब, ठीक उसी पड़ाव के पास खड़े होकर, वाशिंगटन एक बार फिर भारत पर सख्त प्रतिबंधों की तैयारी में जुटा दिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि, इस बार वजह परमाणु परीक्षण नहीं बल्कि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना है।

संबधों में आ सकती है खटास

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, अभी यह कहना मुश्किल है कि, यह नया टैरिफ कानून भारत को रूसी तेल का आयात घटाने पर मजबूर कर पाएगा या नहीं, लेकिन इतना तय है कि, इस कदम से भारत-अमेरिका संबंधों में खटास बढ़ने का खतरा साफ दिखने लगा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि, इस कानून का असर दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है।

अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ और जाने-माने लेखक माइकल कुगेलमैन का मानना है कि, पिछले एक साल में भारत-अमेरिका संबंधों को कई झटके लगे हैं, लेकिन रूस से जुड़ा यह नया प्रतिबंध कानून अब तक का सबसे बड़ा आघात साबित हो सकता है। कई विदेश नीति विशेषज्ञ इसके पीछे एक गहरी रणनीति देखते हैं।

वैश्विक मंच पर मिल सकती है चुनौती

उनके अनुसार अमेरिका का असली मकसद भारत को रूसी तेल से दूर करना भर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि, भारत आर्थिक और सामरिक रूप से इतना मजबूत न हो जाए कि, वह एशिया में चीन जैसी भूमिका निभाने लगे। वाशिंगटन शायद ही यह चाहेगा कि, एशियाई महाद्वीप में कोई दूसरी ऐसी ताकत उभरे जो भविष्य में वैश्विक मंच पर उसे चुनौती दे सके।

इस रणनीति के संकेत खुद अमेरिकी अधिकारियों के बयानों में मिलते हैं। इसी साल मार्च में भारत दौरे पर आए अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने खुलकर कहा था कि, भारत को यह समझ लेना चाहिए कि, अमेरिका उसके साथ वही गलती नहीं दोहराएगा जो करीब दो दशक पहले चीन के मामले में हुई थी। उन्होंने कहा था कि, अमेरिका भारत को अपने बाजार खोलने का मौका तो देगा, लेकिन इस बार सतर्क रहते हुए, ताकि अचानक यह पता न चले कि भारत कई अहम कारोबारी क्षेत्रों में अमेरिका से आगे निकल चुका है।

भारत के साथ चीन जैसी गलती न दोहराने की कोशिश

इस चिंता के पीछे ठोस आंकड़े भी हैं। 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के बीच संबंध सामान्य होने शुरू हुए थे। इसके बाद अमेरिका ने चीन को अपने बाजारों तक पहुंच, भारी निवेश, शैक्षणिक आदान-प्रदान और आधुनिक तकनीक हस्तांतरित करने जैसी सुविधाएं दीं।

India US Relation

नतीजा यह हुआ कि, 1980 में जहां चीन की कुल जीडीपी महज 191 अरब डॉलर थी, जो उस समय की 2.86 ट्रिलियन डॉलर की अमेरिकी अर्थव्यवस्था का केवल 7 प्रतिशत थी, वहीं 2025 आते-आते चीन की जीडीपी बढ़कर करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर हो गई, जबकि अमेरिका की जीडीपी 30.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंची। यानी चार दशकों में चीन ने अमेरिका के मुकाबले अपनी आर्थिक हैसियत में जबरदस्त छलांग लगाई। विशेषज्ञों का मानना है कि वाशिंगटन अब भारत के मामले में यही “चूक” दोहराने से बचना चाहता है।

भारत की स्वतंत्र विदेश नीति बनी रोड़ा

अमेरिका आमतौर पर उम्मीद करता है कि, उसके रणनीतिक साझेदार कम से कम उसकी प्रमुख मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहें। भारत के मामले में भी वाशिंगटन अपनी शर्तें थोपने की कोशिश करता दिख रहा है, लेकिन भारत की दशकों पुरानी विदेश नीति इसमें आड़े आती है। नई दिल्ली लंबे समय से किसी एक विदेशी शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की नीति पर चलती रही है, चाहे वह शीत युद्ध के दौर का गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत हो या मौजूदा दौर की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति।

इसी रुख को दोहराते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने 17 सितंबर को स्पष्ट कर दिया कि, भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि, नई दिल्ली ने अमेरिकी पक्ष को साफ तौर पर बता दिया है कि वह देश के व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार है।

 इस गतिरोध से आगे कैसे निकलेगा भारत

वाशिंगटन भारत के सस्ती रूसी ऊर्जा खरीदने के फैसले को मानो ‘सजा’ देने पर आमादा दिखता है। अमेरिकी एक्सपोर्ट पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी इसी दबाव नीति का हिस्सा है, जिसका मकसद भारत को उस आर्थिक ऊंचाई तक पहुंचने से रोकना भी माना जा रहा है, जहां से वह चीन की तरह अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे सके।

दूसरी ओर, भारत की स्थिति भी अडिग बनी हुई है, नई दिल्ली बार-बार दोहरा चुकी है कि, वह अमेरिका के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस गतिरोध से बाहर निकलने का रास्ता आखिर क्या होगा। कई विशेषज्ञों का सुझाव है कि इसका जवाब शायद इतिहास में ही छिपा है। 1998 में लगे प्रतिबंधों और 2001 में उनके हटाए जाने की घटना दोनों देशों को यह सबक याद दिला सकती है कि टकराव के बावजूद दीर्घकालिक साझेदारी की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।

 

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