
ढाका। 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद से वहां का माहौल पूरी तरह से अस्थिर हो चुका है। जगह-जगह हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। आए दिन अल्पसंख्यकों को निशान बनाया जा रहा हैं। धार्मिक स्थलों को तोड़ा जा रहा है या वहां आग लगा दी जा रही है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार हालात को संभालने मे असमर्थ हो रही है। अब 12 फरवरी 2026 को वहां आम चुनाव होने जा रहे हैं, जिस पर बांग्लादेश की जनता ही नहीं भारत, चीन और पाकिस्तान की निगाहें टिकी हैं।

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बांग्लादेश की राजनीति में लाएगा बदलाव
दरअसल ये चुनाव देश के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद ये पहला राष्ट्रीय चुनाव है। इससे पहले शेख हसीना डेढ़ दशक से अधिक समय तक वहां सत्ता में रहीं, लेकिन छात्र विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी। उम्मीद जताई जा रही है कि ये चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाएगा।

रिपोर्ट है कि शेख हसीना वाली अवामी लीग को इस चुनाव में प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिससे वह चुनाव मैदान से बाहर है। इस बार के आम चुनाव में मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी (जेबीआई) के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच माना जा रहा है। बीएनपी को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, जबकि जमात-ए-इस्लामी ने 2024 के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब मजबूत स्थिति में है। चुनाव के साथ ही एक राष्ट्रीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी होगा, जिसमें ‘जुलाई चार्टर’ के तहत संवैधानिक और संस्थागत सुधारों पर मतदान होगा।
शेख हसीना 15 साल तक रहीं सत्ता में
एक रिपोर्ट के अनुसार, शेख हसीना के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के संबंध काफी अच्छे थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। हसीना फिलहाल भारत में निर्वासित जीवन जी हैं और इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने उन्हें मौत की सजा सुनाई है
रिपोर्ट में इंडिपेंडेंट यूनिवर्सिटी बांग्लादेश के ग्लोबल स्टडीज और गवर्नेंस लेक्चरर खोंडाकर ताहमिद रेजवान के हवाले से बताया गया है कि, शेख हसीना के 15 साल के शासन में भारत के साथ मजबूत संबंध थे, लेकिन अब द्विपक्षीय रिश्तों में ऐतिहासिक गिरावट आई है। उधर पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत हुए हैं। इसके अलावा चीन के साथ भी रणनीतिक संबंध गहरे हो गए हैं। ढाका की विदेश नीति अब पहले की तरह पूर्वानुमानित नहीं रही। भारत और पाकिस्तान के साथ संबंध उलट गए हैं और चीन के साथ संशोधित हो गए हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम तीनों देशों के लिए बहुत मायने रखते हैं।
भारत को रणनीतिक नुकसान
रिपोर्ट में, अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन के हवाले से कहा गया है कि, शेख हसीना के हटने से भारत को बड़ा रणनीतिक नुकसान हुआ। भारत अंतरिम सरकार से पूरी तरह सहज नहीं है। भारत को उम्मीद है कि चुनाव से ऐसी सरकार बनेगी जो उसके साथ जुड़ाव बनाए रखे और उन तत्वों से प्रभावित न हो जो भारत के हितों को खतरा पहुंचा सकते हैं। खोंडाकर ताहमिद रेजवान कहते हैं कि, कोई भी नई सरकार भारत के साथ तनाव को नजरअंदाज नहीं कर सकती। भारत बांग्लादेश का सबसे बड़ा पड़ोसी और क्षेत्रीय शक्ति है। गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों (जैसे सीमा मुद्दे, जल बंटवारा, आतंकवाद) और आर्थिक हितों के लिए भारत को अनदेखा करना मुश्किल होगा।
बीएनपी ने जाहिर की भारत से जुड़ने की इच्छा
जमात-ए-इस्लामी की जीत भारत के लिए चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि यह राजनीतिक और सुरक्षा नजरिए से संवेदनशील है, लेकिन बीएनपी (तारिक रहमान के नेतृत्व में) के साथ भारत सहज रह सकता है। बीएनपी ने भारत से जुड़ाव की इच्छा जाहिर की है, और इसका जमात से कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है। कुगेलमैन का मानना है कि, भारत टूटे रिश्तों को जोड़ने के लिए तैयार है और अवामी लीग के राजनीतिक रूप से कमजोर होने को समझता है। बीएनपी सरकार के साथ काम करना भारत की नई रणनीति हो सकती है।
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चीन-बांग्लादेश संबंध और चुनाव
हाल के वर्षों में चीन ने दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाया है और बांग्लादेश के साथ सैन्य, आर्थिक और निवेश संबंध मजबूत किए हैं। चीन चुनाव पर बारीकी से नजर रख रहा है। पिछले साल चीनी नेताओं ने बीएनपी और जमात के नेताओं से मुलाकातें की हैं। कुगेलमैन कहते हैं कि चीन बांग्लादेश को प्रमुख व्यापार और निवेश भागीदार मानता है। बीजिंग के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, क्योंकि उसने बड़े निवेश किए हैं।

कानून-व्यवस्था की चुनौतियां और सुरक्षा मुद्दे चीनी हितों को प्रभावित न करें, यह सुनिश्चित करना चाहता है।रेजवान के अनुसार, बांग्लादेश दक्षिण एशिया में रणनीतिक महत्व रखता है, लंबे समय से भारत का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। चीन ने किसी पक्ष को नहीं चुना, लेकिन सभी पार्टियों से संबंध बनाए रखे हैं, जो भी जीतेगा, चीन उस सरकार को समर्थन देगा और अन्य पार्टियों से बातचीत जारी रखेगा। चीन की मुख्य कोशिश अमेरिकी प्रभाव को रोकना और भारत के प्रभाव को कम करना है।
पाकिस्तान की नजर
शेख हसीना के हटने के बाद पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के संबंध बेहतर हुए हैं। 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के प्रति गुस्सा कम हुआ है, हालांकि बांग्लादेश 1971 के अत्याचारों के लिए माफी की मांग पर कायम है। रेजवान कहते हैं कि पाकिस्तान रक्षा और सांस्कृतिक कूटनीति से संबंध मजबूत करना चाहता है। आर्थिक चुनौतियों के कारण व्यापार-निवेश में कम योगदान दे सकता है, लेकिन रणनीतिक रूप से भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाना चाहता है। कुगेलमैन के अनुसार, पाकिस्तान किसी भी मुख्य पार्टी की जीत से खुश होगा, लेकिन जमात की जीत सबसे पसंदीदा होगी।
इस्लामाबाद जमात सरकार को ज्यादा प्रभावित कर सकता है। बीएनपी सरकार के साथ भी पाकिस्तान सहयोग करेगा, लेकिन भारत-बांग्लादेश संबंध सुधारने की कोशिशों को कमजोर करने की कोशिश करेगा। बीएनपी पाकिस्तान से सहयोग रखेगी, लेकिन ज्यादा निर्भर नहीं होगी। इस आम चुनाव नतीजे न केवल ढाका की राजनीति, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को भी प्रभावित करेंगे।
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