Jitiya Vrat 2026: जितिया में मां रखती हैं निर्जला उपवास? पिता के लिए भी हैं ये नियम, जानें पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में संतान के सुखी जीवन, अच्छी सेहत और दीर्घायु की कामना के लिए कई व्रत रखे जाते हैं, लेकिन इनमें सबसे कठिन व्रत होता है ‘जीवित्पुत्रिका’ का, जिसे आम बोलचाल में जितिया व्रत भी कहा जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत मुख्य रूप से माताएं करती हैं। यह तीन दिनों तक चलने वाला अत्यंत कठोर निर्जला उपवास है, जिसमें व्रती अन्न तो दूर, जल तक ग्रहण नहीं करतीं।

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अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब संतान माता-पिता दोनों की होती है, तो यह व्रत सिर्फ मां ही क्यों रखती है? क्या शास्त्रों में पिता के लिए भी कोई नियम तय किए गए हैं? इन्हीं सवालों के पीछे छिपे धार्मिक और पौराणिक पक्ष को समझना जरूरी है।

मां ही क्यों रखती हैं व्रत?

शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, मां और संतान का संबंध केवल गर्भनाल तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह गहरा आत्मिक जुड़ाव है। इस व्रत में मां की भूमिका को खास महत्व दिए जाने के पीछे दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं।

सृजन और ममत्व का प्रतीक

Jitiya Vrat 2026

नौ महीने तक संतान को गर्भ में पालने के कारण मां को बच्चे की रक्षा की पहली ढाल माना गया है। जितिया व्रत आत्म-त्याग और कठिन तपस्या की मांग करता है, जिसे ममत्व की पराकाष्ठा माना जाता है।

कुदरती जुड़ाव

सनातन परंपरा में मातृत्व को प्रकृति और शक्ति का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि, मां के संकल्प और तप में असीम ऊर्जा होती है, जो संतान पर आने वाले हर संकट को टालने की क्षमता रखती है।

क्या पिता के लिए भी हैं कोई नियम?

जितिया में निर्जला उपवास की परंपरा मुख्य रूप से माताओं के लिए ही निर्धारित है। हालांकि, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि पिता की कोई भूमिका नहीं होती। धार्मिक जानकारों के अनुसार, पिता से जुड़े नियम इस प्रकार हैं:

व्रत का विधान

शास्त्रों में पिता के लिए इस दिन निर्जला उपवास रखना अनिवार्य नहीं बताया गया है। यह विशुद्ध रूप से माताओं द्वारा किया जाने वाला तप है।

सहयोग और संकल्प

पूजा-अनुष्ठान में पिता का संकल्प और सहयोग उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। पिता पूजा सामग्री जुटाने और धार्मिक कार्यों में सहयोग करने के साथ संतान के पालन-पोषण का संकल्प लेते हैं।

सात्विक आचरण

व्रत के दिनों में परिवार के मुखिया यानी पिता के लिए भी तामसिक भोजन, यानी मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज से दूर रहने और पूरी सात्विकता बनाए रखने का नियम है।

पौराणिक कथा- जब जीमूतवाहन ने दे दिया अपना जीवन

इस व्रत के पीछे दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी है, जो बड़े दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर जंगल में संन्यासियों की तरह जीवन बिताना शुरू कर दिया था।

वहां उन्हें पता चला कि, नागवंश अपनी रक्षा के लिए हर दिन पक्षीराज गरुड़ को एक नाग बलि के रूप में सौंपता है। एक दिन एक वृद्ध मां के इकलौते बेटे शंखचूड़ की बारी आई। मां का विलाप देखकर जीमूतवाहन का हृदय पिघल गया। उन्होंने बालक की जान बचाने के लिए खुद को लाल कपड़े में लपेटा और गरुड़ की शिला पर अर्पित कर दिया।

जब गरुड़ ने उन्हें खाना शुरू किया, तो जीमूतवाहन का धैर्य और त्याग देखकर वे दंग रह गए। सच्चाई जानने के बाद गरुड़ ने न केवल उन्हें जीवनदान दिया, बल्कि भविष्य में कभी नागों की बलि न लेने का वचन भी दिया। मान्यता है कि, तभी से जीमूतवाहन को संतान रक्षक देवता के रूप में पूजा जाने लगा।

चील और सियारिन की कथा: व्रत के नियम का महत्व

दूसरी कथा के अनुसार, एक बार जंगल में एक चील और एक सियारिन ने जीमूतवाहन की पूजा देखकर जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया। चील ने भूख-प्यास सहते हुए पूरे विधि-विधान से व्रत पूरा किया। वहीं सियारिन भूख बर्दाश्त नहीं कर सकी और रात में चुपके से मांस खा लिया।

कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से अगले जन्म में चील की सभी संतानें दीर्घायु और तेजस्वी हुईं, जबकि सियारिन की संतानों की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई। यही कारण है कि, इस व्रत में नियमों के कठोर पालन पर विशेष जोर दिया जाता है।

आस्था और परंपरा का संगम

जितिया व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि मां के त्याग, संकल्प और संतान के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक माना जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती महिलाएं पूरे समर्पण के साथ जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और संतान की सुरक्षा व दीर्घायु की कामना करती हैं।

मान्यता है कि, सच्चे मन और नियमों के पालन के साथ किया गया यह व्रत संतान के जीवन से संकट दूर करता है। यही वजह है कि पीढ़ियों से यह परंपरा आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

 

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