शरीर के एक तरफ जलन और फफोले? हो सकता है शिंगल्स, जानिए क्यों है यह खतरनाक

त्वचा पर अचानक जलन, चुभन और दर्द के साथ छोटे-छोटे दाने या फफोले उभर आएं, तो अधिकांश लोग इसे सामान्य त्वचा की समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यदि इन लक्षणों की वजह शिंगल्स, यानी हर्पीज जोस्टर है, तो मामला केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहता। शोधों में शिंगल्स के बाद स्ट्रोक और हृदय संबंधी घटनाओं का खतरा बढ़ने का संबंध देखा गया है। खासतौर पर संक्रमण के बाद के शुरुआती दिनों और हफ्तों को बेहद अहम माना जाता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि शिंगल्स आखिर क्या है और इसकी वजह से स्ट्रोक व हार्ट अटैक का जोखिम कैसे बढ़ सकता है।

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क्या है शिंगल्स?

शिंगल्स उसी वायरस से होता है, जो बच्चों में चिकनपॉक्स यानी छोटी माता का कारण बनता है। इसे वैरिसेला-जोस्टर वायरस कहा जाता है। चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद भी यह वायरस शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होता। वह नर्व सेल्स, यानी तंत्रिका कोशिकाओं में निष्क्रिय अवस्था में छिपा रहता है।

Shingles

वर्षों बाद जब उम्र बढ़ने या अन्य कारणों से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है, तो यही वायरस दोबारा सक्रिय हो जाता है और शिंगल्स का रूप ले लेता है। इसमें आमतौर पर शरीर या चेहरे के किसी एक हिस्से में पहले दर्द, जलन, खुजली या झुनझुनी महसूस होती है। इसके बाद उसी जगह फफोले निकल आते हैं। ये दाने अक्सर शरीर के एक ही तरफ, नसों के रास्ते में दिखाई देते हैं। फफोले कुछ दिनों में पपड़ी में बदल जाते हैं और करीब दो से चार सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। हालांकि कई मरीजों के लिए परेशानी यहीं खत्म नहीं होती।

दाने ठीक, फिर भी बना रहता है दर्द

शिंगल्स की सबसे आम और कष्टदायक जटिलताओं में पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया शामिल है। यह नसों का ऐसा दर्द है, जो दाने ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक बना रहता है। शिंगल्स से गुजरने वाले करीब 10 से 18 प्रतिशत लोगों में यह समस्या हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा भी बढ़ता जाता है।

कुछ मरीजों में दाने ठीक होने के बाद भी प्रभावित हिस्से में महीनों, और कभी-कभी वर्षों तक दर्द बना रहता है। यह दर्द इतना परेशान करने वाला हो सकता है कि, रोजमर्रा के कामकाज, नींद और मानसिक स्थिति तक पर असर पड़ने लगता है। यदि संक्रमण चेहरे या आंख के आसपास हो, तो आंखों और नजर पर भी असर पड़ सकता है।

दुर्लभ मामलों में वायरस मस्तिष्क में सूजन, यानी एन्सेफलाइटिस जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या भी पैदा कर सकता है, इसलिए चेहरे या आंख के पास दाने उभरने पर विशेष सतर्कता जरूरी है।

शिंगल्स और स्ट्रोक के बीच क्या है संबंध?

कई अध्ययनों में हर्पीज जोस्टर के बाद स्ट्रोक के जोखिम में बढ़ोतरी देखी गई है। यह जोखिम संक्रमण के शुरुआती समय में अधिक नजर आता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका एक संभावित कारण वायरस से जुड़ी रक्त-नलिकाओं की सूजन हो सकती है, जिसे चिकित्सा भाषा में वैस्कुलोपैथी कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो वायरस के सक्रिय होने के दौरान रक्त-नलिकाओं में सूजन आ सकती है, जिससे रक्त प्रवाह प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। यही स्थिति स्ट्रोक जैसी गंभीर घटनाओं के जोखिम से जोड़कर देखी जाती है।

हार्ट अटैक का भी खतरा

शोधों में शिंगल्स और हार्ट अटैक समेत अन्य कार्डियोवैस्कुलर घटनाओं के बीच भी संबंध सामने आया है। कुछ अध्ययनों में स्ट्रोक के साथ-साथ कोरोनरी हार्ट डिजीज के जोखिम में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यही कारण है कि शिंगल्स को केवल त्वचा रोग मानकर टालना ठीक नहीं माना जाता। यह सावधानी खासकर बुजुर्गों और पहले से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप या मधुमेह जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए और अहम हो जाती है।

इन लक्षणों पर रखें नजर

यदि शरीर के एक हिस्से में जलन या दर्द के बाद फफोले दिखें, तो देर नहीं करनी चाहिए। इसके साथ चेहरे या आंख के आसपास दाने, तेज सिरदर्द, कमजोरी, बोलने में दिक्कत, चेहरे का टेढ़ा होना या सीने में दर्द जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। ये लक्षण स्ट्रोक या हृदय संबंधी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं और इनमें एक-एक मिनट कीमती होता है।

टीकाकरण है बचाव

भारत में शिंगल्स से बचाव का सबसे प्रभावी और मुख्य तरीका टीकाकरण है। यह टीका वायरस को दोबारा सक्रिय होने से रोकता है और गंभीर दर्द के जोखिम को भी कम करता है। बुजुर्गों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को इस बारे में अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

Shingles

इसके अलावा कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। यदि घर में किसी को शिंगल्स हुआ है, तो उनके फफोलों या दानों को सीधे छूने से बचना चाहिए। रैशेज को साफ और ढंककर रखना चाहिए, ताकि संक्रमण फैलने का खतरा कम रहे।

समय पर इलाज है सबसे जरूरी

चिकित्सकों का कहना है कि, समस्या बढ़ने से पहले ही डॉक्टर को दिखाना फायदेमंद होता है। शुरुआती दौर में इलाज शुरू होने से दर्द की अवधि और जटिलताओं का जोखिम घटाया जा सकता है, इसलिए त्वचा पर एक तरफ दर्द के साथ दाने उभरने की स्थिति को कभी भी सामान्य एलर्जी या फुंसी समझकर टालना नहीं चाहिए।

स्पष्ट है कि शिंगल्स केवल त्वचा की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली स्थिति हो सकती है। जागरूकता, समय पर जांच और टीकाकरण के जरिए इसके गंभीर नतीजों से काफी हद तक बचा जा सकता है।

 

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नोट: यह लेख सामान्य जानकारी पर आधारित है। किसी भी लक्षण की स्थिति में योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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