
नई दिल्ली। अफगानिस्तान, मध्य एशिया और पूर्वी रूस तक पहुंचने की भारत की करीब एक दशक पुरानी उम्मीद अब हकीकत में बदलने वाली है। ईरान ने 730 किलोमीटर लंबी चाबहार-जहेदान रेलवे लाइन का काम पूरा होने का ऐलान कर दिया है। माना जा रहा है कि, आने वाले तीन से चार महीने में इस मार्ग पर ट्रेनें दौड़ने लगेंगी। इससे भारत के लिए अफगानिस्तान ही नहीं, मध्य एशिया और पूर्वी रूस तक सामान भेजना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा।
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पाकिस्तान को बायपास करने का रास्ता
एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने इस रेल परियोजना के पूरा होने की जानकारी दी है। भारत के लिए यह केवल कारोबारी रास्ता नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम कड़ी है। वजह यह है कि, जहेदान शहर ईरान-अफगानिस्तान सीमा पर स्थित है और यहीं से पाकिस्तान की सीमा भी सटी हुई है।

भारत लंबे समय से ऐसे वैकल्पिक मार्ग की तलाश में था, जिससे पाकिस्तान से गुजरे बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचा जा सके। यह रेल लिंक उसी जरूरत को पूरा करता है।
भूमि से घिरे देशों तक सुगम पहुंच
रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना पर वर्षों से काम चल रहा था। संचालन शुरू होने पर भारत और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के लिए मध्य एशिया के उन देशों तक आवाजाही आसान हो जाएगी, जो चारों तरफ से जमीन से घिरे हैं और जिनके पास समुद्री तट नहीं है। ऐसे देशों के लिए समुद्र तक पहुंचने का यह नया विकल्प व्यापारिक दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है।
भारत-ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट से जुड़ी कड़ी
चाबहार-जहेदान रेल लिंक भारत-ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट से ही जुड़ा है। हाल ही में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भारत आए थे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई। चर्चा के प्रमुख एजेंडे में चाबहार पोर्ट पर भारत के अधिकारों की सुरक्षा भी शामिल रही। रेल लिंक को उसी परियोजना की अगली कड़ी माना जा रहा है।
रेल लाइन की खासियतें
चाबहार और जहेदान के बीच बिछाई गई 730 किलोमीटर लंबी रेल लाइन पर कुल 33 स्टेशन होंगे। यह मार्ग 39 सुरंगों से होकर गुजरता है और इस पर 201 पुल बनाए गए हैं। ईरानी अधिकारी फिलहाल लाइन की अंतिम सुरक्षा जांच में जुटे हैं। सुरक्षा से जुड़ी सभी मंजूरियां मिलते ही ट्रेनों की आवाजाही शुरू कर दी जाएगी।
गौरतलब है कि, ईरान ने यह परियोजना ऐसे समय में पूरी की है, जब वह अमेरिका के साथ युद्ध में उलझा हुआ है। चाबहार पोर्ट पर अमेरिका की नजर पहले से ही बनी हुई है।
पोर्ट संचालन पर अमेरिकी पाबंदी बनी चुनौती
भारत चाबहार पोर्ट के संचालन को लेकर ईरान सरकार और पोर्ट अथॉरिटी के लगातार संपर्क में है। पोर्ट अथॉरिटी के साथ हो रही बातचीत में यह मुद्दा सबसे प्रमुख है। भारत चाहता है कि, जैसे ही चाबहार पोर्ट पर लगी अमेरिकी पाबंदी हटे, वह इसके संचालन का अधिकार पहले की तरह अपने हाथ में ले सके। फिलहाल सबकी नजर इस बात पर है कि, पाबंदी कब तक खत्म होती है।
परियोजना का सफर
चाबहार-जहेदान रेल लाइन ईरान के ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार पोर्ट को दक्षिण-पूर्वी शहर जहेदान से जोड़ती है। जहेदान अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा के करीब है। इस परियोजना के प्रमुख पड़ाव इस प्रकार हैं।

शुरुआत में यह रूट केवल 628 किलोमीटर लंबा था। मई 2016 में भारत और ईरान के बीच इस परियोजना को लेकर एक एमओयू हुआ था और भारत शुरू में इससे जुड़ा था। कूटनीतिक रणनीति के तहत भारत ने निवेश या संसाधन लगाने से पहले खुद को चाबहार पोर्ट तक सीमित कर लिया। ईरान ने 7 मई 2020 से इस रेल लाइन पर ट्रैक बिछाने का काम शुरू किया था।
भारत के लिए क्यों अहम
भारत के लिए यह रूट कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का ऐसा वैकल्पिक रास्ता देता है, जिसमें पाकिस्तान से गुजरने की जरूरत नहीं पड़ती। दूसरा, यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से जुड़ा है, जिससे भारत को यूरेशियाई बाजारों तक पहुंच मजबूत करने में मदद मिलेगी।
इसे यूं समझा जा सकता है कि, अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए ईरान का चाबहार पोर्ट अगर भारत का समुद्री द्वार है, तो जहेदान रेलवे के जरिए अफगानिस्तान में दाखिल होने का बड़ा द्वार बनने जा रहा है।
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