
कई बार ऐसा होता है कि, हम दिनभर की भागदौड़, काम का दबाव, ट्रैफिक, मोबाइल और अन्य जिम्मेदारियों की वजह से इतना थक जाते हैं कि लगता है बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद आ जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता और रात करवट बदलने में ही बीतने लगती है। शरीर तो थका होता है, लेकिन दिमाग शांत होने का नाम ही नहीं लेता है।
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आप बिस्तर पर लेटकर छत देखते रहते हैं, फोन चलाते रहते हैं या बार-बार करवट बदलते रहते हैं और नींद गायब रहती है। इस स्थिति को आसान भाषा में समझें तो इसे थके हुए, लेकिन जागे हुए जैसा कहा जा सकता है, यह आजकल बहुत आम समस्या बनती जा रही है, खासकर उन लोगों में जो तनाव भरी और तेज रफ्तार जिंदगी जी रहे हैं। नींद की कमी सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाती, बल्कि दिमाग, मूड और सेहत पर भी बुरा असर डालती है।
डिजिटल युग में नींद बड़ी समस्या है
यह समस्या केवल सामान्य थकान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गंभीर मानसिक और शारीरिक बीमारियों की दस्तक मानी जा रही है। हालिया स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अनिद्रा की इस नई श्रेणी में फंस चुका है, जिसे विशेषज्ञ डिजिटल युग की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती करार दे रहे हैं।

न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार नींद न आने का प्राथमिक वैज्ञानिक कारण शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का असंतुलन है। सामान्य परिस्थितियों में शाम होते ही इस स्ट्रेस हार्मोन का स्तर गिरना चाहिए और नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन का स्तर बढ़ना चाहिए, लेकिन दिनभर का कार्यभार और मानसिक चिंताएं शरीर को लगातार अलर्ट मोड में रखती हैं। जब कोई व्यक्ति रात को भी काम की प्लानिंग या भविष्य की चिंता करता है, तो एड्रिनल ग्रंथियां कोर्टिसोल का स्राव जारी रखती हैं जिससे मस्तिष्क को खतरे का आभास होता रहता है और वह सोने का आदेश नहीं दे पाता।
आधुनिक अनिद्रा का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्मार्टफोन और लैपटॉप की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी है जो सीधे तौर पर मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि को प्रभावित करती है। यह रोशनी दिमाग को भ्रमित करती है कि अभी दिन का उजाला है, जिससे मेलाटोनिन का प्राकृतिक उत्पादन ठप हो जाता है और व्यक्ति थकान के बावजूद जागता रहता है।
अनिश्चित समय ने बिगड़ा प्राकृतिक चक्र
मानव शरीर की एक आंतरिक घड़ी होती है जिसे सर्केडियन रिदम कहा जाता है और आज की लाइफस्टाइल में सोने-जागने के अनिश्चित समय ने इस प्राकृतिक चक्र को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। विशेषकर वीकेंड पर देर तक जागने की आदत शरीर के स्लीप साइकिल को बाधित कर देती है जिसे सोशल जेट लैग भी कहा जाता है। एक विरोधाभासी तथ्य यह भी है कि आज के लोग मानसिक रूप से तो थके हुए हैं लेकिन शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं।
दफ्तरों में घंटों बैठकर काम करने से दिमाग थक जाता है, लेकिन शरीर की ऊर्जा खर्च नहीं होती, जिसके कारण शरीर गहरी नींद के चरणों में प्रवेश नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त कमरे का वातावरण और रात का खान-पान भी नींद की गुणवत्ता तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि बेडरूम का तापमान बहुत अधिक है या वहां रोशनी और शोर है, तो मस्तिष्क रिलैक्स नहीं हो पाता।
कई गंभीर बीमारियों की वजह बनती है अनिद्रा
चिकित्सकों का स्पष्ट संदेश है कि, नींद को अब विलासिता नहीं बल्कि एक उपचार की तरह देखा जाना चाहिए क्योंकि लगातार नींद की कमी से डिप्रेशन, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। समाधान के रूप में विशेषज्ञों का मानना है कि सोने से पहले अपने विचारों और कल की योजनाओं को डायरी में लिख देना चाहिए ताकि दिमाग तनावमुक्त हो सके।
साथ ही सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी डिजिटल स्क्रीन को बंद कर देना और कमरे में पूर्ण अंधेरा रखना मेलाटोनिन के स्तर को बढ़ाने में सहायक होता है। शाम के बाद कैफीन का सेवन बंद करना और एक निश्चित रूटीन का पालन करना इस ‘थके हुए लेकिन जागे हुए’ वाली स्थिति से छुटकारा दिलाने में सबसे प्रभावी कदम साबित हो सकता है। अंततः नींद की समस्या का समाधान दवाओं में नहीं बल्कि जीवनशैली में अनुशासन लाने और अपने मस्तिष्क को शांति का संकेत देने में निहित है।
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