
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को अत्याधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश में अब अपराधियों को सजा दिलाने के लिए केवल पारंपरिक गवाहों पर निर्भर नहीं रहना होगा, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्य और फॉरेंसिक जांच को पुलिसिंग का मुख्य आधार बनाया जा रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में 500 विशेष क्राइम सीन एक्सपर्ट तैयार किए जा रहे हैं।
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300 विशेषज्ञों को किया गया प्रशिक्षित
मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप, इस महत्वाकांक्षी योजना के पांच चरणों में से अब तक 300 विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जबकि बाकी दो बैचों का प्रशिक्षण भी अंतिम दौर में है। यह पहल न केवल जांच की गुणवत्ता में सुधार लाएगी, बल्कि पुलिस बल के कार्य करने के तरीके में भी आमूलचूल परिवर्तन करने वाली साबित होगी।
इस विशेष अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यह है कि यूपीएसआईएफएस से प्रशिक्षित होने वाले ये अधिकारी केवल खुद तक ही इस ज्ञान को सीमित नहीं रखेंगे। ये विशेषज्ञ अब अपने-अपने जिलों और कमिश्नरेट में मास्टर ट्रेनर की भूमिका निभाएंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि राजधानी में तैयार हो रहे ये एक्सपर्ट पूरे प्रदेश के 75 जिलों में जाकर आरक्षी से लेकर निरीक्षक स्तर तक के पुलिसकर्मियों को फॉरेंसिक पुलिसिंग की बारीकियां सिखाएंगे।
वर्कशॉप और ट्रेनिंग सेशन के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि, किसी भी अपराध स्थल पर पहुंचने वाली पहली पुलिस टीम को यह पता हो कि डिजिटल साक्ष्य कैसे सुरक्षित करने हैं और साइबर फॉरेंसिक का उपयोग किस प्रकार करना है। इस रणनीति से यूपी पुलिस के भीतर फॉरेंसिक जांच की एक अटूट और मजबूत श्रृंखला तैयार होगी।
जांच प्रक्रिया को वैज्ञानिक आधार देने की दिशा में यह कदम मील का पत्थर माना जा रहा है। प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक अनुभव भी दिया जा रहा है। इसमें डिजिटल एविडेंस प्रिजर्वेशन, साइबर ट्रैकिंग, वैज्ञानिक सैंपलिंग और जटिल फॉरेंसिक एनालिसिस जैसे विषय शामिल हैं।
अक्सर देखा गया है कि, घटनास्थल पर जानकारी के अभाव में साक्ष्य दूषित हो जाते हैं, जिससे अदालत में केस कमजोर पड़ जाता है। लेकिन अब ये प्रशिक्षित एक्सपर्ट घटनास्थल पर पहुंचते ही हर सूक्ष्म पहलू को सटीक तरीके से सुरक्षित और विश्लेषित करेंगे। इससे न केवल दोषियों को सजा दिलाने की दर बढ़ेगी, बल्कि निर्दोषों को भी न्याय मिलने में आसानी होगी।
संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जी.के. गोस्वामी के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। तीन बैच सफलतापूर्वक प्रशिक्षित किए जा चुके हैं और चौथे बैच का प्रशिक्षण आगामी 27 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है। पांचवें और अंतिम चरण के पूरा होते ही प्रदेश को फॉरेंसिक पुलिसिंग की एक ऐसी फौज मिल जाएगी, जो किसी भी पेचीदा मामले को सुलझाने में सक्षम होगी।
उत्तर प्रदेश के सभी कमिश्नरेट और जिलों में इन विशेषज्ञों की तैनाती से फॉरेंसिक आधारित पुलिसिंग को एक नई धार मिलेगी। योगी सरकार की यह रणनीति प्रदेश को आधुनिक और तकनीक-सक्षम राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक प्रहार है, जिससे अपराधियों के मन में खौफ और आम जनता के बीच सुरक्षा का भाव और अधिक सुदृढ़ होगा।
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