
वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां शांति की उम्मीदें कूटनीतिक जटिलताओं के गहरे जाल में उलझती नजर आ रही हैं। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी इस सीधी जंग के 26वें दिन युद्ध विराम की कोशिशों को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अपनी शर्तों की एक लंबी सूची अमेरिका की मेज पर रख दी। ये शर्तें इतनी सख्त और रणनीतिक हैं कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इन्हें शांति वार्ता के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा करार दिया है।
इसे भी पढ़ें- पश्चिम एशिया संकट पर राज्यसभा में पीएम मोदी का बड़ा बयान, कहा- संवाद से ही निकलेगा रास्ता
तेहरान नहीं हटेगा पीछे!
एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि, पर्दे के पीछे बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ तेहरान ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि, वह बिना ठोस लिखित गारंटी के अपनी सैन्य गतिविधियों से एक कदम भी पीछे नहीं हटेगा।
इस बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आसमान छूती कीमतों ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कनें बढ़ा दी हैं। भारत समेत दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या डील मेकर की छवि रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप ईरान की इन अभूतपूर्व और कठोर मांगों के आगे झुकेंगे या फिर खाड़ी क्षेत्र एक और बड़े तथा अधिक विध्वंसक हमले का गवाह बनेगा।
अमेरिका को देनी होगी गारंटी
ईरान ने ओमान, कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों के माध्यम से जो मांगें वॉशिंगटन भेजी हैं, वे केवल युद्ध विराम तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे पूरे क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरण को स्थायी रूप से बदलने वाली हैं। ईरान की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि अमेरिका और इजरायल को लिखित रूप में यह कानूनी गारंटी देनी होगी कि भविष्य में कभी भी ईरानी संप्रभुता या उसके सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं किया जाएगा।
तेहरान का तर्क है कि, साल 2018 में परमाणु समझौते से अमेरिका के अचानक हटने के बाद उसका भरोसा पूरी तरह डगमगा गया है, इसलिए अब केवल मौखिक आश्वासनों पर यकीन करना मुमकिन नहीं होगा। इसके साथ ही ईरान ने इस जंग में हुए अपने बुनियादी ढांचे और जान-माल के भारी नुकसान की पूरी आर्थिक क्षतिपूर्ति यानी वॉर रिपेरेशंस की मांग भी की है। ईरान का मानना है कि, अमेरिका और उसके सहयोगियों की सैन्य आक्रामकता के कारण उसे जो अरबों डॉलर की क्षति हुई है, उसका भुगतान अमेरिका को ही करना होगा।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य रहेगा पूरा नियंत्रण
इन मांगों में सबसे विवादास्पद हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पूर्ण और औपचारिक ईरानी नियंत्रण को मान्यता देना है। ईरान चाहता है कि दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग पर उसके एकाधिकार को स्वीकार किया जाए और उसे यह अधिकार मिले कि वह दुश्मन देशों, विशेषकर इजरायल और अमेरिका के जहाजों की आवाजाही पर अपनी मर्जी से सख्त शर्तें लगा सके या उन्हें रोक सके।
यह मांग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकती है। इसके अतिरिक्त ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने बैलिस्टिक मिसाइल और अत्याधुनिक ड्रोन कार्यक्रम पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध या अंतरराष्ट्रीय निगरानी को स्वीकार नहीं करेगा। तेहरान के लिए उसके ये हथियार ही उसकी सबसे बड़ी रक्षात्मक ढाल हैं जिन्हें वह किसी भी कूटनीतिक सौदेबाजी की मेज पर छोड़ने को तैयार नहीं है।
बंद हो सभी सैन्य अड्डे
खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को पूरी तरह खत्म करने की मांग ने मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है। ईरान ने जोर देकर कहा है कि खाड़ी देशों में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य अड्डों को तुरंत बंद किया जाए और इजरायल द्वारा लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर किए जा रहे हमलों पर तत्काल रोक लगाई जाए।
इसके साथ ही ईरान की एक बड़ी मांग उसकी अर्थव्यवस्था पर लगे दशकों पुराने सभी कड़े प्रतिबंधों को एक झटके में पूरी तरह हटाने की है। तेहरान के अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जिस तरह से समझौतों को तोड़ा था, उसके बाद अब वे तीसरी बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहते। वहीं अमेरिका द्वारा क्षेत्र में लगातार अतिरिक्त सैनिकों और युद्धपोतों की तैनाती ने ईरान की शंकाओं और सुरक्षा चिंताओं को और अधिक पुख्ता कर दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक सार्वजनिक बयान में उम्मीद जताई थी कि, ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने के लिए सहमत होगा और बातचीत काफी सकारात्मक माहौल में चल रही है, लेकिन ईरान ने इस दावे को पूरी तरह से नकार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका के साथ वर्तमान में कोई भी सीधी आधिकारिक बातचीत नहीं हो रही है और संदेशों का आदान-प्रदान केवल तीसरे पक्ष के माध्यम से ही किया जा रहा है।
आक्रामक हुए हमले
एक दिलचस्प कूटनीतिक पहलू यह भी है कि, ईरान अब बातचीत के लिए ट्रंप के पुराने सलाहकारों स्टीव विटकॉफ या जेरेड कुशनर के बजाय उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को प्राथमिकता देना चाहता है। ईरान का मानना है कि कुशनर के साथ उनके पुराने अनुभव सुखद नहीं रहे हैं, इसलिए वे नए चेहरों के साथ बातचीत की मेज पर बैठना अधिक सुरक्षित समझते हैं।
शांति की इन चर्चाओं के बीच युद्ध के मैदान से आने वाली खबरें बेहद चिंताजनक हैं। बीते 24 घंटों में दोनों ओर से हमले और ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। लेबनान की ओर से हिजबुल्लाह ने इजरायल के हाइफा और नाहारिया इलाकों को निशाना बनाते हुए 30 से अधिक रॉकेट दागे हैं जिससे वहां भारी तबाही हुई है। जवाब में ईरान ने इजरायल की महत्वपूर्ण एयरोस्पेस फैक्टरियों पर अपने घातक आत्मघाती ड्रोनों से हमले किए हैं।
शिराज एयरपोर्ट पर भीषण बमबारी
इजरायली वायुसेना ने भी इस चुनौती का कड़ा जवाब देते हुए ईरान के शिराज एयरपोर्ट और कई अन्य सामरिक ठिकानों पर भीषण बमबारी जारी रखी है। इस भीषण युद्ध की तपिश अब पड़ोसी देशों तक भी पहुंचने लगी है जहां कुवेती एयरपोर्ट के फ्यूल टैंक में आग लगने की खबरें सामने आई हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 94 डॉलर से 97 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं।
भारत के लिए यह संकट ऊर्जा सुरक्षा और नागरिक सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाल ही में राष्ट्रति ट्रंप से फोन पर विस्तृत चर्चा की है। भारत की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है क्योंकि भारत की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। पीएम मोदी ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और युद्ध के बजाय संवाद के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।
कूटनीतिक मोर्चे पर गतिरोध
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि कूटनीति के मोर्चे पर एक गंभीर गतिरोध पैदा हो गया है। ईरान की ये शर्तें अमेरिका के लिए अपनी वैश्विक साख को दांव पर लगाने जैसी हैं। यदि ट्रंप इन मांगों को पूरी तरह खारिज करते हैं, तो उन्होंने पहले ही ईरान के पावर प्लांट्स पर भीषण हमले की चेतावनी दे रखी है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या ट्रंप अपनी पुरानी ‘डील मेकिंग’ कला से इस उलझी हुई गुत्थी को सुलझा पाएंगे या फिर पूरी दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट और महायुद्ध की आग में झोंक दी जाएगी।
इसे भी पढ़ें- पश्चिम एशिया संघर्ष ने भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के प्रयासों की अत्यावश्यकता को फिर उजागर किया



