
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में युद्ध के बादलों और गहराते ऊर्जा संकट के बीच वैश्विक तेल बाजार से एक चौंकाने वाली,लेकिन भारत के लिए राहत भरी खबर आई है। अमेरिकी प्रशासन ने अपनी सख्त नीति में अचानक बदलाव करते हुए ईरानी कच्चे तेल के आयात पर अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस रणनीतिक यू-टर्न ने न केवल वैश्विक कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि भारतीय रिफाइनरों के लिए सस्ते ईंधन के बंद हो चुके रास्ते भी फिर से खोल दिए हैं। डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल में ईरान पर लगे कड़े प्रतिबंधों के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका ने इस तरह की ढील दी है, जिससे भारत सहित तमाम एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को एक बड़ी ऊर्जा संजीवनी मिलने की उम्मीद है।
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ईरानी तेल पर अस्थायी
अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी किए गए विशेष आदेश के तहत ईरानी तेल की खरीद पर 30 दिनों की अस्थायी छूट दी गई है। स्कॉट बेसेंट के अनुसार, यह छूट उन तेल खेपों पर लागू होगी जो 20 मार्च तक जहाजों पर लोड हो चुकी हैं और 19 अप्रैल तक अपने गंतव्य पर डिलीवर कर दी जाएंगी। यह फैसला इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने ही ईरान पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाए थे, जिसके चलते भारत जैसे देशों को ईरान से तेल आयात शून्य करना पड़ा था। अब वही प्रशासन अस्थायी राहत दे रहा है, जिसे दुनिया भर के विशेषज्ञ एक बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक बदलाव मान रहे हैं।

इस खबर के सामने आते ही भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों में हलचल बढ़ गई है। देश की प्रमुख रिफाइनिंग कंपनियों के सूत्रों ने पुष्टि की है कि वे ईरानी तेल खरीदने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। हालांकि, कंपनियां इस मामले में काफी सावधानी बरत रही हैं। उनकी मुख्य चिंताएं सरकार की ओर से आने वाले आधिकारिक निर्देशों और भुगतान के तंत्र को लेकर हैं।
भारत को मिलेगी राहत
अमेरिकी प्रतिबंधों के साये में भुगतान की प्रक्रिया क्या होगी और इसके लिए कौन से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनलों का उपयोग किया जाएगा, इस पर अभी स्पष्टता का इंतजार किया जा रहा है। इसके साथ ही शिपिंग और जहाजों के बीमा को लेकर नियमों का स्पष्ट होना भी उनके लिए जरूरी है। भारत के पास अन्य प्रमुख एशियाई देशों के मुकाबले कम तेल भंडार है, ऐसे में ईरानी तेल की निर्बाध उपलब्धता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। भारत ने हाल ही में रूसी तेल की बुकिंग भी तेज की है और अब ईरान से आने वाला यह तेल भारत की ऊर्जा टोकरी में विविधता लाएगा।
केवल भारत ही नहीं, बल्कि समूचे एशिया के रिफाइनर इस समय पूरी तरह अलर्ट मोड पर हैं। हॉर्मुज जलसंधि में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में संभावित रुकावटों के कारण पूरे क्षेत्र की रिफाइनरियां वर्तमान में अपनी पूरी क्षमता से कम पर काम कर रही हैं। कच्चे तेल की भारी कमी के कारण ईंधन निर्यात में भी कटौती करनी पड़ रही है, जिससे एशियाई देशों पर महंगाई का दबाव बढ़ रहा है।
कीमतें हो सकतीं हैं स्थिर
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में लगभग 170 मिलियन बैरल ईरानी कच्चा तेल समुद्र में जहाजों पर यानी फ्लोटिंग स्टोरेज के रूप में मौजूद है। यह एक विशाल भंडार है जो अल्पकालिक समय के लिए बाजार की कीमतों को स्थिर करने और आपूर्ति की कमी को दूर करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। चूंकि एशिया अपनी लगभग 60 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है, इसलिए ईरान से मिलने वाली यह राहत इस कठिन दौर में किसी वरदान से कम नहीं है।

2018 में प्रतिबंध लगने के बाद चीन ने अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह न करते हुए खुद को ईरानी तेल के सबसे बड़े खरीदार के रूप में स्थापित कर लिया था। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले साल चीनी स्वतंत्र रिफाइनरों ने लगभग 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल खरीदा था। प्रतिबंधों के कारण ईरान को अपना तेल भारी छूट पर बेचना पड़ा, जिसका सीधा फायदा चीन को मिला। अब भारत और अन्य एशियाई देशों की इस बाजार में वापसी से चीन के एकाधिकार को चुनौती मिल सकती है और बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है।
भारत की कूटनीतिक जीत
हालांकि, ईरानी तेल को भारतीय बंदरगाहों तक लाना इतना भी आसान नहीं होगा क्योंकि इसके रास्ते में कई तकनीकी और कूटनीतिक चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। सबसे बड़ी समस्या बिचौलियों की भूमिका को लेकर है। पहले नेशनल ईरानियन ऑयल कंपनी के साथ सीधे अनुबंध होते थे, लेकिन अब ज्यादातर तेल तीसरे पक्ष के व्यापारियों के जरिए बेचा जा रहा है। इसके अलावा, इस व्यापार में अक्सर पुराने टैंकरों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें लेकर सुरक्षा मानकों की चिंता बनी रहती है। अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनल अभी भी ईरानी सौदों को लेकर काफी सशंकित रहते हैं, इसलिए जानकारों का मानना है कि इन नियमों को समझने और एक सुरक्षित भुगतान प्रक्रिया स्थापित करने में थोड़ा समय लग सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका का यह कदम भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी तेल खरीदकर भारत ने पहले ही अपनी स्वायत्त विदेश नीति का परिचय दे दिया था। अब ईरानी तेल की अस्थायी छूट से भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को महंगाई के झटकों से बचाने और अपने ऊर्जा स्रोतों को और अधिक सुरक्षित करने का एक और बेहतरीन मौका मिला है। आने वाले कुछ सप्ताह भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। यदि भुगतान और शिपिंग से जुड़ी बाधाएं समय रहते दूर हो जाती हैं, तो अप्रैल के मध्य तक भारतीय तटों पर ईरानी तेल के टैंकर फिर से दिखाई दे सकते हैं।
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