
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बिगड़ता खानपान और शारीरिक सक्रियता की कमी ने मानव शरीर को बीमारियों का घर बना दिया है। इन्हीं बीमारियों में से एक, जो वर्तमान समय में महामारी की तरह फैल रही है, वह है फैटी लिवर। कभी यह माना जाता था कि, लिवर की बीमारियां केवल अत्यधिक शराब का सेवन करने वालों को ही होती हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के बदलते आंकड़े अब एक डरावनी हकीकत बयां कर रहे हैं। अब उन लोगों में भी फैटी लिवर की समस्या तेजी से देखी जा रही है जो शराब को हाथ तक नहीं लगाते।
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सामान्य लगते हैं शुरुआती लक्षण
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि, यह स्थिति किसी साइलेंट किलर से कम नहीं है, क्योंकि इसके लक्षण शुरुआती दौर में इतने सामान्य होते हैं कि, व्यक्ति उन्हें नजरअंदाज कर देता है और जब तक असल समस्या समझ आती है, तब तक लिवर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका होता है।

फैटी लिवर का सीधा और सरल अर्थ है लिवर की कोशिकाओं में आवश्यकता से अधिक वसा यानी फैट का जमा हो जाना। सामान्यतः लिवर में फैट की कुछ मात्रा होना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह फैट लिवर के कुल वजन के पांच से दस प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तो इसे फैटी लिवर की श्रेणी में रखा जाता है। यह जमा हुआ फैट धीरे-धीरे लिवर की कार्यक्षमता को प्रभावित करने लगता है और समय बीतने के साथ यह अंग में सूजन पैदा कर देता है।
चिकित्सा जगत में इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी अल्कोहॉलिक फैटी लिवर की है, जो लंबे समय तक शराब के सेवन के कारण विकसित होती है। वहीं दूसरी और सबसे चिंताजनक श्रेणी नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज की है, जो मुख्य रूप से खराब जीवनशैली, जंक फूड के अत्यधिक सेवन, मोटापे और मेटाबॉलिक असंतुलन के कारण होती है।
बच्चे भी हो रहे शिकार
हैरानी की बात यह है कि, अब यह बीमारी केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि छोटे बच्चों में भी फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्कूलों में बढ़ता पढ़ाई का बोझ, खेलकूद के मैदानों से दूरी और मोबाइल-वीडियो गेम्स के प्रति बढ़ते आकर्षण ने बच्चों को शारीरिक रूप से निष्क्रिय बना दिया है। इसके साथ ही पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स और मैदे से बनी चीजों का अत्यधिक सेवन उनके लिवर पर बुरा असर डाल रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि बचपन में बढ़ता मोटापा भविष्य में लिवर सिरोसिस और लिवर फेलियर जैसी गंभीर स्थितियों की नींव रख रहा है, जो आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है। अब सवाल यह उठता है कि, आखिर फैटी लिवर कब सामान्य से हटकर खतरनाक रूप अख्तियार कर लेता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, फैटी लिवर तब अत्यंत घातक बन जाता है जब यह केवल फैट जमा होने के चरण को पार कर लिवर में सूजन पैदा करने लगता है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में नॉन-अल्कोहॉलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH) कहा जाता है।
‘नैश’ वह अवस्था है जहां लिवर की कोशिकाएं डैमेज होने लगती हैं और वहां स्कार टिश्यू यानी घाव के निशान बनने लगते हैं। यदि इस स्तर पर भी इलाज न मिले, तो यह स्थिति लिवर फाइब्रोसिस और अंततः लिवर सिरोसिस में बदल जाती है, जो एक लाइलाज स्थिति है। सिरोसिस होने पर लिवर सिकुड़ जाता है और पत्थर की तरह सख्त हो जाता है, जिससे लिवर कैंसर या लिवर फेलियर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
अचानक तीव्र होते हैं लक्षण
उन मरीजों के लिए यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जो पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। मधुमेह के रोगियों में इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण लिवर पर फैट जमा होने की प्रक्रिया बहुत तेज होती है। ऐसे मरीजों में फैटी लिवर का बढ़ना उनके हृदय स्वास्थ्य पर भी सीधा असर डालता है।
अक्सर देखा गया है कि, फैटी लिवर के गंभीर मरीजों में अचानक लक्षण तीव्र हो जाते हैं और बिना किसी पूर्व चेतावनी के लिवर डैमेज होने की खबरें सामने आती हैं। यह स्थिति अचानक स्वास्थ्य गिरने का कारण बनती है, जिससे रिकवरी की संभावनाएं कम हो जाती हैं।इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों की पहचान करना है।
फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण इतने धीमे होते हैं कि आम इंसान इसे साधारण थकान समझकर टाल देता है। मरीज को अक्सर बिना किसी भारी काम के लगातार कमजोरी और थकान महसूस होने लगती है। पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में हल्का भारीपन या कभी-कभी हल्का दर्द महसूस होना भी लिवर में आती सूजन का संकेत हो सकता है।
जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, व्यक्ति की भूख कम होने लगती है और पाचन तंत्र पूरी तरह बिगड़ जाता है। जब स्थिति अधिक गंभीर होती है, तो आंखों और त्वचा में पीलापन यानी पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके अलावा हथेलियों का लाल होना, पेट में पानी भरना और पैरों में सूजन आना इस बात का संकेत है कि अब लिवर को बचाना मुश्किल हो रहा है।
ये हैं बचाव के उपाय
बचाव के उपायों पर गौर करें तो यह स्पष्ट है कि इसके लिए किसी चमत्कारिक दवा से ज्यादा अनुशासन की आवश्यकता है।
जीवनशैली में छोटे, लेकिन ठोस बदलाव इस बीमारी को जड़ से खत्म कर सकते हैं। सबसे पहले खानपान पर नियंत्रण करना अनिवार्य है। आहार में मैदे से बनी वस्तुओं, अत्यधिक तली-भुनी चीजों और प्रोसेस्ड शुगर को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। मैदा और चीनी लिवर पर सीधे तौर पर दबाव बढ़ाते हैं और फैट जमा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इसकी जगह फाइबर युक्त भोजन, हरी पत्तेदार सब्जियां और फलों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
नियमित शारीरिक व्यायाम फैटी लिवर के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। प्रतिदिन कम से कम तीस से चालीस मिनट की तेज सैर, योग या जिम में पसीना बहाने से शरीर का मेटाबॉलिज्म सुधरता है और लिवर पर जमा अतिरिक्त फैट धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके साथ ही शरीर के वजन को संतुलित रखना बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति का पेट बाहर निकला हुआ है, तो उसे सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि बेली फैट सीधे तौर पर फैटी लिवर से जुड़ा होता है। शराब और धूम्रपान का पूरी तरह त्याग करना लिवर की उम्र बढ़ा सकता है।
अगर आपको पेट में लगातार भारीपन, कमजोरी या भूख न लगने जैसी समस्या महसूस हो रही है, तो घरेलू उपचारों के भरोसे बैठने के बजाय तुरंत किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट कराने से बीमारी का शुरुआती स्टेज में ही पता लगाया जा सकता है। आपको बता दें कि, लिवर शरीर का वह हिस्सा है जिसमें खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता होती है, लेकिन यह क्षमता तभी तक काम करती है जब तक वह थोड़ा बहुत सही है।
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