अमेरिका के हमले से भारत के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट को बड़ा झटका, ईरान-अमेरिका तनाव ने बढ़ाई मुश्किलें

तेहरान। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के साथ सीजफायर समाप्त होने की घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी सेना ने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन ईरान पर हवाई हमले किए। इस दौरान चाबहार पोर्ट को भी निशाना बनाया गया।

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भारत को लगा धक्का

गौरतलब है कि, इस बंदरगाह के एक बड़े हिस्से का विकास भारत के सहयोग से हुआ है। विशेषज्ञों की मानें तो चाबहार पर हुए इस हमले ने भारत की उस महत्वाकांक्षी योजना को गहरा धक्का पहुंचाया है, जिसके तहत वह इस बंदरगाह के जरिए अपने क्षेत्रीय हितों को आगे बढ़ाना चाहता था। हालांकि, यह भी सच है कि भारत फिलहाल चाबहार में सीधे तौर पर सक्रिय भूमिका नहीं निभा रहा है।

America attacked Chab Har Port

चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मकरान समुद्र तट पर स्थित है। यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से महज 170 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम दिशा में मौजूद है। इस भौगोलिक स्थिति के चलते चाबहार भारत को पाकिस्तान का रास्ता इस्तेमाल किए बिना ही अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का विकल्प देता है।

हाल ही में जब ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की उम्मीद बंधी थी, तो भारत को भी लगा था कि चाबहार में उसकी गतिविधियां फिर से रफ्तार पकड़ सकती हैं। लेकिन ताजा हमलों ने इस पूरी उम्मीद को झटका देकर मामले को फिर उलझा दिया है।

दीर्घकालिक रणनीति की बुनियाद पर चोट

एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण भारत को चाबहार फ्री जोन में अपनी भागीदारी अस्थायी तौर पर एक स्थानीय ईरानी कंपनी को सौंपनी पड़ी थी। यही वजह है कि, भारत इस समय बंदरगाह का सीधा परिचालन नहीं कर रहा है। इसके पीछे मुख्य मकसद यह था कि, भारत अपने करीब 120 मिलियन डॉलर के निवेश को अमेरिकी प्रतिबंधों की जद से बचा सके, साथ ही भविष्य में पोर्ट पर दोबारा सक्रिय होने की गुंजाइश भी बनाए रखे।

हालांकि,  यह भी सही है कि, अमेरिका के ताजा हमलों से भारत की किसी चालू सुविधा पर तत्काल कोई सीधा असर नहीं पड़ा है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जा सकता कि भारत इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह अलग-थलग रहेगा। दरअसल, यह हमला सीधे तौर पर उस दीर्घकालिक रणनीति की बुनियाद पर चोट करता है, जिसे भारत ने पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए तैयार किया था।

 भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है चाबहार

पिछले करीब बीस वर्षों से चाबहार भारत की विदेश नीति में एक विशेष स्थान रखता आया है। यह पोर्ट न केवल भारत को पाकिस्तान पर निर्भरता के बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देता है, बल्कि इसे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में भी देखा जाता रहा है। इस कॉरिडोर के जरिए भारत, ईरान होते हुए रूस और मध्य एशिया के देशों तक व्यापारिक संपर्क बनाना चाहता है।

America attacked Chab Har Port

चाबहार को लेकर भारत की गंभीरता समय-समय पर सामने आती रही है। इसी सिलसिले में साल 2024 में भारत ने चाबहार के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन को लेकर ईरान के साथ दस साल की एक दीर्घकालिक संधि पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन जैसे ही अमेरिका ने ईरान पर नए और सख्त प्रतिबंध लगाए, भारत के लिए इस समझौते के तहत काम करना काफी जटिल हो गया। नतीजतन भारत को सीधे संचालन से पीछे हटकर वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़े।

रणनीतिक स्तर पर बड़ा नुकसान

विश्लेषकों का मानना है कि, अमेरिका के इन ताजा हमलों से भारत को भले ही तत्काल परिचालन संबंधी नुकसान न हुआ हो, लेकिन रणनीतिक लिहाज से यह एक बड़ा झटका जरूर है। चाबहार को लेकर बना यह तनावपूर्ण माहौल पूरे प्रोजेक्ट के भविष्य पर सवालिया निशान लगा देता है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि चाबहार अब एक लंबे भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में फंसता दिख रहा है, जिससे इस बंदरगाह को लेकर भारत की तमाम उम्मीदें अधर में लटक सकती हैं।

पाकिस्तान के लिए राहत

इसके अलावा, भारत के सामने चाबहार को लेकर पैदा हुई यह मुश्किल किसी हद तक पाकिस्तान के लिए राहत की बात भी साबित हो सकती है। दरअसल अगर भारत चाबहार में सक्रिय भूमिका निभाने में सफल होता, तो इससे पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का सामरिक और व्यापारिक महत्व स्वाभाविक रूप से घट सकता था। ऐसे में चाबहार पर लगा यह ग्रहण कहीं न कहीं इलाके में पाकिस्तान और चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने के भारत के प्रयासों को भी कमजोर करता है।

America attacked Chab Har Port

कुल मिलाकर, अमेरिका के प्रतिबंधों के बाद अब सीधी सैन्य कार्रवाई ने चाबहार को लेकर भारत की उम्मीदों को गहरा धक्का पहुंचाया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस बदली हुई परिस्थिति में अपनी क्षेत्रीय रणनीति को किस तरह आगे बढ़ाता है और क्या वह चाबहार को लेकर अपनी योजनाओं को फिर से पटरी पर ला पाता है या नहीं।

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