
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव को अभी लगभग एक साल बाकी हैं, लेकिन यहां सियासी हलचल तेज हो चुकी है। इसके साथ ही बंटवारे का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) के पहले चरण के उद्घाटन के बाद जहां बीजेपी और सपा में इसका श्रेय लेने की होड़ मची हुई है और एक-दूसरे पर हमलावर हैं। वहीं, बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने एक ऐसा दांव चल दिया है जिसने सूबे की सियासत में खलबली मचा दी है।
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पुरानी मांग को दी हवा
मायावती ने न केवल जेवर एयरपोर्ट में हुई देरी के लिए कांग्रेस और सपा को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने और हाईकोर्ट की बेंच स्थापित करने की अपनी पुरानी मांग को दोबारा हवा दे दी है। उनके इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि, क्या आने वाले चुनावों में यूपी का विभाजन सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनने वाला है?
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण के भव्य उद्घाटन के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ा हुआ है, जहां बीजेपी इसे अपनी डबल इंजन सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, वहीं सपा इसे अपनी पुरानी योजना का विस्तार करार दे रही है। इस जुबानी जंग के बीच मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट कर कांग्रेस और सपा दोनों को घेरे में लिया है।
मायावती ने स्पष्ट किया कि, जेवर एयरपोर्ट की रूपरेखा और इसके सभी जरूरी बुनियादी कार्य उनकी ही सरकार यानी बसपा शासनकाल के दौरान हुई शुरू हो गये थे। उन्होंने सीधे तौर पर तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि, यदि कांग्रेस ने उस समय रोड़े नहीं अटकाए होते, तो यह प्रोजेक्ट यमुना एक्सप्रेसवे की तरह बहुत पहले ही बनकर तैयार हो गया होता। मायावती के इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि, वे विकास के इस बड़े मुद्दे पर खुद को हाशिए पर नहीं रहने देना चाहतीं।
सपा को भी नहीं बक्शा
बसपा सुप्रीमो ने अपने बयान में समाजवादी पार्टी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि, सपा ने अपने कार्यकाल में प्रदेश की गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने के बजाय बसपा सरकार द्वारा किए गए ऐतिहासिक फैसलों को निष्क्रिय करने में अपनी ऊर्जा लगाई। मायावती ने आरोप लगाया कि सपा सरकार ने दलित समाज में जन्मे महान संतों, गुरुओं और महापुरुषों के सम्मान में बने शिक्षण संस्थानों और जिलों के नाम बदलने का काम किया।
1. काफी लम्बे इंतज़ार के बाद जेवर में नोएडा इण्टरनेशनल हवाई अड्डा के प्रथम चरण का कल उद्घाटन हुआ, जबकि इसकी रूपरेखा ही नहीं बल्कि इसके सभी ज़रूरी बुनियादी कार्य बी.एस.पी. की मेरी सरकार में ही शुरू हो गये थे।
2. इतना ही नहीं बल्कि उस समय केन्द्र में रही कांग्रेस पार्टी की सरकार…— Mayawati (@Mayawati) March 29, 2026
उन्होंने जनता से अपील की कि वे विपक्षी दलों की छलावापूर्ण राजनीति के बहकावे में न आएं और बसपा के ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत पर भरोसा करें। मायावती ने अपने नेतृत्व को आयरन नेतृत्व बताते हुए खुद को प्रदेश के विकास का असली विकल्प पेश किया है।
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है,जहां मायावती ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों की दुखती रग पर हाथ रखा है। उन्होंने लिखा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की अलग से बेंच व उनके लिये अलग से प्रदेश बनाने का सपना ना जाने कब पूरा होगा? इस एक लाइन ने यूपी के बंटवारे की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
फिर चढ़ेगा यूपी का पारा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह महज एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत है। मायावती यह जताना चाहती हैं कि अगर वह सत्ता में लौटती हैं, तो पश्चिमी यूपी को एक अलग राज्य बनाने की अपनी पुरानी मुहिम को फिर से परवान चढ़ाएंगी। पश्चिमी यूपी के लोग लंबे समय से हाईकोर्ट बेंच और अलग राज्य की मांग कर रहे हैं, और मायावती ने इस मुद्दे को छेड़कर वहां के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है।
यह पहली बार नहीं है जब मायावती ने यूपी के बंटवारे की बात की है। साल 2011 में जब वह मुख्यमंत्री थीं, तब उन्होंने अपनी सरकार में बाकायदा एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। उस प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश को प्रशासनिक सुगमता और बेहतर विकास के लिए चार हिस्सों में बांटने की योजना थी:
पश्चिमी उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश)
पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल)
मध्य उत्तर प्रदेश (अवध प्रदेश)
बुंदेलखंड
उस समय यह प्रस्ताव विधानसभा से पास होकर केंद्र के पास गया था, लेकिन केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब 2026 की दहलीज पर खड़े होकर मायावती ने फिर से वही कार्ड खेला है।
पहले भी उठ चुकी है यूपी के बंटवारे की मांग
दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी बीजेपी के भीतर से भी समय-समय पर उठती रही है। हाल के दिनों में मुजफ्फरनगर से बीजेपी नेता संजीव बालियान और अमेठी के संजय सिंह जैसे दिग्गज नेता अलग राज्य की वकालत कर चुके हैं। संजीव बालियान ने सार्वजनिक मंचों से पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग उठाई थी, जिससे उनकी अपनी पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई थी।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य को चार हिस्सों में बांटने की मांग के पीछे तर्क दिया जाता है कि छोटे राज्य होने से प्रशासन बेहतर होगा और विकास की गति तेज होगी। मायावती इसी तर्क के सहारे उन इलाकों को साधना चाहती हैं जो महसूस करते हैं कि लखनऊ की सत्ता से उनकी दूरी अधिक है। विशेषकर पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड के इलाकों में इस मांग को लेकर सहानुभूति रही है।
मायावती के इस ऐलान ने बीजेपी और सपा के बीच चल रही विकास की बहस को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां बीजेपी राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर वोट मांग रही है। वहीं सपा पिछड़ा वर्ग और दलितों के मुद्दों पर केंद्रित है। ऐसे में मायावती का अलग प्रदेश वाला दांव एक बार फिर छोटे राज्यों के समर्थकों को बसपा की ओर आकर्षित कर सकता है। अब देखना यह होगा कि सत्ता पक्ष और प्रमुख विपक्षी दल मायावती के इस ‘बंटवारे के दांव’ का क्या तोड़ निकालते हैं।
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