उन्नाव रेप कांड: कुलदीप सेंगर की सजा बढ़ाने से दिल्ली HC का इनकार, ठुकराई पीड़िता की अर्जी

 उन्नाव। उत्तर प्रदेश के चर्चित उन्नाव रेप कांड में सजा काट रहे पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के लिए दिल्ली हाई कोर्ट से एक बहुत बड़ी राहत भरी खबर आई है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उन्नाव रेप पीड़िता की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने पिता की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के मामले में कुलदीप सेंगर और अन्य दोषियों की सजा को बढ़ाने की मांग की थी।

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कोर्ट ने दिया देरी का हवाला

पीड़िता चाहती थी कि पूर्व विधायक को गैर-इरादतन हत्या के बजाय हत्या का दोषी माना जाए और उसे फांसी की सजा दी जाए, लेकिन अदालत ने कानूनी समय सीमा और प्रक्रियात्मक देरी का हवाला देते हुए इस अपील पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया है।

Kuldeep Sengar'

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पीड़िता के पक्ष पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि, कानून उन लोगों की मदद नहीं करता जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं हैं। पीठ ने पाया कि, ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में 1945 दिनों की भारी देरी हुई है, जिसका कोई ठोस या तार्किक कारण नहीं बताया गया।

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि, पीड़िता इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में शुरू से ही सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी और उसे वरिष्ठ वकीलों की कानूनी सलाह भी उपलब्ध थी। ऐसे में, लगभग पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बाद सजा बढ़ाने की मांग करना जानबूझकर की गई निष्क्रियता और लापरवाही का मामला प्रतीत होता है।

क्या थी पीड़िता की मांग और दलील?

पीड़िता की ओर से कोर्ट में दायर अर्जी में मांग की गई थी कि, कुलदीप सिंह सेंगर और उनके सहयोगियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 यानी गैर-इरादतन हत्या के बजाय धारा 302 यानी हत्या के तहत दोषी ठहराया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि, उसके पिता की मौत महज एक हादसा नहीं थी, बल्कि कुलदीप सेंगर के इशारे पर रची गई एक सोची-समझी साजिश थी।

पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने तर्क दिया कि, पीड़िता बहुत ही कठिन परिस्थितियों में रह रही थी, उसे लगातार धमकियां मिल रही थीं और वह आर्थिक तंगी के साथ-साथ शारीरिक कमजोरी से भी जूझ रही थी। उन्होंने कोर्ट को समझाने की कोशिश की कि इन परिस्थितियों में समय पर अपील न कर पाना स्वाभाविक था, लेकिन अदालत ने इन दावों को अस्पष्ट और बिना दस्तावेजी सबूतों वाला बताते हुए खारिज कर दिया।

सेंगर के वकीलों ने किया कड़ा विरोध

दूसरी ओर, कुलदीप सेंगर और उनके भाई जयदीप सेंगर के वकीलों ने इस अर्जी का कड़ा विरोध किया। सीनियर एडवोकेट प्रमोद कुमार दुबे और कन्हैया सिंघल ने दलील दी कि, पीड़िता के पास कानूनी संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। वह समय-समय पर अन्य संबंधित मामलों में अदालत के सामने आती रही है, इसलिए परिस्थितियों की मजबूरी का हवाला देना सिर्फ देरी को छिपाने का एक बहाना है।

उन्होंने तर्क दिया कि, इतने सालों बाद सजा बढ़ाने की मांग करना आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन है, क्योंकि इससे आरोपी को अनिश्चितकाल तक कानूनी उलझनों और कड़ी सजा के डर में रहना पड़ता है। इस मामले में सीबीआई के वकील ने भी स्पष्ट किया कि एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 10 साल की सजा को स्वीकार कर लिया है और उन्होंने इसे चुनौती नहीं दी है।

यह पूरा मामला साल 2017 का है, जब उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक नाबालिग लड़की ने तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर किडनैपिंग और रेप का आरोप लगाया था। इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब पीड़िता के पिता को आर्म्स एक्ट के एक मामले में गिरफ्तार किया गया और 9 अप्रैल 2018 को पुलिस कस्टडी में उनकी मौत हो गई। आरोप लगा कि सेंगर के दबाव में पुलिस ने पीड़िता के पिता को बेरहमी से पीटा था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस मामले को उत्तर प्रदेश से दिल्ली की तीस हजारी अदालत में ट्रांसफर किया गया।

कस्टडी में पिता की मौत का मामला 

दिसंबर 2019 में, दिल्ली की अदालत ने कुलदीप सेंगर को रेप के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई, जो वह अभी काट रहा है। इसके बाद मार्च 2020 में, अदालत ने पिता की कस्टडी में मौत के मामले में सेंगर, उनके भाई और अन्य को 10 साल की सजा सुनाई और उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। तब ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हालांकि यह हत्या का इरादा नहीं था, लेकिन पुलिस कस्टडी में एक व्यक्ति की मौत को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

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अब इसी 2020 के फैसले को पीड़िता ने सजा बढ़ाने के लिए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे कोर्ट ने समय सीमा समाप्त होने के कारण तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति और कानूनी हल्कों में चर्चा तेज हो गई है।

हाईकोर्ट ने कीड़ी टिप्पणी

जानकारों का मानना है कि, यह फैसला उन लोगों के लिए एक नजीर है जो लंबे समय के बाद कानूनी राहत की उम्मीद करते हैं। अदालत ने यह संदेश दिया है कि न्याय की मांग समय के भीतर होनी चाहिए। अब पीड़िता के पास इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प बचा है, लेकिन हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद आगे की राह चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।

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