
उज्जैन। गुड़ी पड़वा को हिंदू नववर्ष माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इसे हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। उज्जैन में विक्रम संवत (वर्ष) की शुरुआत चैत्र प्रतिपदा से हुई थी। आज भी गुड़ी पड़वा पर शिप्रा नदी के रामघाट पर आतिशबाजी और रंगारंग कार्यक्रमों के साथ इसे विक्रमोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो उस महान परंपरा की याद दिलाता है जिसकी शुरुआत सदियों पहले भारत की ही पवित्र धरती से हुई थी।
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इसी पंचांग पर आधारित होते हैं व्रत-त्यौहार

हिंदू नववर्ष के जिस कैलेंडर को हम आज विक्रम संवत या पंचांग के रूप में जानते हैं, उसकी जड़ें पूरी तरह से उज्जैन शहर से जुड़ी हुई हैं। उज्जैन के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य ने इस काल गणना की शुरुआत की थी और तभी से उनके नाम पर इसे विक्रम संवत कहा जाने लगा।
खगोलीय गणनाओं के अनुसार, आज से लगभग 1 अरब 96 करोड़ 58 लाख 81 हजार 126 वर्ष पहले सृष्टि की रचना मानी जाती है और विक्रम संवत को भारतीय कालगणना का सबसे अचूक और वैज्ञानिक प्रमाण माना गया है। हमारे समाज में आज भी विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और सभी प्रमुख तीज-त्योहार इसी पंचांग के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं।
नेपाल में प्रचलित है विक्रम संवत
ऐतिहासिक रूप से यह पंचांग इतना प्राचीन है कि इसके बाद ही हिजरी और ईस्वी जैसे अन्य कैलेंडर अस्तित्व में आए थे। आज भी नेपाल, मॉरीशस, सूरीनाम और यूक्रेन जैसे देशों में इस पद्धति को विशेष मान्यता प्राप्त है, जबकि नेपाल में तो आधिकारिक तौर पर विक्रम संवत ही प्रचलित है।
पुरातत्वविद रमण सोलंकी के अनुसार, नव संवत्सर का सीधा अर्थ नया साल होता है और संवत का तात्पर्य वर्ष से है। हालांकि, वर्तमान में प्रशासनिक कार्यों के लिए अंग्रेजी कैलेंडर का प्रभाव अधिक है, लेकिन वैज्ञानिक आधार पर विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से लगभग 58 वर्ष आगे चलता है।

उदाहरण के तौर पर, जहां अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्तमान में वर्ष 2026 चल रहा है, वहीं 19 मार्च से हिंदू गणना के अनुसार विक्रम संवत 2083 प्रारंभ हो चुका है। हिंदू कैलेंडर की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक है, जिसमें पहला महीना चैत्र और अंतिम महीना फाल्गुन होता है। यह चक्र प्रकृति के ऋतु परिवर्तन और खगोलीय पिंडों की स्थिति के साथ पूरी तरह मेल खाता है।
राजा विक्रमादित्य ने शुरू किया था विक्रम संवत कलेंडर
राजा विक्रमादित्य, जिनका जन्म 102 ईसा पूर्व हुआ था, वे उज्जैन के एक न्यायप्रिय और साहसी शासक थे। उन्होंने 57 ईसा पूर्व में भारत से विदेशी आक्रमणकारी शकों के साम्राज्य को पूरी तरह उखाड़ फेंका था। इस महान विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने तत्कालीन शक संवत को समाप्त कर अपना नया कैलेंडर शुरू किया, जिसे कालांतर में हिंदू कैलेंडर के रूप में विश्वव्यापी पहचान मिली।
हालांकि, दुनिया भर में इतिहास के विभिन्न दौर में 60 से अधिक संवत प्रचलन में रहे, लेकिन अपनी सूक्ष्म गणना और प्रामाणिकता के कारण विक्रम संवत सबसे अधिक लोकप्रिय रहा। उज्जैन शहर से इस कैलेंडर का सीधा संबंध होने के कारण यहाँ की मिट्टी में आज भी सम्राट विक्रमादित्य का गौरव और प्राचीन भारतीय विज्ञान की खुशबू रची-बसी है, जो हर साल नव संवत्सर के रूप में नई ऊर्जा के साथ जीवंत हो उठती है।



