
वाशिंगटन। गुरुवार की सुबह जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस के रोज गार्डन में पोडियम पर आए, तो पूरी दुनिया की नजरें टीवी स्क्रीन पर जम गईं। हर कोई यह जानने को उत्सुक था कि, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के एक महीने बाद वे कौन सी बड़ी घोषणा करेंगे, लेकिन लगभग 20 मिनट के उनके इस संबोधन ने दुनिया को चौंका दिया, क्योंकि ट्रंप के शब्दों में वह पुरानी फायर एंड फरी तो थी, लेकिन उनके चेहरे पर थकान और इस युद्ध से जल्द से जल्द पिंड छुड़ाने की छटपटाहट साफ झलक रही थी।
इसे भी पढ़ें- ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल के जहाजों को गुजरने की दी अनुमति: डोनाल्ड ट्रंप
राजनीतिक छवि बचाने की कवायद
जानकारों का मानना है कि, यह भाषण किसी सैन्य रणनीति का हिस्सा कम और राजनीतिक छवि बचाने की कवायद अधिक थी, जिसमें ट्रंप ने संकेत दिया कि, अगले 2 से 3 हफ्तों में अमेरिका ईरान पर अब तक का सबसे भीषण प्रहार करेगा और फिर अपनी सेनाओं की वापसी की प्रक्रिया शुरू करेगा। यह संबोधन एक विजेता के आत्मविश्वास से ज्यादा एक ऐसे नेता की दलील लगा जो घरेलू आर्थिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के कारण अब फारस की खाड़ी से एक सुरक्षित निकलने का रास्ता तलाश रहा है।

भाषण के दौरान ट्रंप ने कई बार उन दावों को दोहराया जो वे पिछले कई दिनों से अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिख रहे थे, जैसे ईरानी परमाणु ठिकानों का विनाश और उनकी नौसेना का खात्मा, लेकिन इन दावों में वह प्रभाव नहीं दिखा जो एक राष्ट्राध्यक्ष के आधिकारिक बयान में होना चाहिए। जब कोई नेता अपनी सैन्य उपलब्धियों को हफ्तों तक सोशल मीडिया पर रगड़ देता है, तो वे वैश्विक मंच पर अपनी गंभीरता खोने लगती हैं और ट्रंप का यह कहना कि ईरान से अब कोई खतरा नहीं है, रक्षा विशेषज्ञों के गले नहीं उतर रहा है।
सबसे तेज सैन्य जीत का दावा
सैटेलाइट तस्वीरों और स्वतंत्र इनपुट के बिना इन दावों को महज राजनीतिक प्रचार माना जा रहा है जिससे यह प्रतीत होता है कि, ट्रंप के पास अब कहने को कुछ नया नहीं बचा है और वे अपनी पुरानी स्क्रिप्ट को ही बार-बार नये लिफाफे में रखकर पेश कर रहे हैं। भाषण का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जब ट्रंप ने वर्तमान 32 दिनों के अभियान की तुलना वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे दशकों लंबे युद्धों से करते हुए इसे इतिहास की सबसे तेज सैन्य जीत करार दिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि, यह तुलना सीधे तौर पर अमेरिकी जनता को दिया गया एक मनोवैज्ञानिक संदेश है क्योंकि ट्रंप अच्छी तरह जानते हैं कि अमेरिका एक और अंतहीन युद्ध झेलने की स्थिति में नहीं है और तेल की बढ़ती कीमतों ने उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। वियतनाम का जिक्र करना इस बात का सबूत है कि, वे नहीं चाहते कि ईरान युद्ध उनके राजनीतिक भविष्य के लिए गले की फांस बने, इसलिए वे इसे छोटा और सफल बताकर सेना को वापस बुलाने का बहाना तैयार कर रहे हैं।
खोली समझौते की खिड़की
ट्रंप द्वारा दी गई दो से तीन हफ्तों की मोहलत असल में कोई रणनीतिक हमला नहीं बल्कि एक ऐसी आर्टिफिशियल विक्ट्री की पटकथा है, जिसके जरिए वे दुनिया को यह दिखा सकें कि, उन्होंने अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि, ट्रंप इस समय का उपयोग पर्दे के पीछे किसी गुप्त समझौते या एक आखिरी बड़े हवाई हमले के लिए करना चाहते हैं, ताकि वे खुद को एक शांतिदूत और विजेता दोनों साबित कर सकें।

उन्होंने नए ईरानी नेतृत्व को तर्कसंगत बताकर पहले ही समझौते की खिड़की खोल दी है, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब इस खर्चीले लफड़े से बाहर निकलना चाहता है और पेंटागन को वापसी की तैयारी शुरू करने का गुप्त आदेश मिल चुका है। सबसे चौंकाने वाला बयान होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर आया जहां ट्रंप ने साफ कर दिया कि, इसकी रक्षा की जिम्मेदारी अब उन देशों को खुद उठानी चाहिए जो वहां से अपना तेल ले जाते हैं, जो अमेरिका की दशकों पुरानी वैश्विक नीति से एक बड़ा यू-टर्न है।
सम्मानजनक तरीके से ईरान ने निकलने का प्लान
यह बयान स्पष्ट करता है कि, वे अब मध्य पूर्व का सुरक्षा गार्ड बनने के मूड में नहीं हैं और चीन या भारत जैसे देशों पर यह बोझ डालना चाहते हैं। ट्रंप के चेहरे की थकान और उनके भाषण का लहजा यह साबित करने के लिए काफी था कि, वे अब इस युद्ध को और अधिक नहीं ढोना चाहते। वे अगले 20 दिनों में एक पूर्ण जीत की घोषणा करके फारस की खाड़ी से सम्मानजनक विदाई ले लेंगे ताकि उनकी स्ट्रांगमैन वाली छवि भी बची रहे और अमेरिकी खजाने पर पड़ रहा बोझ भी कम हो जाए।
इसे भी पढ़ें- डोनाल्ड ट्रंप का सनसनीखेज बयान, ईरान की परमाणु क्षमता नष्ट, अब समझौते की मेज पर आया तेहरान



